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विषय-सूची

सनन्ध - प्रकरण १३

सनंध खेल के मोहोरों की

अब निरखो नीके कर, जो देखन आइयां तुम । मांग्या खेल हिरस का, सो देखावें खसम ॥१॥

भोम भली भरथ खंड की, जहां आई निध नेहेचल । और सारी जिमी खारी, खारे जल मोह जल ॥२॥

इत बोए बिरिख होत है, ताको फल पावे सब कोए । बीज जैसा फल तैसा, किया जो अपना सोए ॥३॥

इनमें जो ठौर अच्छी, जाको नाम नौतन । जहां आए उदै हुई, नेहेचल बात वतन ॥४॥

तिन अच्छी थें भी ठौर अच्छी, जाए कहिए हिंदुस्तान । जहां मेंहेंदी महंमद आए के, जाहेर किया फुरमान ॥५॥

जोलों फुरमान ना जाहेर, तोलों मुख से ना निकसे दम । अब इमाम के निज नूर से, देखाऊं खेल मुस्लिम ॥६॥

ए खेल तुम मांगिया, सो किया तुम कारन । ए विध सब देखाए के, देखाऊं खसम वतन ॥७॥

मोहोरे सब जुदे जुदे, जुदी जुदी मुख बान । खेलें मन के भावते, सब आप अपनी तान ॥८॥

स्वांग काछे जुदे जुदे, और जुदे जुदे रूप रंग । चले आप चित चाहते, और रहे भेले संग ॥९॥

कई दुकान बाजार सेहेर, चौक चौवटे अनेक । अनेक कसबी कसब करते, हाट पीठ बसेक ॥१०॥

भेख सारे बनाए के, करें हो हो कार । कोई मिने आहार खाए, कोई खाए अहंकार ॥११॥

विध विध के भेख काछें, सारे जान प्रवीन । वरन चारों खेलें चित दे, नाही न कोई मत हीन ॥१२॥

पढ़े चारों विद्या चौदे, हुए वरन विस्तार । आप चंगी सब दुनियां, खेलत हैं नर नार ॥१३॥

वरन सारे पसरे, लगे लोभें करें उपाए । बिना अगनी पर जले, अंग काम क्रोध न माए ॥१४॥

नहीं जासों पेहेचान कबहूं, तासों करे सनमंध । सगे सहोदरे मिलके, ले देवें मन के बंध ॥१५॥

सनमंध करते आप में, खुसाल हाल मगन । केसर कसूंबे पेहेर के, देखलावें लोकन ॥१६॥

सिनगार करके तुरी चढ़े, कोई करे छाया छत्र । कोई आगे नाटारंभ करे, कोई बजावे बाजंत्र ॥१७॥

कोई बांध सीढ़ी आवे सामी, करे पोक पुकार । विरह वेदना अंग न माए, पीटे मांहें बाजार ॥१८॥

गाड़े जालें हाथ अपने, रूदन करें जल धार । सनमंधी सब मिलके, टल वले नर नार ॥१९॥

जनम होवे काहू के, काहू के होए मरन । हांसी हिरदे काहू के, काहू के सोक रूदन ॥२०॥

जर खरचें खाए गफलतें, करें बड़े दिमाक । कीरत अपनी कराए के, पीछे होवें हलाक ॥२१॥

कोई किरपी कोई दाता, कोई मंगन केहेलाए । किसी के अवगुन बोलें, किसी के गुन गाए ॥२२॥

कोई मिने वेहेवारिए, कोई राने राज । कई मिने रांक रलझलें, रोते फिरें अकाज ॥२३॥

कई सोवें सोने के पलंग, कई ऊपर ढोलें वाए । रहे खड़े आगे जी जी करें, ए खेल यों सोभाए ॥२४॥

कई बैठें सुखपाल में, कई दौड़े उचाए । जलेब आगे जोर चले, ए खेल यों खेलाए ॥२५॥

कोई बैठे तखतरवा, आगे तुरी गज पाएदल । अति बड़े बाजंत्र बाजहीं, जाने राज नेहेचल ॥२६॥

साम सामी करें फौजें, लरावें लोह अंग । जिमी खावंद नाम धरावने, कई लर मरें अभंग ॥२७॥

कोई मिने होए कायर, छोड़ सरम भाग जाए । कोई मारे कोई पकरे, कोई जावे आप बचाए ॥२८॥

कोई जीते कोई हारे, काहू हरख काहू सोक । जो तरफ सारी जीत आवे, ताए कहें पृथीपत लोक ॥२९॥

कई करत ले कैद में, बांधत उलटे बंध । मारते अरवाह काढ़हीं, ए खेल या सनंध ॥३०॥

जीते हरखे पौरसे, उमंग अंग न माए । हारे सारे सोक पावें, तोबा तोबा करें जुबांए ॥३१॥

कई फिरत हैं रोगिए, कई लूले टूटे अपंग । कई मिने आंधले, यों होत खेलमें रंग ॥३२॥

कई उदर कारने, फिरत होत फजीत । पवाड़े कई बिना हिसाबें, खेल होत या रीत ॥३३॥

॥ प्रकरण ॥१३॥ चौपाई ॥३०१॥

इसी सन्दर्भ में देखें-