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विषय-सूची

सनन्ध - प्रकरण २३

सनंध दिल मोमिन अर्स सुभान की

दिल हकीकी रूहें अर्स की, जामें आप आसिक हुआ सुलतान । तो कही गिरो ए रबानी, ए दिल मोमिन अर्स सुभान ॥१॥

जेता कोई दिल मजाजी, चढ़ सके न नूर मकान । दिल हकीकी पोहोंचे नूर तजल्ला, ए दिल मोमिन अर्स सुभान ॥२॥

रूहें उतरी लैलत कदर में, सो उमत रबानी जान । इनको हिदायत हक की, ए दिल मोमिन अर्स सुभान ॥३॥

होवे फारग दुनी के सोर से, ए दिल हकीकी निसान । करें हजूर बातून बंदगी, ए दिल मोमिन अर्स सुभान ॥४॥

हकें कौल किया जिन रूहन सों, सोई वारस हैं फुरकान । जिन वास्ते आए हक मासूक, ए दिल मोमिन अर्स सुभान ॥५॥

याही वास्‍ते इमाम रूह अल्ला, आए उतर चौथे आसमान । कौल किया लाहूत में इनों से, ए दिल मोमिन अर्स सुभान ॥६॥

ए गिरो कई बेर बचाई तोफान से, और डुबाई कुफरान । एही उमत खास महंमदी, ए दिल मोमिन अर्स सुभान ॥७॥

एही नाजी फिरका तेहत्तरमा, जिनमें लुदंनी पेहेचान । खोलें हक इसारतें रमूजें, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥८॥

हरफ मुकता इनों वास्ते, रखे बातून मांहें फुरमान । सो खासे करसी जाहेर, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥९॥

हकें सिफत लिखी नामें पैगंमरों, बीच हदीसों कुरान । सो कही सिफत सब महंमद की, ए जाने दिल अर्स सुभान ॥१०॥

एही भांत महंमद उमत की, कही सिफत रसूल समान । धरे बोहोत नाम उमत के, ए जाने दिल मोमिन अर्स सुभान ॥११॥

जबराईल असराफील, हक नजीकी निदान । सो भी आए उमत वास्ते, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥१२॥

ए सब किया महंमद वास्ते, चौदे तबक की जहान । सो महंमद आए उमत वास्ते, ए दिल मोमिन अर्स सुभान ॥१३॥

निसान लिखे कयामत के, फुरमान हदीसों दरम्यान । सो भी खोले एही उमत, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥१४॥

उठाई गिरो एक अदल से, कयामत बखत रेहेमान । देसी महंमद की साहेदी, ए दिल मोमिन अर्स सुभान ॥१५॥

कहूं बेवरा मोमिन दुनी का, जो फुरमाया फुरमान । सक सुभे इनमें नहीं, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥१६॥

दिल मजाजी दुनी सरियत, सो सके ना पुल हद भान । याको तोड़ उलंघे ले हकीकत, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥१७॥

दिल मुरदा मजाजी जुलमत से, पैदा कुंन केहेते कुफरान । क्यों होए सरभर मोमिनों, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥१८॥

ए जो कही गिरो मलकूती, पैदा जुलमत से दुनी फान । रूहें फिरस्ते उतरे अर्स से, ए दिल मोमिन अर्स सुभान ॥१९॥

दिल मजाजी गोस्त टुकड़ा, किया रसूलें मुख बयान । सो क्यों उलंघे जुलमत को, बिना दिल मोमिन अर्स सुभान ॥२०॥

जो उतरे होवें अर्स से, रूहें तौहीद के दरम्यान । सो लेसी अर्स अजीम को, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥२१॥

जो मुरदार करी दुनी मोमिनों, सो दिल मजाजी खान पान । नूर बिलंद पोहोंचे पाक होए के, ए दिल मोमिन अर्स सुभान ॥२२॥

कह्या पर जले जबराईल, चढ़ सक्या न चौथे आसमान । रूहें बसें तिन लाहूत में, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥२३॥

मुरग अंदर बैठा खाक ले चोंच में, ना जबराईल तिन समान । ए माएने मेयराज रूहें जानहीं, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥२४॥

पोहोंचे महंमद मेयराज में, दो गोसे फरक कमान । इत रूहें रहें दरगाह मिने, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥२५॥

नब्बे हजार हरफ कहे नबी को, तामें कछू गुझ रखाए रेहेमान । सो माएने जाहेर किए, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥२६॥

किए आपस में रूहें गवाही, हकें अपनी जुबान । याको जाने दिल हकीकी, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥२७॥

दिया जवाब रूहों हक को, ए सुकन दिल बीच आन । ए रूहें रहें हक हजूर, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥२८॥

कह्या मोतिन के मोंहों कुलफ, ए माएने तोड़त पढों गुमान । ए अर्स तन रूहें जानहीं, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥२९॥

पोहोंच्या मेयराज में गुनाह मोमिनों, ए सुन उरझे मुसलमान । ठौर गुन्हे न पोहोंच्या जबराईल, ए जाने दिल मोमिन अर्स सुभान ॥३०॥

हकें हाथ हिसाब लिया मोमिनों, तोड़या गुमान दे नुकसान । तित बैठे अपना अर्स कर, ए दिल मोमिन अर्स सुभान ॥३१॥

पोहोंची तकसीर रूहें अर्स में, हके फुरमाया फुरमान । तित दूजा कोई न पोहोंचिया, बिना दिल मोमिन अर्स सुभान ॥३२॥

आसिक नाचे अर्स अजीम में, दूजा नाच न सके इन तान । और राहै में जलें आवते, बिना दिल मोमिन अर्स सुभान ॥३३॥

जो गिरो भाई कहे महंमद के, ताको इस्कै में गुजरान । वाको एही फैल एही बंदगी, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥३४॥

एही खासलखास गिरो महंमदी, जाकी बंदगी इस्क ईमान । इनों फैल ऊपर का ना रहे, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥३५॥

दूजा जले इन राह में, ए वाहेदत का मैदान । तीन सूरत महंमद या रूहें, ए एकै दिल मोमिन अर्स सुभान ॥३६॥

महंमद क्यों ल्याए खासी उमत, इन बीच जिमी हैवान । ए उमत जाने इन स्वाल को, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥३७॥

गलित गात अंग भीगल, ए दिल हकीकी गलतान । ए वाहेदत हक हादी रूहें, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥३८॥

बका तरफ कोई न जानत, पढ़े ढूंढ़ ढूंढ़ हुए हैरान । सो बका हदें सब बेवरा किया, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥३९॥

अर्स बका के बयान की, हुती न काहूं सुध सान । सो जरे जरा जाहेर करी, ए दिल मोमिन अर्स सुभान ॥४०॥

लिखी हकें इसारतें रमूजें, सो किन खोली न फिरस्ते इंसान । सो दुनी सब बेसक हुई, ए दिल मोमिन अर्स सुभान ॥४१॥

रूह अल्ला की किल्ली से, खुले बका द्वार देहेलान । ए तीन सूरत कही महंमद की, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥४२॥

तो हुई दुनी सब हैयाती, जो उड़ाए दिया उनमान । पट खोले महंमद भिस्त के, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥४३॥

सब जिमी पर सिजदा, किया फिरस्ते घस पेसान । पर होए न हकीकीं दिल बिना, ए दिल मोमिन अर्स सुभान ॥४४॥

कलमा निमाज रोजा दिल से, दे जगात आप कुरबान । करे हज बका हमेसगी, ए दिल मोमिन अर्स सुभान ॥४५॥

जिन चांद नूर देख्या महंमदी, सोई जाने रोजे रमजान । न जाने दिल मुरदा मजाजी, ए जाने दिल मोमिन अर्स सुभान ॥४६॥

सुध ना रोजे रमजान की, ना चांद सूरज पेहेचान । करें सरीकी गिरो रबानी, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥४७॥

जब ले उठसी रूहें लुदंनी, तब होसी सब पेहेचान । दई हैयाती सबन को, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥४८॥

ईसे आब हैयाती पिलाइया, काढ़या कुफर जिमी आसमान । दीन एक किया सब इसलाम, ए दिल मोमिन अर्स सुभान ॥४९॥

सेहेरग से हक नजीक, कह्या खासलखास मकान । इत हिसाब इत कयामत, जो दिल मोमिन अर्स सुभान ॥५०॥

कहे महंमद सिफत उमत की, करें अपने मुख मेहेरबान । सोई जाने जामें हक इलम, ए दिल मोमिन अर्स सुभान ॥५१॥

॥ प्रकरण ॥२३॥ चौपाई ॥७३३॥

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