सनन्ध - प्रकरण २५
सनंध नबी नारायन की
कही कजा जो रसूलें, सो नेक सुनाई हम । पर कहे कोई ना समझया, अब कर देखाऊं तुम ॥१॥
महंमद दीन देखाइया, और देखाया छल । भी देखाऊं जाहेर, ज्यों छूट जाए सब बल ॥२॥
अब छल को बल क्या करे, जब देखाऊं बका वतन । निकाल देऊं जड़ पेड़ से, ल्याए नूर अर्स रोसन ॥३॥
फरेब की तो तुम सुनी, थिर चर चौदे तबक । खेल खावंद जो त्रैगुन, सब सब्द बान पुस्तक ॥४॥
बैकुंठ से पाताल लों, बनि आदम हैवान । इन बीच की सब कही, ब्रह्मा रूद्र नारायन ॥५॥
अब सुनियो तुम मोमिनों, ए खेल तो कछुएं नांहें । पर कछुक तो देखत हो, जिन रहे संसे दिल मांहें ॥६॥
जब जाग अर्स हक देखिए, ए नहीं खेल कछू तब । पर जोलों हुकमें है खड़ा, तोलों क्यों होए झूठा अब ॥७॥
ए खेल झूठा जो देखहीं, सो तो सांचे हैं साबित । तो कहा बड़ों की बुजरकी, जो झूठ न करहीं सत ॥८॥
जो सांचे सांचा देवहीं, तो कहा बड़ाई बुजरक । पर खाकी बुत सत होवहीं, तो जानियों महंमद बरहक ॥९॥
महंमद आया नूर पार से, याही खेल के मांहें । पर इन खेल में का नहीं, सो भी सक राखों नांहें ॥१०॥
नबी और नारायन की, कछुक कहूं पटंतर । रसूल कहे नूरजमाल की, नहीं नारायन गम अछर ॥११॥
सो तेता ही बोलिया, जो गया जहां लों चल । अपने अपने मुख से, जाहेर करें मजल ॥१२॥
सो सब्द लिखे हैं कागदों, आपे अपनी साख । जो किन पाई दमड़ी, या किन लाखों लाख ॥१३॥
मैं ना किसी की कम कहूं, ना किसी की कहूं बढ़ाए । जो जैसा तैसा तिन, दोऊ कहूं दृढ़ाए ॥१४॥
एते दिन ढांपे हते, सब्द सत असत । सो अब जाहेर हुए, आई सबों की सरत ॥१५॥
हकीकत हिंदुअन की, सो देखो चित ल्याए । और जो मुस्लिम की, सो भी देऊं बताए ॥१६॥
हिंदू जोडू जब करें, ले देवें मन के बंध । जिन कोई छोड़े किनको, यों पड़ें गफलत फंद ॥१७॥
मुस्लिम जोडू जब करें, मिल पेहेले बांधे सरत । जिन कोई किनसों दिल बांधे, यों न्यारे रहें गफलत ॥१८॥
भी हिंदू मुस्लिम की, कहूं तफावत तुम । हिंदू हिसाब जमपुरी, मुस्लिम हाथ खसम ॥१९॥
हिंदुओं ए दृढ़ कर लिया, इत जो करसी करम । सो जाए आपे अपना, दें हिसाब आगे राए धरम ॥२०॥
सो हिसाब दिए पीछे, देह धरें चौरासी लाख । मन वाचा करम बांध के, कहें हम होत हलाक ॥२१॥
हिंदू मुए जलावहीं, खाक भी देवें उड़ाए । जो डंड जम का छूटहीं, तो भी दिल सुन्य को चाहे ॥२२॥
हिसाब मुस्लिम कहावहीं, ए किया दृढ़ दिल । खुद काजी हस्तक नबी, हम देसी सब मिल ॥२३॥
दूजा देह धरन का, रसूलें किया नहीं हुकम । ताए दूजा देह क्यों होवही, जाको हिसाब हाथ खसम ॥२४॥
मुस्लिम मुए गाड़हीं, बांध उमेद खसम । तेहेकीक हक उठावहीं, यों सोवें पकड़ कदम ॥२५॥
मन के हारे हारिए, मन के जीते जीत । मनहीं देवे सत साहेबी, मनहीं करे फजीत ॥२६॥
चल देखाया बड़कों, सब चले जाएं तिन लार । अब सो क्यों ए ना छूटहीं, जो बांध दई कतार ॥२७॥
कोई हिंदू जो बैकुंठ जावहीं, सो भी खेल के मांहें । ए फना आखिर कहावहीं, पर कायम भिस्त तो नांहें ॥२८॥
बैकुंठ मिने नारायन जी, जिन मुख स्वांसा वेद । ए खावंद है खेल का, सो भी कहूं नेक भेद ॥२९॥
नारायन कहावें निगम, कहें मोहे खबर नहीं खुद । नबी हक रसूल कहावहीं, कहे मैं ल्याया कागद ॥३०॥
ए नबिऐं जाहेर कह्या, मैं हक पे आया रसूल । दीन मुस्लिम जो होएसी, सो लेसी सब्द घर मूल ॥३१॥
मेरा घर नूर के पार है, और हवा से ख्वाबी दम । याको मेरी खातिर, भिस्त देसी खसम ॥३२॥
कलाम अल्ला ल्याया रसूल, इन मुस्लिम में आकीन । हुकम सिर चढ़ाइया, जो सबसे बड़ा दीन ॥३३॥
रसूलें खुद को देख के, हुकम लिया दृढ़ाए । जिन खुद को ना देखिया, तिन सिर करम चढ़ाए ॥३४॥
हिंदू और मुस्लिम के, बीच पड़यो है भरम । रसूल कहे सब हुकमें, और निगमें दृढ़ाए करम ॥३५॥
रसूल हक हुकम बिना, और न काढ़े बोल । करम दृढ़ाए निगमें दिए, हिंदुओं सिर डमडोल ॥३६॥
हुए जो ग्यानी अगुए, जिन लिए माएने वेद । सो ग्यान हिंदुओं आड़ा पड़या, हुआ बड़ा छल भेद ॥३७॥
तिन अगुओं बांधी दुनियां, किया जोर जब्द । वैर लगाया या विध, कोई सुने न काहू को सब्द ॥३८॥
तो सत सब्द के माएने, ले न सक्या कोए । डूबे हिंदू स्यानपें, सो गए प्यारी उमर खोए ॥३९॥
जिन सुध ख्वाब न पार की, सो क्यों समझे ए बात । और सबों को अटकल, रसूलें देखी हक जात ॥४०॥
तारी अरवाहें सबन की, चौदे तबक की सृष्ट । अवतार तीर्थंकर हो गए, किन तारे ना गछ इष्ट ॥४१॥
कोई ऐसा न हुआ इन जहान में, जो तारे अपनी आतम । यों सब सास्त्र बोलहीं, कहे पुकार निगम ॥४२॥
सो वैराट चौदे तबकों, थावर और जंगम । सब तारे सचराचर, प्रकास रसूल नूर हुकम ॥४३॥
खेल रसूल हुकमें हुआ, बीच ल्याए रसूल फुरमान । आखिर भी रसूल आए के, भिस्त दई सब जहान ॥४४॥
भिस्त चौदे तबक, देसी दुनियां दीन । देसी ब्रह्मा रूद्र नारायन को, आखिर दे आकीन ॥४५॥
ए अव्वल का हुकम, आखिर होसी जाहेर । करसी साफ सबन को, अंतर मांहें बाहेर ॥४६॥
॥ प्रकरण ॥२५॥ चौपाई ॥८७०॥
