Logo  Kuljam.org

विषय-सूची

सनन्ध - प्रकरण २६

सनंध दोजख की

नेक कहूं दोजख की, ए जलसी ज्यों कुफरान । ए जो सब्द रसूल के, अंदर दिल में आन ॥१॥

कुफर चौदे तबक का, इन सब्दों होसी नास । पर कहा कहूं तिन अगुओं, जिन किए घात विश्वास ॥२॥

कुफर सारा काढ़सी, एक पलक में धोए । खारे जल पछाड़सी, याको धूप जो देसी दोए ॥३॥

याही दोजख अगनी जलें, और जलें दुनी के दम । आप जलें अपनी मिने, कहें हाए हाए भूले हम ॥४॥

खुदा न देवे दुख किन को, पर मारत है तकसीर । पटक पटक सिर पीटहीं, रोसी राने राए फकीर ॥५॥

खुद काजी कजाए का, रसूलें किया अति सोर । सो सोर याद जो आवहीं, हाए हाए झालें बढ़े त्यों जोर ॥६॥

जलसी खुद देखे पीछे, ऐसा बड़ा खसम । कलमा रसूल का सुन के, हाए हाए पकड़े नहीं कदम ॥७॥

ज्यों ज्यों दुलहा देखहीं, त्यों त्यों उपजे दुख । ऐसे मौले मेहेबूबसों, हाए हाए हुए नहीं सनमुख ॥८॥

खुद की सुध दई रसूलें, पर आया नहीं आकीन । अंग मरोर जिमी परे, हाए हाए जिन रसूल को न चीन ॥९॥

एता मासूक पुकारिया, पर तो भी न छूटा फंद । दंत बीच जुबां काटहीं, हाए हाए हुए बड़े अंध ॥१०॥

जाए जाए समसेर लेवहीं, अब कीजे आप घात । दिल दे कबहूं ना सुनी, हाए हाए पैगंमर की बात ॥११॥

ले ले छुरी पेट डारहीं, आकीन न आया अंग । कही बात नबिऐं खुद की, हाए हाए लग्या न तासों रंग ॥१२॥

बात न सुनी रसूल की, तिन सीखां लगियां कान । इस्क हक का छोड़ के, हाए हाए डूबे जाए ग्यान ॥१३॥

बातां सुनियां दूर से, पर लई न जाए के सुध । सो गुन अंग इंद्री जलो, हाए हाए जलो सो बुध ॥१४॥

आकीन जिन आया नहीं, सुनके महंमद बैन । और विचार सबे जलो, हाए हाए जलो सो चातुरी चैन ॥१५॥

धिक धिक ग्याता ग्यान को, जिन उलटी फिराई मत । सो अगुए जलो आग में, हाए हाए करी बड़ी हरकत ॥१६॥

बिना आकीने इस्क, कबहूं न उपज्या किन । स्यानों ग्यान विचारिया, हाए हाए करी खराबी तिन ॥१७॥

मैलाई ना छूटी मन की, ऊपर भए उज्जल । ना आया आकीन रसूल पर, हाए हाए छेतरे छल ॥१८॥

हराम न छूट्या दिल से, छल दृष्ट हुई बाहेर । राह भूले मुस्लिम की, हाए हाए बुरी हुई जाहेर ॥१९॥

ख्वाब के सुख कारने, किया आपसों छल । सब्द ना सुने रसूल के, हाए हाए खांए गोते बिना जल ॥२०॥

सब्द जो अगुओं सुन के, भूले मुस्लिम की राह । इन दीन कलमें आखिर, आवसी इत खुदाए ॥२१॥

कुरान जिनों न विचारिया, जलो सो तिनकी मत । जो न जागी रसूल हुकमें, हाए हाए आग परो गफलत ॥२२॥

बैठे उठे न पर सके, सके न रोए विकल । आखिर जाहेर हुए पीछे, आग हुए जल बल ॥२३॥

जिमी सकल जहान जो, हिंदू या मुसल्मीन । हाथ काट पेट कूटहीं, हाए हाए जिन रसूल को न चीन ॥२४॥

सुध सीधी रसूलें दई, पर समझे नहीं चंडाल । तिन अंग आग जो धखहीं, हाए हाए झंपे न क्यों ए झाल ॥२५॥

खसम के आगे अब, क्यों उठावें सिर । सब अंग आग जो हो रही, हाए हाए झालें उठें फेर फेर ॥२६॥

देह काफर जले जो आग में, सो तो अचरज कछुए नांहें । पर जो जले जान बूझ के, हाए हाए तिन आग लगी दिल मांहें ॥२७॥

कुरान को पढ़ पढ़ गए, पर पाई न हकीकत किन । तो मासूक प्यारा न लग्या, हाए हाए जिमी हुई अगिन ॥२८॥

कई महंमद के कहावहीं, पर पूरे न लगे दिल दे । तो मुसाफ न पाया मगज, हाए हाए जान बूझ जले ए ॥२९॥

कलाम अल्ला आया हाथ में, पर मारफत न पाई किन । सो भी आग छोड़े नहीं, हाए हाए तांबा जिमी हुई तिन ॥३०॥

जान बूझ के जो भूले, चले न फुरमाए पर । सो लटके सूली आग की, हाए हाए जो हुए बेडर ॥३१॥

दुस्मन बैठा दिल पर, सो तो जलाया चाहे । सो जाहेर फरेब देत है, हाए हाए कोई न ची‍न्हे ताए ॥३२॥

पीछे पछतावा क्या करे, जब लगी दोजख आए । इसी वास्ते पुकारे रसूल, मेहेर दिल में ल्याए ॥३३॥

यों आखिर आए सबन को, प्रगट भई पेहेचान । तब कहें ए सुध सुनी हती, पर आया नहीं ईमान ॥३४॥

सत असत इन खेल में, रहे थे दोऊ मिल । सो दोऊ जाहेर किए, सांचा दीन झूठा छल ॥३५॥

॥ प्रकरण ॥२६॥ चौपाई ॥९०५॥

इसी सन्दर्भ में देखें-