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विषय-सूची

सनन्ध - प्रकरण २२

सनंध - अर्स अरवाहों के लछन

गुझ तो तुमको कहूंगी, सक न राखूं किन । पर पेहेले कहूं नेक मोमिनों, जो हमारा चलन ॥१॥

बयान किए जो रसूलें, हम सोई लिए जाहेर । लाख बेर कह्या रसूलें, जन जन सों लर लर ॥२॥

कोट बेर जाहेर सबों, रसूलें फुरमाया जेह । सो कलमा सिर लेए के, पाँउ भरे हम एह ॥३॥

बड़ा जाहेर ए माएना, कहे हक पें ल्याया फुरमान । इन कलमे की दोस्ती, कह्या मिलसी रेहेमान ॥४॥

खातिर तुम अर्स मोमिन, मैं ल्‍याया हक फुरमान । कौल करत हों तेहेकीक, इत ल्याऊं बुलाए सुभान ॥५॥

जो किनहूं पाया नहीं, ना कछू सुनिया कान । तिन का जामिन होए के, मैं इत मिलाऊं आन ॥६॥

अब रूहें जो अर्स मोमिन, तिन कहा चाहियत है और । रसूल कहे जानो हक, काजी कजा होसी इन ठौर ॥७॥

जाहेर हक देखाइया, हम लिए माएने ए । एही कलमा रसूल का, हम सिर चढ़ाया ले ॥८॥

जाहेर दुलहा छोड़ के, ढूंढ़त माएने गुझ । ए खोज तिनों की देख के, होत अचम्भा मुझ ॥९॥

हम याही फुरमान के, लिए माएने जाहेर । रूह बांधी रसूल सों, जिन हक की कही खबर ॥१०॥

हाथ पकड़ देखावहीं, आप आए दरम्यान । ए छोड़ और जो ढूंढ़हीं, तिन दिल आंख न कान ॥११॥

मोमिन थे सो समझे, ए तो सीधा कह्या महंमद । ना मैं जिमी आसमान का, खबर जो ल्याया खुद ॥१२॥

और माएने सो ढूंढ़हीं, ठौर ना जाको दिल । रसूल रहीम मिलावहीं, और ढूंढ़े कहा बेअकल ॥१३॥

हम तो एही हक किया, जाहेर रसूल बोल । ए छोड़ और ना देखहीं, हम एही लिया सिर कौल ॥१४॥

एही हमारा आकीन, हम लिया हक कर । आकीन कह्या रसूल का, सब देखावे नजर ॥१५॥

देखाया रसूल ने, सो लीजो आप चेतन । अंकूर अपना देखिए, ज्यों याद आवे वतन ॥१६॥

जिन खातिर ए रसूल, ले आया फुरमान । हम ले आकीन चले जिन बिध, नेक ए भी करूं बयान ॥१७॥

अर्स अरवाहें मेरी बोहोत हैं, नेक तिनके कहूं लछन । वतन हक आप भूलियां, तो भी मोमिन एही चलन ॥१८॥

अर्स अजीम की जो रूहें, तिनकी ए पेहेचान । जो कदी भूली वतन, तो भी नजर तहां निदान ॥१९॥

आसिक खुद खसम की, कोई प्रेम कहो विरहिन । ताए कोई दरदन कहो, ए बिध अर्स रूहन ॥२०॥

रूह खसम की क्यों रहे, आप अपने अंग बिन । पर हकें पकड़ी अंतर, ना तो रहे ना तन ॥२१॥

ऊपर काहूं ना देखावहीं, जो दम न ले सके खिन । सो आसिक जाने मासूक की, एही मोमिन विरहिन ॥२२॥

मोमिन आकीन न छूटहीं, जो पड़े अनेक विघन । आसिक मासूक वास्ते, जीव को ना करे जतन ॥२३॥

रेहेवे निरगुन होए के, और आहार भी निरगुन । साफ दिल रूह मोमिन, कबहूं न दुखावे किन ॥२४॥

मोमिन खोजे आप को, और खोजे कहां है घर । खोजे अपने खसम को, और खोजे दिन आखिर ॥२५॥

खोज मोमिन ना थके, जोलों पार के पारै पार । नित खोजे चरनी चढें, नए नए करे विचार ॥२६॥

खोज खोज और खोजहीं, आद के आद अनाद । पल पल नूर बढ़ता, श्रवनों एही स्वाद ॥२७॥

फुरमान हाथों ना छूटहीं, जोलों पाइए हक वतन । मासूक वतन पाए बिना, दरद ना जाए निसदिन ॥२८॥

मोमिन अंदर उजले, खिन खिन बढ़त उजास । देह भरोसा ना करें, इमाम मिलन की आस ॥२९॥

ज्यों ज्यों माएने विचारहीं, त्यों बेधे सकल संधान । रोम रोम ताए बेधहीं, सब्द रसूल के बान ॥३०॥

मोमिन अंग कोमल, ताए बान निकसें फूट । गलित गात सब भीगल, सब अंगों टूक टूक ॥३१॥

खिन खेलें खिन में हंसें, खिन में गावें गीत । खिन रोवें सुध ना रहे, एही मोमिन की रीत ॥३२॥

हक बातें खेलें हंसें, और गीत पिया के गाए । रोवें उरझे पिउ की, और बातन सों मुरछाए ॥३३॥

मोमिन दरदा ना सहे, जब जाहेर हुए पिउ । मोमिन अंग पिउ का, पिउ मोमिन अंग जिउ ॥३४॥

जोलों सुध ना मासूक की, मोमिन अंग में पिउ । जब मासूक जाहेर हुए, आसिक ले खड़ी अंग जिउ ॥३५॥

बोहोत निसानी और हैं, अर्स अरवा मोमिन । सो इन जुबां केते कहूं, मेरे वतनी के लछन ॥३६॥

जो होवे अर्स अजीम की, सो निरखो अपने निसान । ए लछन मोमिन वतनी, सो देखो दिल में आन ॥३७॥

मोमिन रूहें अर्स की, ए समझ लीजो तुम दिल । ठौर ठौर से आए मोमिन, सुख लेसी सब मिल ॥३८॥

ए केहेती हों मोमिन को, जिन अर्स बका में तन । सो कैसे ढांपी रहें, सुन के एह वचन ॥३९॥

ए सब्द सुन मोमिन, रेहे न सकें पल । तामें मूल अंकूर को, रहे न पकरयो बल ॥४०॥

जब साहेब की सुध सुनी, तब जाए ना रह्यो रूहन । ओ ख्वाबी दम भी ना रहें, तो क्यों रहें अर्स मोमिन ॥४१॥

मोमिन पाए कदम हादी के, खोल द्वार लिए हजूर । पट खोल दिया फुरमान का, पल पल बरसत नूर ॥४२॥

खाना पीना दीदार, रोजा निमाज दीदार । एक दोस्ती जानें हक की, दुनी सब करी मुरदार ॥४३॥

केतेक ठौर हैं मोमिन, तिन सब ठौरों है उजास । पर इतथें नूर पसरया, तब ओ ले उठसी प्रकास ॥४४॥

कोई दिन हम छिपे रहे, सो भी मोमिनों के सुख काज । जो होवें नेक जाहेर, तो रहे न पकरयो अवाज ॥४५॥

मैं नूर अंग इमाम का, खासी रूह खसम । सुख देऊं जगाए के, मोमिन रूहें तले कदम ॥४६॥

रूहों को अर्स देखावने, उलसत मेरे अंग । करने बात मासूक की, मावत नहीं उमंग ॥४७॥

नए नए रंग रूह मोमिन, आवत हैं सिरदार । बड़ो सुख होसी कयामत, नहीं इन सुख को पार ॥४८॥

आसिक आवत मासूक की, ताको छिपो राखों उजास । राह देखों और रूहन की, सब मिल होसी विलास ॥४९॥

नूर इमाम इन भांत का, कबूं जो निकसी किरन । तो पसरसी एक पलमें, चारों तरफों सब धरन ॥५०॥

क्यों रहे प्रकास पकरयो, इमाम नूर अति जोर । मैं राखत हों ले हुकम, ना तो गई रैन भयो भोर ॥५१॥

नूर बड़ो इमाम को, सो क्यों ढांपूं मैं अब । सुख लेने को या बखत, पीछे दुनी मिलसी सब ॥५२॥

मैं तुमको चेतन करूं, एही कसौटी तुम । या बिध अर्स अरवांहों का, तसीहा लेवें खसम ॥५३॥

सबद हमारे सुन के, उठी ना अंग मरोर । आसिक मासूक सब देखहीं, तुम इस्क का जोर ॥५४॥

ए सुनके दौड़ी नहीं, तो हांसी है तिन पर । जैसा इस्क जिनपें, सो अब होसी जाहेर ॥५५॥

जो इस्क ले मिलसी, सो लेसी सुख अपार । दरद बिना दुख होएसी, सो जानो निरधार ॥५६॥

जो किने गफलत करी, जागी नहीं दिल दे । सो इत दीन दुनी का, कछू ना लाहा ले ॥५७॥

लाहा तो ना लेवही, पर सामी हांसी होए । ए हांसी अर्स के मोमिन, जिन कराओ कोए ॥५८॥

जिन उपजे मोमिन को, इन हांसी का भी दुख । सो दुख बुरा रूहन को, जो याद आवे मिने सुख ॥५९॥

ना तो जिन जुबां में दुख कहूं, सो ए करूं सत टूक । तो एता रूहों खातिर, बिध बिध करत हों कूक ॥६०॥

जब दुख मेरी रूहन को, तब सुख कैसा मोहे । हम तुम अर्स अजीम के, अपने रूह नहीं दोए ॥६१॥

पेहेले फरेब देखाइया, पीछे महंमद दीन । कलमा जाहेर करके, देखाया आकीन ॥६२॥

माएने जाहेर कुरान के, कही बात नेक सोए । और गुझ भी करों जाहेर, अर्स वतनी जो कोए ॥६३॥

॥ प्रकरण ॥२२॥ चौपाई ॥६८२॥

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