सनन्ध - प्रकरण २१
सनंध - मुस्लिम की रेहेनी
सुनियो अब मोमिनों, ए केहेती हों सब तुम । जब तोड़ी आइयां नहीं, इमाम के कदम ॥१॥
मैं चाहों मोमिन को, हम तुम एकै अंग । मैं तबहीं सुख पाऊंगी, मेंहेंदी महंमद मोमिन संग ॥२॥
आए ईसा मेंहेंदी महंमद, मोमिन आवसी कदम । हनोज लो कबूं ना हुई, सो होसी नई रसम ॥३॥
बड़ा मेला इत होएसी, आए खुद खसम । बखत भला साहेब दिया, भाग बड़े हैं तुम ॥४॥
नेक कहूं राह मुस्लिम की, जो देखाई रसूलें मेहेर कर । भूले अवसर पछताइए, सो कहूं सुनो दिल धर ॥५॥
पेहेले तो सब भूलियां, मैं तो कहूं तुमें हक । देखो हाथ में नूर खुदाए का, फरेब में हुए गरक ॥६॥
केहे फुरमान इनों हाथ में, मेहेर कर दिया रसूल । जाहेर तुमको बताइया, सो भी गैयां तुम भूल ॥७॥
जो जाहेर है तुम पे, माएने इन कुरान । एते दिन न समझे, अब नेक देऊं पेहेचान ॥८॥
फैलाव ऊपर का न करूं, नेक देऊं मगज बताए । ज्यों वतन की सुध परे, सब पकड़ें इमाम के पाए ॥९॥
ए जो तुमको रसूलें, दिए माएने खोल । जाहेर किए न ले सके, कहूं सो दो एक बोल ॥१०॥
कहो कलमा हक कर, ल्यो माएने कुरान । पाक दिल रूह पाक दम, या दीन मुसलमान ॥११॥
पांच बखत सल्ली करे, दिल दरदा आन सुभान । सुने ना कान कुफार की, या दीन मुसलमान ॥१२॥
कसनी लेवे आप सिर, साफ रोजे रमजान । रात दिन याही जोस में, या दीन मुसलमान ॥१३॥
माएने ले चीन्हें आपको, करे रसूल पेहेचान । वतन सुध करे हक की, या दीन मुसलमान ॥१४॥
रसूल आए किन ठौर से, किन वास्ते जिमी हैरान । ए सुध सारी लेवहीं, या दीन मुसलमान ॥१५॥
किन भेज्या आया कौन, ल्याया हक का फुरमान । ए सहूर करके समझहीं, या दीन मुसलमान ॥१६॥
सारे सबद रसूल के, सिर लेवे हक जान । नूर नबी के मगन, या दीन मुसलमान ॥१७॥
कलाम अल्ला कुरान में, दिल दे करे प्रवान । अंदर आकीन उजले, या दीन मुसलमान ॥१८॥
ए जो कुदरत गफलती, चौदे तबक की जहान । ए फरेब नीके समझहीं, या दीन मुसलमान ॥१९॥
ए सब खेल खसम का, बनिआदम हैवान । एकै नजरों देखहीं, या दीन मुसलमान ॥२०॥
न्यारा रहे सबन थें, ए जो बीच जिमी आसमान । संग करे खुद दरदी का, या दीन मुसलमान ॥२१॥
भली बुरी किनकी नहीं, डरता रहे सुभान । सोहोबत खूनी की ना करे, या दीन मुसलमान ॥२२॥
यामें कोई ना बिराना अपना, ए देखे सब समान । यासें न्यारे जाने मोमिन, या दीन मुसलमान ॥२३॥
ए जुदे नीके जानहीं, मोमिन मुस्लिम कुफरान । पेहेचान जुदी सब रूहों की, या दीन मुसलमान ॥२४॥
मेहेर दिल मोमिन के, इस्क अंग रेहेमान । दाग न देवे बैठने, या दीन मुसलमान ॥२५॥
जो रूह होवे मुस्लिम, सो संग ना करे कुफरान । आसिक खुद खसम की, या दीन मुसलमान ॥२६॥
जो रूह भूली आप को, मुस्लिम कलमे पेहेचान । तिनको वतन बतावहीं, या दीन मुसलमान ॥२७॥
साफ रखे सबों अंगों, ज्यों छींट ना लगे गुमान । बांधे दिल गरीबी सों, या दीन मुसलमान ॥२८॥
रेहेवे निरगुन होए के, और निरगुन खान पान । नजीक न जाए बदफैल के, या दीन मुसलमान ॥२९॥
प्यारा नाम खुदाए का, फेरे तसबी लगाए तान । रात दिन लहे बंदगी, या दीन मुसलमान ॥३०॥
दरदा ले द्वारे खड़ी, खसम की गलतान । रूह लगी रसूलसों, या दीन मुसलमान ॥३१॥
हराम छोड़ हक लेवही, ए जो करी बयान । आपा रखे आप वस, या दीन मुसलमान ॥३२॥
साफ दिल ईमान सों, करे बावन मसले अरकान । ए बिने जाने इसलाम की, या दीन मुसलमान ॥३३॥
मुस्लिम सारे केहेलावहीं, पर ना सुध हकीकत । ना सुध रसूल ना खसम, ना सुध या गफलत ॥३४॥
जो अंदर झूठी बंदगी, देखलावे बाहेर । तिनको मुस्लिम जिन कहो, वह ख्वाबी दम जाहेर ॥३५॥
तो होए कबूल मुस्लिम, जो पोहोंचे मजल इन । जोलों होए न हजूर बंदगी, खुले मुसाफ हकीकत बिन ॥३६॥
इसलाम बड़ा मरातबा, जो करे अपनी पेहेचान । जुलमत नूर उलंघ के, पोहोंचे नूर बिलंद मकान ॥३७॥
केहेलाए मुस्लिम पकड़े वजूद, पाँउ चले राह ऊपर । क्यों न कटाए पुलसरातें, जो रसूलें देखाई जाहेर कर ॥३८॥
जिन दिल पर सैतान पातसाह, सो ना पाक बड़ा पलीत । खूंन करे खिन में कई, दिल पाक होए किन रीत ॥३९॥
दिल पाक जोलों होए नहीं, कहा होए वजूद ऊपर से धोए । धोए वजूद पाक दिल, कबहूं न हुआ कोए ॥४०॥
पाक हुआ दिल जिनका, तिन वजूद जामा पाक सब । हिरस हवा सब इंद्रियां, तिन नहीं नापाकी कब ॥४१॥
हलाल हलाल सब कोई कहे, पूछो हादी सिरदार । जिन दिल हुआ अर्स हक का, तिन दुनी करी मुरदार ॥४२॥
दिल अर्स मोमिन कह्या, तित आए हक सुभान । सो दिल पाक औरों करे, जाए देखो मगज कुरान ॥४३॥
पाँउ तो कोई ना भर सक्या, उमेद करी सबन । सो महंमद मेंहेंदी आए के, नीयत पोहोंचाई तिन ॥४४॥
ए कलमा जिन कानो सुन्या, ताए भी देसी सुख । तो मुस्लिम का क्या केहेना, जो हक कर केहेवे मुख ॥४५॥
ए कलमा जिन जिमिऐं, किया होए पसार । तिन जिमी के लोक को, जिन कोई कहो कुफार ॥४६॥
बांग आवाज कानों सुनी, कुफर कहिए क्यों ताए । सो रूह आखिर कजा समें, औरों भी लेसी बचाए ॥४७॥
इन कलमें के सब्द से, सब छूटेगा संसार । तो कहा कहूं मैं तिनको, जिन पेहेचान कह्या नर नार ॥४८॥
ए कलमा इन दुनी का, सब दुख करसी दूर । तिनको भी भिस्त होएसी, जिनके नहीं अंकूर ॥४९॥
तबक चौदे जो कोई, रूह होसी सकल । इन कलमें की बरकतें, तिन सुख होसी नेहेचल ॥५०॥
दीन होए के चलसी, दरदी रसूल रेहेमान । बोहोत कह्या है रसूलें, ताकी नेक करी है बयान ॥५१॥
ए तो जाहेर की कही, अब गुझ कहूंगी तुम । जो बयान रसूलें ना किए, मोमिन वतन खसम ॥५२॥
गुझ माएने कौन लेवहीं, जो जाहेर लिए न जाए । ए सब खोले रसूलें, जो मैं दिए बताए ॥५३॥
कोई जाहेर ना ले सके, तो गुझ होसी किन पर । हम जो लिए जाहेर, नेक ए भी सुनो खबर ॥५४॥
॥ प्रकरण ॥२१॥ चौपाई ॥६१९॥
