सनन्ध - प्रकरण २०
सनंध फुरमान की
फुरमान ल्याया जो रसूल, पर समझया नाहीं कोए । जिन खातिर ले आइया, ए समझेगी रूह सोए ॥१॥
कछुक नबिऐं जाहेर किए, ए जो बंदगी सरियान । केतेक हरफ रखे गुझ, सो करसी मेंहेंदी बयान ॥२॥
और भी केतेक सुने रसूलें, पर सो चढ़े नहीं फुरमान । सो मेंहेंदी अब खोलसी, इमाम एही पेहेचान ॥३॥
माएने इन मुसाफ के, कोई खोल न सके और । कह्या रसूलें इमाम थें, जाहेर होसी सब ठौर ॥४॥
मगज माएने मुसाफ के, सो होए न इमाम बिन । सो इत बोहोतों देखिया, पर सुध ना परी काहू जन ॥५॥
गुझ का गुझ कौन पावहीं, बिना मेंहेंदी इमाम । ए रूह अल्ला जानहीं, मेरे अल्ला के कलाम ॥६॥
ए क्यों उपज्या है क्या, क्यों कयामत संग सुभान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥७॥
क्यों फरेब से न्यारे रहिए, क्यों चलिए सरियान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥८॥
रूह कौन मोमिन कौन मुस्लिम, कौन रूह कुफरान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥९॥
तीन रूहों की तफावत, कौन कौन ठौर निदान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥१०॥
क्यों इस्क क्यों बंदगी, क्यों गफलत गलतान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥११॥
क्यों पाक ना पाक क्यों, क्यों रेहेनी फुरमान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥१२॥
क्यों उजू निमाज क्यों, क्यों कर बांग बयान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥१३॥
क्यों कसौटी अंग की, क्यों रोजे रमजान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥१४॥
क्यों सुंनत क्यों इंद्रियां, क्यों राखे कैद आन । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥१५॥
क्यों तसबी क्यों फेरनी, क्यों कर नाम लेहेलान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥१६॥
क्यों डर क्यों बेडर, क्यों खूंनी मेहेरबान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥१७॥
क्या खाना क्या पीवना, क्या जो सुनना कान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥१८॥
क्या लेना क्या छोड़ना, क्या इलम क्या ग्यान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥१९॥
क्यों भली बुरी क्यों, क्यों कर जान अजान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥२०॥
कौन वैरी कौन सजन, क्यों कर सब समान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥२१॥
क्या हक क्या हराम, क्या नफा नुकसान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥२२॥
क्यों आवन क्यों गवन, क्यों कर विरहा मिलान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥२३॥
एक खेल दूजा देखहीं, थिर चर चारों खान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥२४॥
ए किया जिन खातिर, आदम और हैवान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥२५॥
कौन आप और कौन पर, कौन सकल जहान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥२६॥
क्यों बाहेर क्यों अंदर, क्यों अंतर के निसान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥२७॥
कहां भिस्त कहां दोजख, क्यों जलसी कुफरान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥२८॥
क्यों आदम क्यों पैगंमर, क्यों फिरस्ते पेहेचान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥२९॥
कलमें दीन रसूल की, सुध मुस्लिम फुरमान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥३०॥
रसूल आए किन वास्ते, किन पर ल्याए फुरमान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥३१॥
क्यों हुकम क्यों कर हुआ, किन बिध लीजे मान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥३२॥
एकों क्यों कर मानिया, क्यों लिया न दूजे मान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥३३॥
किन मान्या न मान्या किन, किन फेरया फुरमान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥३४॥
क्यों कैद बेकैद क्यों, क्यों दोऊ दरम्यान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥३५॥
क्यों ए इंड खड़ा किया, क्यों करी सरत फना निदान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥३६॥
क्यों बड़ी अकल आगे आवसी, क्यों आखिर के निसान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥३७॥
बंदगी वजूद नफसानी, नासृूत बीच सरियान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥३८॥
क्यों दिल की बंदगी तरीकत, मलकूत या ला-मकान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥३९॥
नासूत मलकूत जबरूत, लाहूत चौथा आसमान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥४०॥
क्यों रूहें भेद छिपी हजूरी, बंदगी हादी संग आसान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥४१॥
मलकूत ऊपर जो जुलमत, नाम बुरका ला-मकान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥४२॥
सरियत तरीकत हकीकत, मारफत हक पेहेचान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥४३॥
बेचून बेचगून बेसबी, कहे बेनिमून निदान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥४४॥
निराकार निरंजन सुन्य की, ब्रह्म व्यापक मांहें जहान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥४५॥
पुरूख प्रकृती काल की, ईश्वर महाविष्णु उनमान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥४६॥
सदरतुल मुंतहा अर्स अजीम, नूर जमाल सूरत सुभान । ए सब इमाम खोलसी, करसी जाहेर माएने कुरान ॥४७॥
नूर पार नूर तजल्ला, पोहोंचे रसूल रूहअल्ला हजूर । ए सब इमाम खोलसी, जो दोनों किया मजकूर ॥४८॥
क्यों नूर क्यों नूर तजल्ला, क्यों कर वतन खसम । खोलसी माएने इमाम, खातिर मोमिनों हम ॥४९॥
चौदे तबक की बात जो, सो तो केहेसी सकल जहान । पर लैलतकदर मेंहेदी बिना, क्यों खुले माएने कुरान ॥५०॥
ए जो पूछे माएने, खोल दिए कदी सोए । तो इनसे चौदे तबक में, क्यों कर कजा जो होए ॥५१॥
लुगे लुगे के माएने, जो कोई निकसे बोल । ए कजा तब होवहीं, जब दीजे माएने सब खोल ॥५२॥
ए नूर के पार के माएने, सो सारों को अगम । एक लुगा बिना इमाम, निकसे ना मुख दम ॥५३॥
जब माएने खुले मुसाफ के, बैठे इमाम जाहेर होए । तब ए दुनी जुदी जुदी, क्यों कर रहसी कोए ॥५४॥
सो इमाम जाहेर हुए, ले माएने कुरान । नूर सबों में पसरया, एक दीन हुई सब जहान ॥५५॥
ए तो करी इसारत, पर बोहोत बड़ी है बात । नूर बड़ो इमाम को, सो या मुख कह्यो न जात ॥५६॥
ए नूर खुद वतनी, सो क्यों कर सह्यो जाए । नूर मत आगे तो करी, जाने जिन कोई गोते खाए ॥५७॥
इमाम आए तब जानिए, जब खुले माएने कुरान । तब जानों आखिर हुई, सुख दिया सब जहान ॥५८॥
आद करके अबलों, परदा न खोल्या किन । सो बरकत मेंहेंदी महंमद, खुल जासी सब जन ॥५९॥
लोक जाने ज्यों और है, ए भी फुरमान तिन रीत । पर दिल के अंधे न समझहीं, ए फुरमान सब्दातीत ॥६०॥
ए कागद नहीं फरेब का, और कागद सब छल । अबहीं इमाम देखावहीं, रसूल किताब का बल ॥६१॥
॥ प्रकरण ॥२०॥ चौपाई ॥५६५॥
