सनन्ध - प्रकरण २७
सनंध अगुओं ग्यानी की
अब नींद उड़ी सबन की, आई जो हिरदे बुध । समझे सब कुरान को, भई रसूल की सुध ॥१॥
अब नबी प्यारा लग्या, लगे प्यारे सब्द रसूल । इमाम हुए जाहेर, कदमों सब सनकूल ॥२॥
अब रसूल की सुध परी, और सुध परी फुरमान । ए सबे सुध तब परी, जब आए बैठे सुलतान ॥३॥
बलिहारी महंमद की, बलिहारी मुसाफ । बलि बलि जाऊं काजी की, जिन आए किया इंसाफ ॥४॥
ताथें इन बीच अगुओं, जिन करी बड़ी हरकत । ए जुलम किन विध कहूं, जिन या विध फेरी मत ॥५॥
पढ़ों पढ़ाई दुनियां, अगुओं उलटी गत । ए होसी सब जरदरूं, अबहीं इन आखिरत ॥६॥
जब काफर देखे अगुओं, तब जाने काले नाग । करी दुनी को जरदरूं, इनहूं लगाई आग ॥७॥
दुनियां अगुओं देखहीं, तब जाने जैसे जेहेर । यों दुनियां बीच अगुओं, बड़ा जो पड़सी वैर ॥८॥
ज्यों घायल सांप को चींटियां, लगियां बिना हिसाब । त्यों अगुओं को दुनियां, मिल कर देसी ताब ॥९॥
आग दुनी को एक है, अगुओं को आग दोए । एक आग दुनी की, दूजे अपने दुख को रोए ॥१०॥
और आग सब सोहेली, पर ए आग सही न जाए । अब देखोगे आपहीं, रेहेसी सब तलफाए ॥११॥
आग सबों को विरह की, देकर करसी साफ । जिन जैसी तैसी तिनों, आखिर ए इंसाफ ॥१२॥
विकार सारे अंग के, काम क्रोध दिमाक । सो बिना विरहा ना जलें, होए नहीं दिल पाक ॥१३॥
आखिर भी इस्क बिना, हुआ न काहूं सुख । सो इस्क क्यों छोड़िए, जो रसूलें कह्या आप मुख ॥१४॥
अव्वल जो रसूलें कह्या, आखिर सोई प्रवान । इस्क सांचा हक का, और आग सब जान ॥१५॥
जब खसम काजी हुआ, तब नाहीं दुखिया कोए । महंमद मेहेर करावहीं, सब पाक हुए दिल धोए ॥१६॥
रसूल बड़ा सबन में, जिन हक की दई खबर । कह्या मास्क का सब हुआ, आई कजा आखिर ॥१७॥
तारीफ रसूल की तो करूं, जो इन जिमी का होए । या ठौर बात जो नूर पार की, कबहूं ना बोल्या कोए ॥१८॥
या सुध पार के पार की, किन मुख ना निकसे दम । बुजरकी महंमद की, करत जाहेर खसम ॥१९॥
महंमद दीन की पेहेचान, काहूं हुती न एते दिन । ना पेहेचान कुरान की, नातो देख थके कई जन ॥२०॥
पेहेलें ए सस्ती हती, मुस्लिम दीन कुरान । पीछे अति पछताएसी, पर क्या जाने कुफरान ॥२१॥
सो पेहेचान अब होएसी, करसी साफ दुनी दिल । किताब याही रसूल की, सुख लेसी सब मिल ॥२२॥
सब्द रसूल के पसरसी, तिन फिरसी वैराट । अकस सबों का भान के, सब चलसी एक बाट ॥२३॥
छोड़ गुमान सब मिलसी, ए जो देखत हो जहान । जात पांत ना भांत कोई, एक खान पान एक गान ॥२४॥
एही सब्द सुन जागसी, बड़ी बुध होसी विचार । याही सदी आखिर की, हक सुख देसी पार ॥२५॥
नूर सबों में पसरया, सो कहूं सब सनंध । याही सब्दों बीच का, उड़ जासी बंध फंद ॥२६॥
॥ प्रकरण ॥२७॥ चौपाई ॥९३१॥
