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विषय-सूची

सनन्ध - प्रकरण ११

सनंध विरह के प्रकास की

एह बात मैं तो कहूं, जो केहने की होए । एह इमामें रीझ के, दया करी अति मोहे ॥१॥

सुनियो बानी मोमिनों, दीदार दिया हकें जब । परदा सारा उड़ गया, हुआ उजाला सब ॥२॥

कह्या जो नबिऐं इमाम, तिन खुद खोले द्वार । दरवाजे सब खोल के, मोहे देखाया पार ॥३॥

कर पकर बैठाए के, आवेस दियो मोहे अंग । ता दिन थें मेहेर पसरी, पल पल चढ़ते रंग ॥४॥

मिलाप हुआ जब मेंहेंदी से, तब कह्या महामती नाम । अब मैं हुई जाहेर, देख्या वतन बका धाम ॥५॥

बात कही सब वतन की, सो निरखे मैं निसान । नजरों सब जाहेर हुआ, उड़ गया उनमान ॥६॥

आपा मैं पेहेचानिया, सनमंध हुआ सत । ए मेहेर जुबां क्यों कर कहूं, गई मूल से गफलत ॥७॥

ए झूठी अबलों न जानती, क्या है क्यों उतपत । सो अब सब विध समझी, यों होसी फना कुदरत ॥८॥

मुझे जगाई जुगतसों, सुख दियो अंग आप । कंठ लगाई कंठसों, या बिध कियो मिलाप ॥९॥

खासी जान खेड़ी जिमी, जल सींचिया खसम । बोया बीज वतन का, सो ऊग्या वाही रसम ॥१०॥

बीज रूह संग निज बुध, सो ले उठिया अंकूर । या जुबां इन अंकूर को, क्यों कर कहूं सो नूर ॥११॥

नातो एह बात जो गुझ की, सो क्यों होवे जाहेर । पर मोमिन प्यारे मुझ को, सो कर ना सकूं अंतर ॥१२॥

तो भी कहूं नेक नूर की, कछुक इसारत अब । पीछे तो जाहेर होएसी, तब दुनी मिलसी सब ॥१३॥

ए जो विरहा बीतक कही, इमाम मिले जिन सूल । अब फेर कहूं निज नूर की, जासों पाइए माएने मूल ॥१४॥

सुनियो रूहें मोमिनों, जो इन मासूक की विरहिन । जो चाहे मेंहेंदी महंमद को, मैं ताए कहूं वचन ॥१५॥

ए विरहा लछन मैं कहे, पर नाहीं विरहा ताए । या विध विरहा उद्दम की, जो कोई किया चाहे ॥१६॥

ज्यों ए विरहा उपज्या, ए नहीं हमारो धरम । विरहिन कबूं ना करे, यों विरहा अनूकरम ॥१७॥

विरहा सुनते मासूक का, आह ना उड़ गई जिन । ताए वतन रूहें यों कहे, नाहीं न ए विरहिन ॥१८॥

जो होए आपे विरहनी, सो क्यों कहे विरहा सुध । सुन विरहा जीव ना रहे, तो विरहिन कहां से बुध ॥१९॥

पतंग कहे पतंग को, कहां रहया तूं सोए । मैं देख्या है दीपक, चल देखाऊं तोहे ॥२०॥

या तो ओ दीपक नहीं, या तूं पतंग नाहें । पतंग कहिए तिनको, जो दीपक देख झंपाए ॥२१॥

पतंग और पतंग को, जो सुध दीपक दे । तो होवे हांसी तिन पर, कहे नाहीं पतंग ए ॥२२॥

दीपक देख पीछा फिरे, साबित राख के अंग । आए देवे सुध और को, ताए क्यों कहिए पतंग ॥२३॥

मैं तो बीतक तब कही, जब लई मासूकें उठाए । जब मैं हुती विरह में, तब क्यों मुख बोल्यो जाए ॥२४॥

ए तो विरहा उपज्या ख्वाब में, चढ़ते चढ़ते पाए । जब विरहा तामस बढ़या, तब नींद दई उड़ाए ॥२५॥

विरहा नहीं ब्रह्मांड में, बिना सोहागिन नार । सोहागिन अंग इमाम को, वतन पार के पार ॥२६॥

अब कहूं मोमिन की, जाए कहिए सोहागिन । ए विरहिन ब्रह्मांड में, हुती ना एते दिन ॥२७॥

सो सोहागिन जेतियां, इमाम की विरहिन । सो अन्तर हकें पकड़ी, ना तो रहे ना तन ॥२८॥

ए सुध दई इमामें, मोहे गुझ कियो प्रकास । तो ए जाहेर होत है, गयो तिमर सब नास ॥२९॥

मेंहेंदी महंमद प्यारे मोमिन, सो जुबां कह्यो ना जाए । पर हुआ है मुझे हुकम, सो कैसे कर ढंपाए ॥३०॥

अनेक करहीं बंदगी, अनेक विरहा लेत । ए सुख तिन सुपने नहीं, जो हमको जगाए देत ॥३१॥

छल तें मोहे छुड़ाए के, कछु दियो विरहा संग । सो भी विरहा छुड़ाइया, देकर अपनो अंग ॥३२॥

अंग नूर बुध देय के, कहे तूं प्यारी मुझ । देने सुख सबन को, हुकम करत हूं तुझ ॥३३॥

तुम दुख पाया मुझे सालहीं, अब सब सुख तुम हस्तक । दिया तुमारा पावहीं, दुनियां चौदे तबक ॥३४॥

दुख पावत हैं मोमिन, सो हम सह्यो न जाए । हम भी होसी जाहेर, पेहेले सोहागनियां जगाए ॥३५॥

सिर ले आप खड़ी रहो, कहे तूं सब सैयन । प्रकास होसी तुझ से, दृढ़ कर देख मन ॥३६॥

तोसों ना कछू अंतर, तूं है सोहागिन नार । माएने गुझ बताए के, खोल दे पार द्वार ॥३७॥

जो कबूं जाहेर ना हुई, सो ए करी तुझे सुध । अब थें आद अनाद लों, जाहेर होसी निज बुध ॥३८॥

तोहे तो सब सुध परी, कहूं अटके नहीं निरधार । आगे होए सोहागनी, कराओ सबों दीदार ॥३९॥

चौदे तबक कायम होएसी, सब हुकम के प्रताप । ए सोभा तुझे सोहागनी, जिन जुदी जाने आप ॥४०॥

जो कोई सब्द संसारमें, ना खुले माएने कब । सो सब खातिर मोमिनों, तूं खोलसी माएने अब ॥४१॥

तूं देख दिल विचार के, उड़ जासी असत । सारों के सुख कारने, तूं जाहेर भई महामत ॥४२॥

खेल किया तुम खातिर, सो तूं कहो आगे मोमिन । पेहेले खेल देखाए के, पीछे मूल वतन ॥४३॥

अंतर रूहोंसों जिन करो, जो मोमिन हैं अर्स घर । पीछे चौदे तबक में, जाहेर होसी आखिर ॥४४॥

बड़ा सुख आगे मोमिन, पीछे सुख संसार । एक दीन सब होएसी, घर घर सुख अपार ॥४५॥

तें वचन कहे जो मुख थें, होसी तिनसे बड़ो प्रकास । असत उड़सी तूल ज्यों, होसी कुफर सब नास ॥४६॥

तूं लीजे नीके माएने, तेरे मुख के बोल । जो साख देवे रूह अपनी, तो लीजे सिर कौल ॥४७॥

देत हों बल सबन को, जो हैं असलू मोमिन । तूं पूछ देख दिल अपना, कर कारज दृढ़ मन ॥४८॥

मैं अंग इमाम को, मोमिन मेरे अंग । बीच आए तिन वास्ते, करूं सब एक संग ॥४९॥

॥ प्रकरण ॥११॥ चौपाई ॥२४७॥

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