सनन्ध - प्रकरण १४
सनंध खेल में खेल की
अब गुझ बताऊं खेल का, झूठे खेले कर सांच । ए नीके देखो मोमिनों, ए जो रहे मजहबों रांच ॥१॥
मैं बताऊं या बिध, जासों जाहेर सब होए । नहीं पटंतर दीन पैंडे, सो जुदे कर देऊं दोए ॥२॥
इन खेल में जो खेल हैं, सो केहेत न आवे पार । इन भेखों में भेख सोभहीं, सो कहूं नेक विचार ॥३॥
कई बिना हिसाबे दयोहरे, जुदे जुदे अपने मजहब । कई भांतों कई जिनसों, करत बंदगी सब ॥४॥
खोजे कोई न पावहीं, वार ना पाइए पार । ले बुत बैठावें दयोहरे, कहें हमारा करतार ॥५॥
कई सराए अपासरे, कई ताल कुंड बिरबाव । कई बिध बांधे बेरखे, कई साल पोसाल टिकाव ॥६॥
कई अंन नीर सबीले, कई करें दया दान । कई तरपन तीरथ, कई करे नित अस्नान ॥७॥
कई भेख जो साध कहावहीं, कई पंडित पुरान । कई भेख जो जालिम, कई मूरख अजान ॥८॥
कई कहावें दरसनी, धरें जुदे जुदे भेख । सुध आप ना पार की, हिरदे अन्धेरी विसेख ॥९॥
कई लोचें कई मूड़ें, कई बढ़ावें केस । कई काले कई उजले, कई धरें भगुए भेस ॥१०॥
कई नेक छेदें कई न छेदें, कई बहुत फारें कान । कई माला तिलक धोती, कई धरे बैठे ध्यान ॥११॥
कई लंगरी बोदले, कई सेख दुरवेस । कई इलम कई आलम, कई पढ़े हुए पेस ॥१२॥
कई जिंदे गोस कुतब, कई मलंग मीर पीर । कई औलिए कई अंबिए, कई मिने फकीर ॥१३॥
कई पैगंमर आदम, कई फिरे फिरस्ते फेर । तबक चौदे देखिए, किन ठौर न छोड़ी अन्धेर ॥१४॥
कई सीलवंती सती कहावहीं, कई आरजा अरधांग । जती वरती पोसांगरी, ए अति सोभावें स्वांग ॥१५॥
कई जुगते जोगी जंगम, कई जुगते सन्यास । कई जुगते देह दमें, पर छूटे नहीं जम फांस ॥१६॥
कई सिवी कई वैष्णवी, कई साखी समरथ । लिए जो सारे गुमाने, सब खेलें छल अनरथ ॥१७॥
कई श्रीपात ब्रह्मचारी, कई वेदिए वेदांत । कई गए पुस्तक पढ़ते, परमहंस सिधांत ॥१८॥
अनेक अवतार तीर्थंकर, कई देव दानव बड़े बल । बुजरक नाम धराइया, पर छोड़े न काहूं छल ॥१९॥
कई होदी बोदी पादरी, कई चंडिका चामंड । बिना हिसाबे खेलहीं, जाहेर छल पाखंड ॥२०॥
कई डिंभ करामात, कई जंत्र मंत्र मसान । कई जड़ी मूली औखदी, कई गुटका धात रसान ॥२१॥
कई जुगतें सिध साधक, कई व्रत धारी मुन । कई मठ वाले पिंड पाले, कई फिरे होए नगन ॥२२॥
कई खट चक्र नाड़ी पवन, कई अजपा अनहद । कई त्रिवेनी त्रिकुटी, जोती सोहं राते सब्द ॥२३॥
कई संत जो महंत, कई देखीते दिगंमर । पर छल ना छोड़े काहूं को, कई कापड़ी कलंदर ॥२४॥
कई आचारी अप्रसी, कई करे कीरंतन । यों खेलें जुदे जुदे, बस परे सब मन ॥२५॥
कई कीरंतन करें बैठे, कई जाग जगन । कई कथें ब्रह्म ग्यान, कई तपे पंच अगिन ॥२६॥
कई इंद्री करें निग्रह, मन ल्याए कष्ट मोह । कई ऊर्ध ठाड़ेश्वरी, कई बैठे खुद होए ॥२७॥
कई फिरें देस देसांतर, कई करें काओस । कई कपाली अघोरी, कई लेवें ठंढ पाओस ॥२८॥
कई पवन दूध आहारी, कई ले बैठत हैं नेम । कई कैद ना करे कछुए, ए सब छल के चेन ॥२९॥
कई फल फूल पत्र भखी, कई आहार अलप । कई करें काल की साधना, जिया चाहें कलप ॥३०॥
कई धारा गुफा झांपा, कई जो गालें तन । कई सूकें बिना खाए, कई करें पिंड पतन ॥३१॥
यों वैराग जो साधना, कई जुदे जुदे उपचार । यों चलें सब पंथ पैंडे, खेले सब संसार ॥३२॥
खेले सब देखा देखी, ज्यों चले चींटी हार । यों जो अंधे गफलती, बांधे जाए कतार ॥३३॥
कोई ना चीन्हें आप को, ना सुध अपनो घर । जिमी न पैंडा सूझे काहू, जात चले या पर ॥३४॥
बाजीगर न्यारा रह्या, ए खेलत कबूतर । तो कबूतर जो खेल के, सो क्यों पावें बाजीगर ॥३५॥
आपे नाम जुदे जुदे, खुदा के धरे अनेक । अनेक रंगे संगे ढ़ंगे, बादे करे विवेक ॥३६॥
सुध इनको तो परे, जो ए आप सांचे होए । तो कुरान के माएने, इत खोल ना सके कोए ॥३७॥
ए देखो तुम मोमिनों, खेल बिना हिसाब । ए खेल तुम खातिर, खसमें रचिया ख्वाब ॥३८॥
मोमिनों के मेले मिने, कोई आए न सके रूह ख्वाब । ए ख्वाब नीके पेहेचानियो, ज्यों होवे दीन सवाब ॥३९॥
॥ प्रकरण ॥१४॥ चौपाई ॥३४०॥
