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विषय-सूची

सनन्ध - प्रकरण १६

सनंध - वैराट की जाली

ए खेल रच्यो हम खातिर, सो देखन आइयां हम । ए जो प्यारे मेंहेंदी महंमद, जेती रूह मुस्लिम ॥१॥

ए खेल को कौन देखावहीं, कौन कहे याकी सुध । इमाम आप आए बिना, क्यों आवे वतनी बुध ॥२॥

आई बुध वतन की, तब खुले माएने कुरान । भी नेक बताऊं खेल या बिध, ज्यों होवे सब पेहेचान ॥३॥

वैराट का फेर उलटा, याको मूल है आकास । डालें पसरी पाताल में, यों कहे वेद प्रकास ॥४॥

फल डाल अगोचर, आड़ी अन्तराए पाताल । वैराट वेद दोऊ कोहेड़ा, गूंथी सो छल की जाल ॥५॥

बिध दोऊ देखिए, एक नाभ दूजा मुख । गूंथी जालें दोऊ जुगते, मान लिए दुख सुख ॥६॥

कोहेड़े दोऊ दो भांत के, एक वैराट दूजा वेद । जीव जालों जाली बंधे, कोई जाने न याको भेद ॥७॥

देखलावने मोमिन को, कोहेड़े किए एह । बताए देऊं आंकड़ी, छल बल की है जेह ॥८॥

आंकड़ी एक इन भांत की, बांधी जोर सों ले । रूह झूठी देखहीं, सांची देखे देह ॥९॥

करे सगाई देहसों, नहीं रूहसों पेहेचान । सनमंध पालें इनसों, एह लई सबों मान ॥१०॥

न्हवाए चरचे अरगजे, प्रीते जिमावें पाक । सनेह करके सेवहीं, पर नजर बांधी खाक ॥११॥

रूह गई जब अंग थें, तब अंग हाथों जालें । सेवा जो करते सनेहसों, सो सनमंध ऐसा पालें ॥१२॥

हाथ पांव मुख नेत्र नासिका, सोई अंग के अंग । तिन छूत लगाई घर को, प्यार था जिन संग ॥१३॥

अंग सारे प्यारे लगते, खिन एक रहयो न जाए । चेतन चले पीछे सो अंग, उठ उठ खाने धाए ॥१४॥

सनमंधी जब चल गया, अंग वैर उपज्या ताए । सो तबहीं जलाए के, लियो सो घर बटाए ॥१५॥

छोड़ सगाई रूह की, करें सगाई आकार । वैराट कोहेड़ा या विध, उलटा सो कई प्रकार ॥१६॥

कई विध यों उलटा, वैराट नेत्रों अंध । चेतन बिना कहे छूत लागे, फेर तासों करे सनमंध ॥१७॥

एक भेख जो विप्र का, दूृजा भेख चंडाल । जाके छुए छूत लागे, ताके संग कौन हवाल ॥१८॥

चंडाल हिरदे निरमल, संग खेले भगवान । देखावे नहीं काहू को, गोप राखे नाम ॥१९॥

अंतराए नहीं खिन की, सनेह सांचो रंग । रात दिन नजर रूह की, नहीं वजूद सों संग ॥२०॥

विप्र भेख बाहेर दृष्टी, खट करम पाले वेद । स्याम खिन सुपने नहीं, जाने नहीं ब्रह्म भेद ॥२१॥

उदर कुटम कारने, उतमाई देखावे अंग । व्याकरण वाद विवाद के, अर्थ करें कई रंग ॥२२॥

अब कहो काके छुए, अंग लागे छोत । अधम तम विप्र अंगे, चंडाल अंग उद्दोत ॥२३॥

पेहेचान सबों वजूद की, नहीं रूह की दृष्ट । वैराट का फेर उलटा, या विध सारी सृष्ट ॥२४॥

एक देखो अचरज, चाल चले संसार । जाहेर है ए उलटा, जो देखिए दिल विचार ॥२५॥

सांचे को झूठा कहे, झूठे को कहे सांच । ए भी देखाऊं जाहेर, सब रहे झूठे रांच ॥२६॥

आकार को निराकार कहे, निराकार को आकार । आप फिरे सब देखे फिरते, ए असत यों निरधार ॥२७॥

मूल बिना वैराट खड़ा, यों कहे सब संसार । तो ख्वाब के जो दम आपे, ताए क्यों कहिए आकार ॥२८॥

आकार न कहिए तिनको, काल को जो ग्रास । काल सो निराकार है, आकार सदा अविनास ॥२९॥

जिन रांचो मृग जल दृष्टें, जाको नाम प्रपंच । ए छल गफलत को कियो, ऐसो रच्यो उलटो संच ॥३०॥

॥ प्रकरण ॥१६॥ चौपाई ॥३९५॥

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