सनन्ध - प्रकरण २४
सनंध - रसूल साहेब की पेहेचान बातूनी
केहेती हों मोमिन को, सुनसी सब जहान । माएने गुझ या जाहेर, कोई ले न सक्या फुरमान ॥१॥
जाहेर माएने कलमें के, रसूलें कहे समझाए । सो भी कोई न ले सक्या, तो क्यों देऊं बातून बताए ॥२॥
नेक तो भी कहूं जाहेर, मेरे मोमिनो के कारन । अंतर मैं ना कर सकों, अर्स रूहें मेरे तन ॥३॥
जाहेर कह्या सो देखाइया, बातून जाहेर कर देऊं तुम । आगूं अर्स रूहें मेले मिने, देखाऊं बका वतन खसम ॥४॥
जिन जानो बिना कारने, खेल जो रचिया एह । ए माएने गुझ फुरमान के, समझ लीजो दिल दे ॥५॥
नूर पार थें रसूल आवहीं, ए देखो हकीकत । हक भेजे अपना फुरमान, आगे आलम तो गफलत ॥६॥
दूसरा तो कोई है नहीं, ए ख्वाबी दम सब जहान । तो रसूल आया किन वास्ते, हक पे ले फुरमान ॥७॥
ए न आवे ख्वाबी दम पर, अपना नूरी जेह । देखो आंखें दिल खोल के, कोई मतलब बड़ा है एह ॥८॥
दुनियां कहे ए हम पर, ल्याया है किताब । ऐसे रसूल को तो कहें, जो बोलत मिने ख्वाब ॥९॥
क्यों मुख ऐसा बोलहीं, जो समझे होंए कागद । ना सुध रसूल ना फुरमान, तो यों कहें सब्द ॥१०॥
आसमान जिमी के लोक को, अर्स बका नाहीं खबर । तो तिनका कासिद महंमद, होए अर्स से आवे क्यों कर ॥११॥
बेसहूर ऐसी दुनियां, माहें अबलीस आदम नसल । तो कहे महंमद को कासिद, जो लानत ऊपर अकल ॥१२॥
सो घर कह्या दुनी का, जो फुरमाने कह्या मुरदार । तो आदम काढ़या भिस्त से, ए दादा आदमियों सिरदार ॥१३॥
मोर सांप जिद ले निकस्या, और भिस्त सेंती सैतान । हिरस हवा साथ आदम, लोक ताए कहें मुसलमान ॥१४॥
इन आदम की औलाद, मारी अजाजीलें लानत ले । तिन सब दिलों पातसाह, हुआ अजाजील ए ॥१५॥
मोमिन उतरे नूर बिलंद से, जो कहे भाई महंमद के । महंमद आया इनों पर, खेल किया इनों वास्ते ॥१६॥
महंमद कहे मैं उनों से, ओ मुझ से जानो तुम । मुरदार करी जिनों दुनियां, करे बंदगी हजूर कदम ॥१७॥
महंमद आया वास्ते मोमिन, ले हक पे फुरमान । सब दुनियां करी एक दीन, भिस्त दई सब जहान ॥१८॥
ए जो खेल कबूतर, कहे अर्स से आया रसूल । सो कहे हमारा रसूल, दोजख में जले इन भूल ॥१९॥
पढ़े कलाम अल्लाह को, ले माएने अपनी अकल । जो कही मुसाफें मुरदार, ताए छोड़े न दुनी एक पल ॥२०॥
किस्सा लिख्या अजाजील का, किया सिजदा सब जिमी पर । तिन मारी राह सब दुनी की, इन ए फल पाया क्यों कर ॥२१॥
कोई केहेसी ए फल गया गुमाने, पर सो दोजख जले गुमान । फल एता बड़ा बंदगी का, खोवे नहीं मेहेरबान ॥२२॥
दो अंगुल जिमी छोड़ी नहीं, इन सकसे सिजदे बिगर । एती एके बंदगी क्यों होवहीं, तुम क्यों ना देखो दिल धर ॥२३॥
ए बंदगी ना होए कई करोरों, ऐसी हक पर करी बेसुमार । तिन बंदगी बदला ए पाया, राह देत सबों की मार ॥२४॥
ऐसी बंदगी खोए के, हक क्यों दे फल नुकसान । ए माएने जाहेर तो कहे, जो अजाजीलसों नहीं पेहेचान ॥२५॥
ना पेहेचानें आपको, ना पेहेचानें हादी हक । ना देखें अजाजील दिल पर, जो डालसी बीच दोजक ॥२६॥
अजाजील जीव दुनी का, ए जो कह्या माहें सब । किया भूल पत्थर पर सिजदा, कहे हम किया ऊपर रब ॥२७॥
बाहेर देखावें अबलीस, वह कह्या बैठा दिल पर । कहे दोजख जलसी अबलीस, आप पाक होत यों कर ॥२८॥
अब सुध होसी सबन को, खुली बातून हकीकत । इमाम रूहों पे लुदंनी, जित अर्स हक मारफत ॥२९॥
दिल अर्स न होए बिना मोमिन, जो पढ़े चौदे किताब । सब जिमिऐं करे सिजदा, दिल पावें ना अर्स खिताब ॥३०॥
हक हादी ना चीन्ह सके, ना कछू चीन्हे मोमिन । भूले मोमिन का सिजदा, तो हुई दस बिध दोजख तिन ॥३१॥
फैल हाल न देखें अपने, कहें अजाजीलें फेरया फुरमान । अपनी दोजख देवें औरों को, पर हक पे सब पेहेचान ॥३२॥
ज्यों फरेब देवें दुनी को, त्यों हक को देने चाहें । पर हक की आग जो दोजख, फैल माफक चुन ले ताए ॥३३॥
कहें हक को सूरत नहीं, तो फुरमान भेज्या किन । दुनी सुध नहीं भेज्या किन पर, करसी कौन रोसन ॥३४॥
एती सुध ना हमको, खोलसी कौन हकीकत । कौन करसी कयामत जाहेर, कौन केहेसी हक मारफत ॥३५॥
माएने न पावें सब्द के, बड़े सब्द रसूल । पर दम ना समझें ख्वाब के, जाको जुलमत मूल ॥३६॥
ए माएने सो लेवे सब्द के, जो रूह अर्स की होए । एक रसूल आया नूर पार से, और ख्वाब दुनी सब कोए ॥३७॥
क्यों कर आवे झूठ पर, जो अर्स बका का होए । ए गुझ माएने मोमिन बिना, क्यों लेवे हवा दम सोए ॥३८॥
दुनियां कही सब ख्वाब की, सो नाहीं झूठ सब्द । तबक चौदे हद के, हक बका पार बेहद ॥३९॥
चौदे तबक कहे फरेब के, काहूं न किसी की गम । ना गम रसूल फुरमान, कहां हक कौन हम ॥४०॥
पैगंमर यों पुकारिया, मैं अल्ला का रसूल । संग मेरे सो चले, जो चीन्हे सब्द घर मूल ॥४१॥
मेरा वतन नूर के पार है, हवा से ख्वाबी दम । इनों को मेरी खातिर, देसी भिस्त खसम ॥४२॥
ए छल मोहोरे झूठ के, तिन पर क्यों आवे नूर जात । ए दिल के फूटे यों तो कहें, जो पाई न नबी की बात ॥४३॥
नूरी हक का तिन पर भेजिए, जो कोई नूरी हक का होए । पर झूठे ख्वाबी दम पर, नूर पार थें न आवे कोए ॥४४॥
ए न आवे ख्वाबी बुत पर, जाको नहीं हक सों अंतर । पर जिन आंख कान न अकल, सोए समझे क्यों कर ॥४५॥
ऐसा हलका कहे रसूल को, सो सुन होत मोहे ताब । पर दोस देऊं मैं किनको, आगे तो दुनियां ख्वाब ॥४६॥
और जो टेढ़ा कहे रसूल को, मैं तिनका निकालूं बल । पर गुस्सा करूं मैं किन पर, आगे तो सब मृग जल ॥४७॥
ए अपना नूरी तहां भेजिए, जो होवे अर्स मोमिन । सो ए रूहें हम मोमिन, हक मासूक के तन ॥४८॥
सो भी इत जाहेर कह्या, पैगंमर पुकार । रूहें अर्स से उतरी, रस इस्क लिए सिरदार ॥४९॥
ए माएने सो समझहीं, जो नूरजमाल से होए । ए वतनी रूहें मोमिन, और ख्वाबी दम सब कोए ॥५०॥
मोमिन उतरे नूर बिलंद से, जाको एतो बड़ो मरातब । करसी पाक सब जिमी को, ताकी सरभर न होए किन कब ॥५१॥
दुनी दिल कह्या सैतान, दिल मोमिन अर्स हक । सो सरभर क्यों इनकी करे, जाए आगे पीछे दोजक ॥५२॥
बड़ी बड़ाई मोमिनों, जाके बड़े अंकूर । तो इन पर रसूल भेजिया, अपना अंगी नूर ॥५३॥
सो आए अब रूह मोमिन, जाको अर्स वतन । ए फुरमान आया इनका, क्यों खुले माएने या बिन ॥५४॥
खेल किया जिन खातिर, सो आइयां देखन अब । ए खेल अर्स रूहें देखही, और खेल है सब ॥५५॥
कोई केहेसी खेल कदीम का, सो अब आइयां क्यों कर । ए माएने गुझ वतन के, सो भी सब देऊं खबर ॥५६॥
खेल रचे खिन ना हुई, सो भी कहूं तुमें समझाए । ए वतन के पाव पल में, कई पैदा फना हो जाए ॥५७॥
करी बाजी चौदे तबकों, रूहों देखलावने खसम । सो रूहें तब ना हुती, पेहेले तो न हुआ हुकम ॥५८॥
कोई केहेसी रसूलें ना खोले, बिना हुकम माएने कुरान । सो तो आप नबी खुद हुकम, याकी हम रूहों पें पेहेचान ॥५९॥
जिन कोई कहे रसूल को, परदा खुद दरम्यान । आसिक ए मासूक कह्या, सो बिन देखे मिले क्यों तान ॥६०॥
इन कुरान के माएने, जो खोलत रसूल तब । तो इत आखिर इमाम, काहे को आवत अब ॥६१॥
जो खोलत रसूल माएने, तो खेल रेहेत क्यों कर । जो अर्स अजीम करते जाहेर, तो तबहीं होती आखिर ॥६२॥
ताथें गुझ नबी न राखहीं, पर सुनने वाला न कोए । तिन बखत ना रूहें बका की, तो गुझ अर्स जाहेर क्यों होए ॥६३॥
एता भी रसूलें कह्या, रूहें मेरे ना कोई संग । एक हुकम अली बिना, ना मोमिन वतनी अंग ॥६४॥
तो मोहोलत कर पीछे फिरे, हम आवेंगे आखिर । महंमद मेंहेंदी रूह अल्ला, इन मोमिनों की खातिर ॥६५॥
तो ए माएने ना खुले, रसूल मुख फुरमान । चौदे तबक की दुनियां, सो इत हुई हैरान ॥६६॥
नूर पार अर्स मोमिन, हुते ना तिन बखत । तो महंमद मेंहेंदी मोमिन, आए अर्स से आखिरत ॥६७॥
बात बड़ी मोमिन की, जिनके अर्स में तन । ए रूहें दरगाह की, जिनको अर्स वतन ॥६८॥
अर्स खावंद एक मासूक, दूसरा नाहीं कोए । और खेल सब नूरियों किया, यामें भी विध दोए ॥६९॥
यामें अजाजील रूह असलू, दूजी रूह कुफरान । तीसरा दम देखन का, ना कछुए हैवान ॥७०॥
हैवान ना कछू तो कहे, जो उनको ना कछु बुध । जो जाने ना वेद कतेब को, सो उसी दाखिल बेसुध ॥७१॥
जो रूह अर्स अजीम की, सो मिले नहीं कुफरान । ए बेवरा इमाम बिना, करे सो कौन बयान ॥७२॥
सांचे सुख मोमिन के, अजाजील और सुख । पर जो सुख मोमिन के, सो कहे न जाए या मुख ॥७३॥
अजाजील और काफर, तिनों भी सुख नेहेचल । बरकत इन मोमिन की, साफ किए सब दिल ॥७४॥
करके साफ सबन को, भिस्त देसी सबन । पर रूहों सुख हमेसगी, जहां मौला महंमद मोमिन ॥७५॥
नूर सरूपें रसूल, हक आगे खड़ा हुकम । मूल मेला महंमद रूहों का, सब बैठियां तले कदम ॥७६॥
नूर के एक पल में, इत इंड चले कई जाए । ए भी मोमिनों खेल देखाए के, देसी सबे उड़ाए ॥७७॥
रूहें फरिस्ते वास्ते, खेल किया चौदे तबक । दुनी सक लिए खेलत, किन तरफ न पाई बका हक ॥७८॥
सो सक भानी सब दुनी की, महंमद मेंहेंदी ईसा आए । अर्स कायम सूर हुआ रोसन, दिया काफरों कुफर उड़ाए ॥७९॥
काफर रूह भी पाक होएसी, अंदर आग जलाए । मोमिनों मुस्लिम खातिर, भिस्त जो देसी ताए ॥८०॥
बड़े नसीब रूहें अर्स की, जिन जावें खेलमें भूल । मोमिन वास्ते अर्स से, आए इमाम ईसा रसूल ॥८१॥
ए सब हुआ मोमिनों खातिर, पेहेले भेज्या कागद । ए तमासा देखाए के, उड़ाए देसी ज्यों गरद ॥८२॥
जैसा खेल अव्वल का, ए जो रूहों देख्या ब्रह्मांड । बरकत इन मोमिन की, सब दुनियां करी अखंड ॥८३॥
इन जुबां मैं क्यों कहूं, मोमिन अर्स अंकूर । आया इमाम सबन का, किया जो परदा दूर ॥८४॥
ए जो नसीब मोमिन का, सो लिख्या मिने फुरमान । पर जहान में गुझ जाहेर हुई, अब मोमिनों की पेहेचान ॥८५॥
गिरो मोमिन नाम अनेक हैं, जुदे जुदे कहे नाम । बोहोत नामों बुजरकियां, लिखी मांहें अल्ला कलाम ॥८६॥
तारीफ ईसा मेंहेंदी की, सो इन जुबां कही न जाए । पेहेचान रसूल खुदाए की, अर्स वतन दिया बताए ॥८७॥
तारीफ काजी कजाए की, क्यों कहूं या मुख । नाबूद को कायम किए, दिए रूहों कायम सुख ॥८८॥
माएनें इन कुरान के, गुझ रही थी बात । सो अर्स रूहें जाहेर हुई, सब जन में फैलात ॥८९॥
नाहीं तुम बराबरी, सो इन जुबां कही न जाए । पर मुझे सुख तब होएसी, जब देऊं नैनों सब देखाए ॥९०॥
ए किया तुम खातिर, समझ लीजो दिल माहें । रूहें मोमिन कदम तले, तित दूजा कोई नाहें ॥९१॥
॥ प्रकरण ॥२४॥ चौपाई ॥८२४॥
