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विषय-सूची

सनन्ध - प्रकरण १८

सनंध हांसी की

मोमिन यामें न रांचहीं, जाको सांचसों सनेह । निपट ए कछुए नहीं, भी देखो नेक बिध एह ॥१॥

ए जो पीर मुरीद दोऊ कहे, कुफरान या दज्जाल । अर्स रूहों को देखाए के, उड़ाए देसी ए ताल ॥२॥

ए छल ऐसा तो रच्या, जो तुम मांग्या देखन । जिन तुम बांधो आप को, अर्स के मोमिन ॥३॥

जो कोई रूहें निसबती, ए हांसी का है ठौर । खसम वतन आप भूल के, कहा देखत हो और ॥४॥

मोमिनों तुम को उपज्या, खेल देखन का ख्याल । जाको मूल नहीं बांधे तिन, ए तो हांसी का हवाल ॥५॥

मांग्या खेल खुसाली का, तिन फेरे तुमारे मन । सो सब तुमको बिसरे, जो कहे मूल वचन ॥६॥

गूंथो जालें दोरी बिना, आप बांधत हो अंग । अंग बिना तलफत हो, ए ऐसे खेल के रंग ॥७॥

आप बंधाने आप से, इन कोहेड़े अंधेर । चढ़या अमल जानों जेहेर का, फिरत वाही के फेर ॥८॥

अमल चढ़या क्यों जानिए, कोई फिसलत कोई गिरत । कोई सावचेत होए के, हाथ पकर सीढ़ी चढ़त ॥९॥

ना सीढ़ी ना पावड़ी, ए चढ़त पड़त क्यों कर । ए देखन जैसी हांसी है, देखो मोमिनों दिल धर ॥१०॥

एक पड़त बिना पावड़ी, वाको दूजी पकड़े कर । सो खाए दोनों गड़थले, ए हांसी है इन पर ॥११॥

एक पड़ी जिमी जान के, वाको दूृजी उठावन जाए । उलट पड़ी सो उलटी, ए हांसी यों हँसाए ॥१२॥

ओठा लेवे जिमी बिना, पांव बिना दौड़ी जाए । जल बिना भवसागर, तिनमें गोते यों खाए ॥१३॥

अमलक देखो खड़ियां, हाथ बिना हथियार । नींद बड़ी है जागते, पिंड बिना आकार ॥१४॥

एक नई कोई आवत, सो कहावत आप अबूझ । दूजी ताए समझावने, ले बैठत सब सूझ ॥१५॥

वचन करड़े कोई कहे, किनसों सहे न जाए । पीछे कलपे दोऊ कलकले, वाको अमल यों ले जाए ॥१६॥

लर खीज रोए रोलावहीं, दुख देखे दोऊ जन । जागे पीछे जो देखिए, तो कमी न मांहें किन ॥१७॥

हांसी होसी मोमिनों, इन खेल के रस रंग । पूर बिना बहे जात हैं, कोई खैंच निकाले अभंग ॥१८॥

ना जल ना कछू पूर है, कौन बहे कौन आड़ी होए । ए अमल इन जिमी का, तुमें देखावत विध दोए ॥१९॥

होसी खुसाली मोमिनों, करसी मिल कलोल । ए हांसी या बिध की, कोई नाहीं खेल या तोल ॥२०॥

ए खेल देखो हांसी का, आसमान लों पाताल । फल फूल पात ना दरखत, काष्ट तुचा मूल न डाल ॥२१॥

ए बिरिख तो या बिध का, ताको फल चाहे सब कोए । फेर फेर लेने दौड़हीं, ए हांसी या बिध होए ॥२२॥

बंध ना खुले बिना बंधे, जो खोले फेर फेर । ए बुत कुदरत देख के, गैयां आप खसम बिसर ॥२३॥

अब याद करो खसम को, छोड़ो नींद विकार । पेहेचान कराए इमाम सों, सुफल करूं अवतार ॥२४॥

वतन खसम देखाए के, और अपनी असल पेहेचान । इमाम नूर रोसन करके, उड़ाए देऊं उनमान ॥२५॥

हकें कह्या अरवाहों उतरते, हम बैठे बीच लाहूत । तुम अर्स भूलो आप हमको, देखो नहीं बीच नासूत ॥२६॥

हम अर्स रूहें आसिक, हक मासूक भूलें क्यों कर । क्या चले खेल फरेब का, तुम आगूं देत हो खबर ॥२७॥

ए जिमी हांसी देख के, मोमिन हूजो सावचेत । इमाम को सुख महामती, तुमको जगाए के देत ॥२८॥

॥ प्रकरण ॥१८॥ चौपाई ॥४६४॥

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