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विषय-सूची

सनन्ध - प्रकरण १९

सनंध कलमें की

ए जो फरेब तुम देखिया, और देखे फरेब के मजहब । ए तो सब तुम समझे, गुझ जाहेर करहूं अब ॥१॥

ऐसा था फरेब अंधेर का, कहूं हाथ न सूझे हाथ । बंध पड़े नजर देखते, तामें आई रूहें जमात ॥२॥

खेल देखन कारने, करी उमेद एह । ए माप्या तुम वास्ते, कोई राखों नहीं संदेह ॥३॥

ए खेल किया रूहों वास्ते, ए जो मोमिन आइयां जेह । खेल देख जाए वतन, बातें करसीं एह ॥४॥

मोमिन बातें वतन की, देऊंगी आगे बताए । पर अब कहूं नेक दीन की, जो रसूलें राह चलाए ॥५॥

जो अलहा किनहूं न लह्या, मैं तिनका कासद । अर्स रूहों वास्ते आइया, मेरे हाथ कागद ॥६॥

कह्या रसूलें जाहेर, खबर खुद की मुझ । कोई और होवे तो पोहोंचही, अब जाहेर करहों गुझ ॥७॥

जो चौदे तबकों में नहीं, वार न काहूं पार । सो अलहा हम आवसी, खातिर सोहागिन नार ॥८॥

ले फुरमान जो हाथ में, केहेलाया मैं रसूल । ए देखो अरवाहें अर्स की, जिन कोई जावें भूल ॥९॥

काफर मुस्लिम मोमिन की, सोई करसी पेहेचान । हकीकत मारफत के, खोलसी द्वार कुरान ॥१०॥

अबलों बेवरा ना हुआ, कई चली गई जहान । एक दीन जब होवहीं, तब होसी सबों पेहेचान ॥११॥

जो माएने न पाए बातून, तो हुए जुदे जुदे मांहें दीन । फिरके हुए तिहत्तर, एक नाजी में कह्या आकीन ॥१२॥

और बहत्तर नारी कहे, करी एक को हकें हिदायत । कुरान माजजा नबी नबुवत, सो नाजी करसी साबित ॥१३॥

सो साबित तब होवहीं, जब सब होवे दीन एक । पेहेले कह्या रसूल ने, एही उमत नाजी नेक ॥१४॥

सब कोई बुजरक कहावते, आप अपने मजहब । तिन सबों समझावहीं, एक दीन होसी तब ॥१५॥

झूठ सबे उड़ जाएसी, ना चले तिन बखत । हक हादी के प्रताप थें, क्यों रेहेवे गफलत ॥१६॥

तब लों रसमें लरत हैं, जब लों है उरझन । रूहअल्ला कुंजी ल्याइया, तब जोरा न चलसी किन ॥१७॥

जब सांच उठ खड़ा हुआ, तब कुफर रेहेवे क्यों कर । जोलों कायम दिन ऊग्या नहीं, है तोलों रात कुफर ॥१८॥

ए खेल हुआ जिन खातिर, सो गए खेल में मिल । जब जाहेर साहेब हुआ, तब सबों नजर आवे दिल ॥१९॥

महंमद पेहेलें आए के, बरसाया हक का नूर । कई बिध करी मेहेरबानगी, पर किने ना किया सहूर ॥२०॥

ए सहूर तो करे, जो होए अर्स अरवाहें । जिन उमत के खातिर, आवसी इत खुदाए ॥२१॥

जो अर्स रूहें आईं होती, तो काहे को कौल करत । सो कह्या पीछे आवसी, ए सोई लेसी हकीकत ॥२२॥

अर्स रूहें होए सो मानियो, अंदर आन आकीन । ए कलमा जो समझहीं, सोई महंमद दीन ॥२३॥

ए कलमा मुख लाखों कहे, पर माएने न समझे कोए । इन कलमें मगज सो समझहीं, जो अर्स अजीम की होए ॥२४॥

जो लों रेहेमान न जाहेर, रहो बंदे बाब पकर । मैं हुकम छोड़ चलसी, फेर आवसी भेले आखिर ॥२५॥

एक ए भी रसूलें कह्या, करी आगे की सरत । साथ आवसी इमाम के, रूह मोमिन बड़ी मत ॥२६॥

नूर मत जाहेर होएसी, तब जानो हुई आखिर । तब मौला हम आवसी, इन मोमिनों की खातिर ॥२७॥

इत कजा जो करने बैठसी, तब हम काजी संग । वरन बदलसी दुनियां, पर ए दीन कायम रंग ॥२८॥

इमाम इत आवसी, सो भी मोमिनों के कारन । देसी सुख मोमिन को, कजा होसी सबन ॥२९॥

एता भी रसूलें कह्या, मोमिनों में आकीन । बिना आकीन सब उड़सी, एक रेहेसी हमारा दीन ॥३०॥

जिन सिर लई बात रसूल की, कदम पर धरे कदम । इन कलमें के हक से, न्‍यारा नहीं खसम ॥३१॥

जिन ए कलमा हक किया, मैं तिनका जामिन । सो आपे अपने दिल में, साख जो देसी तिन ॥३२॥

इन कलमें के माएने, लेकर भरसी पाए । तिन मोमिन को खसम, सुख जो देसी ताए ॥३३॥

कहा कहूं इन कलमें की, मोमिनों में पेहेचान । जब ए कलमा पसरया, तब साफ हुई सब जहान ॥३४॥

जिन ए मेरा कलमा, लिया न मांहें बाहेर । सो दुनियां आखिर दिनों, जलसी आग जाहेर ॥३५॥

तब ए होसी आजिज, और मौला तो मेहेरबान । तब लेसी सबों को भिस्त में, देकर अपनों ईमान ॥३६॥

कछुक करके आकीन, कलमा सुनसी कान । तिन भी सिर कजा समें, लगसी जाए आसमान ॥३७॥

एह बात तेहेकीक है, मोमिनों दिल साबित । सब्द जो सारे मुझ पें, एक जरा नहीं असत ॥३८॥

देखन मोमिन खातिर, रचिया खेल सुभान । अब मोमिन क्यों भूलहीं, पाई हकीकत फुरमान ॥३९॥

जो सबों को अगम, सो सब रसूल नजर । तो रसूल मुस्लिम को, फिरे सों फुरमाए कर ॥४०॥

॥ प्रकरण ॥१९॥ चौपाई ॥५०४॥

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