सनन्ध - प्रकरण १५
सनंध जुदे जुदे फिरकों के जिद की
अजूं देखाऊं नीके कर, ए जो खैंचा खैंच करत । ए झूठे झूठा राचहीं, पर सुध न काहूं परत ॥१॥
खेल खेलें और रब्दें, मिनो मिने करें क्रोध । जैसे मछ गलागल, छोड़े ना कोई व्रोध ॥२॥
कोई कहे दान बढ़ा, कोई कहे ग्यान । कोई कहे विग्यान बड़ा, यों लरे सब उनमान ॥३॥
कोई कहे करम बड़ा, कोई केहेवे काल । कोई कहे साधन बड़ा, यों लरें सब पंपाल ॥४॥
कोई कहे बड़ा तीरथ, कोई कहे बड़ा तप । कोई कहे सील बड़ा, कोई केहेवे सत ॥५॥
कोई कहे विचार बड़ा, कोई कहे बड़ा व्रत । कोई केहेवे मत बड़ी, या विध कई जुगत ॥६॥
कोई कहे बड़ी करनी, कोई कहे मुगत । कोई कहे भाव बड़ा, कोई कहे भगत ॥७॥
कोई कहे कीरंतन बड़ा, कोई कहे श्रवन । कोई कहे बड़ी वंदनी, कोई कहे अरचन ॥८॥
कोई कहे ध्यान बढ़ा, कोई कहे धारन । कोई कहे सेवा बड़ी, कोई कहे अरपन ॥९॥
कोई कहे संगत बड़ी, कोई कहे बड़ा दास । कोई कहे विवेक बड़ा, कोई कहे विस्वास ॥१०॥
कोई कहे स्वांत बड़ी, कोई कहे तामस । कोई कहे पन बड़ा, यों खेलें परे परवस ॥११॥
कोई कहे सदा सिव बड़ा, कोई कहे आद नारायन । कोई कहे आदे आद माता, यों करत तानों तान ॥१२॥
कोई कहे आतम बड़ी, कोई कहे परआतम । कोई कहे अहंकार बड़ा, जो आद का उतपन ॥१३॥
कोई कहे सकल व्यापक, देखीतां सब ब्रह्म । कोई कहे ए ना लह्या, यों करे लड़ाई भूले भरम ॥१४॥
कोई कहे सुन्य बड़ी, कोई कहे निरंजन । कोई कहे निरगुन बड़ा, यों लरें वेद वचन ॥१५॥
कोई कहे आकार बड़ा, कोई कहे निराकार । कोई कहे तेज बड़ा, यों लरें लिए विकार ॥१६॥
कोई कहे पारब्रह्म बड़ा, कोई कहे परसोतम । वेद के वाद अन्धकारे, करें लड़ाई धरम ॥१७॥
जाहेर झूठा खेलही, हिरदे अति अन्धेर । कहे हम सांचे और झूठे, यों फिरें उलटे फेर ॥१८॥
पंथ सारों की एह मजल, अनेक विध वैराट । ए जो विगत खेल की, सब रच्यो छल को ठाट ॥१९॥
कोई हेम गले अगनी जले, भैरव करवत ले । खसम को पावे नहीं, जो तिल तिल काटे देह ॥२०॥
भेख जुदे जुदे खेलहीं, जाने खेल अखंड । ए देत देखाई सब फना, मूल बिना ब्रह्मांड ॥२१॥
खसम एक सबन का, नाहीं दूसरा कोए । ए विचार तो करे, जो आप सांचे होए ॥२२॥
खेलें सब बेसुध में, कोई बोल काढ़े विसाल । उतपन सारी मोह की, सो होए जाए पंपाल ॥२३॥
बिना दिवालें लिखिए, अनेक चित्रामन । तो ए क्यों पावें खुद को, जाको मूल मोह सुंन ॥२४॥
अनेक किव इत उपजे, वैराट सचराचर । ए छल मोहोरे छल के, खेलत हैं सत कर ॥२५॥
॥ प्रकरण ॥१५॥ चौपाई ॥३६५॥
