सनन्ध - प्रकरण १२
सनंध मोमिन को ढूंढ़ने की
अब ढूंढ़ों रूहें अर्स की, जो हैं मूल अंकूर । सो निज वतनी मोमिन, खसम अंग निज नूर ॥१॥
नूर पार पिउ एक खुद हैं, और न दूजा कोए । और नार सब माया, यामें भी रूह दोए ॥२॥
इत असलू रूह विष्णु की, दूृजी रूह कुफरान । इन दोऊ से न्यारे मोमिन, सो आगे कहूंगी पेहेचान ॥३॥
मोमिन सुख असल वतनी, विष्णु का सुख और । दुनी विष्णु कायम होएसी, कजा कहूंगी तिन ठौर ॥४॥
अब लछन देखो मोमिन के, जो अरवाहें अर्स घर । ए वतनी वचन सुन के, आवत हैं तत्पर ॥५॥
अटक रह्या साथ आधा, जिन खेल देखन का प्यार । ए किया मूल इन खातिर, जो हैं तामसियां नार ॥६॥
भूल गइयां खेल में, जो मोमिन हैं समरथ । नूर इमाम को मुझ पे, केहे समझाऊं अर्थ ॥७॥
सबों को भेली करूं, दृढ़ कर देऊं मन । खेल देखाऊं खोल के, जिन बिध ए उतपन ॥८॥
ए खेल है जोरावर, बड़ो ते रचियो छल । ए तब जाहेर होएसी, जब काढ़ देखाऊँ बल ॥९॥
तुम नाहीं इन छल के, और छल को जोर अमल । सांची को झूठी लगी, ऐसो छल को बल ॥१०॥
तुम आइयां छल देखने, भिल गैयां मांहें छल । छल को छल न लागहीं, ओ लेहेरी ओ जल ॥११॥
ए झूठी तुम को लग रही, तुम रहे झूठी लाग । ए झूठी अब उड़ जाएसी, दे जासी झूठा दाग ॥१२॥
हांसी होसी अति बड़ी, जिन मोहे देओ दोस । कमी कहे मैं ना करूं, पर तुम छल हुआ सिरपोस ॥१३॥
मांग लिया खसम पें, ए छल तुम देखन । जो कदी भूली छल में, तो फेर न आवे ए दिन ॥१४॥
तुम मुख नीचा होएसी, आगूं सब मोमिन । ए हांसी सत वतन की, कोई मोमिन कराओ जिन ॥१५॥
दुख ले चलसी इत थें, नहीं आवन दुजी बेर । तिन क्यों मुख ऊंचा होएसी, जो खसम सों बैठी मुख फेर ॥१६॥
तुमें सुध छल ना अपनी, ना सुध हक वतन । बताए देऊं या विध, ज्यों दृढ़ होवे आप मन ॥१७॥
ए छल पेड़ थें देखाए बिना, ना छूटे याको बल । उड़ाए देऊं जड़ पेड़ से, ज्यों उतर जाए अमल ॥१८॥
अब देखो इन छल को, जो देखन आइयां तुम । नूर जोस देऊं अंग में, जो कोई मोमिन मुस्लिम ॥१९॥
मोमिन मांग्या मोले पें, सो भूल गैयां बातें मूल । सो खेल देखाए पीछे याद देऊं, देखाए फुरमान रसूल ॥२०॥
या छल में अनेक छल हैं, सो करूं सब जाहेर । खोलूं कमाड कल कुलफ, अंतर मांहें बाहेर ॥२१॥
॥ प्रकरण ॥१२॥ चौपाई ॥२६८॥
