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विषय-सूची

सनन्ध - प्रकरण १०

राग धना काफी

सनमंध मूल को, मैं तो पाव पल छोड़यो न जाए । अब छल बल मोहे क्या करे, मोह आद थें दियो है उड़ाए ॥१॥

दरद जो तेरे दुलहा, कर डारयो सब नास । पर आस ना छोड़े जीव को, करने तुम विलास ॥२॥

मैं कहावत हों सोहागनी, जो विरहा न देऊं जिउ । तो पीछे वतन जाए के, क्यों देखाऊं मुख पिउ ॥३॥

विरहा न छोड़े जीव को, जीव आस भी पिया मिलन । पिया संग इन अंगे करूं, तो मैं सोहागिन ॥४॥

लागी लड़ाई आप में, एक विरहा दूृजी आस । ए भी विरहा पिउ का, आस भी पिया विलास ॥५॥

जो जीव देते सकुचों, तो क्यों रहे मेरा धरम । विरहा आगे क्या जीव, ए कहत लगत मोहे सरम ॥६॥

माया काया जीवसों, भान भूंन टूक कर । विरहा तेरा जिन दिस, मैं वारूं तिन दिस पर ॥७॥

जब आह सूकी अंगमें, स्वांस भी छोड़यो संग । तब तुम परदा टाल के, दियो मोहे अपनो अंग ॥८॥

मैं तो अपनो दे रही, पर तुमहीं राख्यो जिउ । बल दे आप खड़ी करी, कछू कारज अपने पिउ ॥९॥

जीवरा भी मेरा रख्या, तुम कारज भी कारन । आस भी पूरी सोहागनी, वृध भी राख्यो विरहिन ॥१०॥

तुम आए सब आइया, दुख गया सब दूर । कहे महामती ए सुख क्यों कहूं, जो उदया मूल अंकूर ॥११॥

॥ प्रकरण ॥१०॥ चौपाई ॥१९८॥

इसी सन्दर्भ में देखें-