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विषय-सूची

सनन्ध - प्रकरण २८

सनंध बिना एक महंमद की

इत आए करी जो रसूलें, सो नेक कहूं प्रकास । तबक चौदे उजाला, किया तिमर सब नास ॥१॥

प्रताप बड़ा महंमद का, जिन दिया सबों को सुख । चौदे तबक की दुनी के, दूर किए सब दुख ॥२॥

इमाम मोमिन इस्क, सब मुख एही सब्द । सब्द ना कोई दूसरा, बिना एक महंमद ॥३॥

आलम सब अल्लाह की, तामें छोड़ी ना काहूं हद । दौड़ के कोई न पोहोंचिया, बिना एक महंमद ॥४॥

कई जातें दौड़ी जहान में, पर आया न काहूं दरद । तो किनहूं न पाइया, बिना एक महंमद ॥५॥

पंथ पैंडे दीन मजहब, कर कर गए रब्द । पर हुआ न कोई काम का, बिना एक महंमद ॥६॥

बड़े बड़े ग्यानी गुनी मुनी, पर पाया न काहूं हारद । कथ कथ सब खाली गए, बिना एक महंमद ॥७॥

कई पोथी पढ़ पढ़ पढ़हीं, पर न सुध हद बेहद । मेहेनत सीधी न हुई, बिना एक महंमद ॥८॥

कई जुदी जुदी जिनसों खोजिया, सबों आप अपने मद । तिनसे कछुए न सरया, बिना एक महंमद ॥९॥

कई पढ़े किताबें सहीफे, पर हुआ न काहूं मकसद । बका तरफ किन पाई नहीं, बिना एक महंमद ॥१०॥

कई बंदे एक हादी के, जुदे पड़े कर जिद । पर हक किने न पाइया, बिना एक महंमद ॥११॥

कई पेहेलवान कहावें दुनी में, ढूंढ़ ढूंढ़ हुए सरद । सुन्य सुरिया पार न ले सके, बिना एक महंमद ॥१२॥

कई नाम इमाम धर धर गए, बोल बोल गए बेरद । ठौर कायम किने न पाइया, बिना एक महंमद ॥१३॥

बड़े बड़े सुभट सूरमें, पर हुआ न कोई मरद । जो सुध ल्यावे नूर पार की, बिना एक महंमद ॥१४॥

केतेक पर सिर बांध के, कर कर गए जब्द । सो सारे बेसुध गए, बिना एक महंमद ॥१५॥

अंग मार जार उड़ावहीं, जो हते जोर जलद । पर ए सुध काहू ना परी, बिना एक महंमद ॥१६॥

कई रोते फिरे रात दिन, पर हुआ न दीदार खुद । कौन सुख देवे तिनको, बिना एक महंमद ॥१७॥

कई लालै लाल कहावते, सो हो गए सब जरद । और लाल कोई ना हुआ, बिना एक महंमद ॥१८॥

ए खेल खावंद जो त्रैगुन, कहें हम ही हैं परमपद । और खावंद कोई ना हुआ, बिना एक महंमद ॥१९॥

कई वली पैगंमर आदम, ए कहावें सब मुरसद । और मुरसद कोई न हुआ, बिना एक महंमद ॥२०॥

औलिए अंबिए फिरस्ते, जेता कोई पैद । पर अलहा किनहूं न लह्या, बिना एक महंमद ॥२१॥

आद मध और अबलों, कोई न पोहोंच्या कद । खुद खबर किन न दई, बिना एक महंमद ॥२२॥

चौदे तबक की दुनी के, मैं देखे सब कागद । सो सारे ही बंद हुए, बिना एक महंमद ॥२३॥

ऊपर तले माहें बाहेर, ए उड़ जासी ज्यों गरद । सो फेर कायम कौन करावहीं, बिना एक महंमद ॥२४॥

जो दुनियां खाकें रल गई, सबों कर डारी रद । सो फेर कौन उठावहीं, बिना एक महंमद ॥२५॥

तबक चौदे ख्वाब के, ए खेल झूठा है सब । सो बका कौन करावहीं, बिना एक महंमद ॥२६॥

तत्व सबन को नास है, जाको मूल मोह मद । सो नेहेचल कौन करावहीं, बिना एक महंमद ॥२७॥

ऐसा हुआ न कोई होएसी, जो जावे छोड़ सरहद । फुरमान ल्यावे नूर पार का, बिना एक महंमद ॥२८॥

पांच चीज जीव सब उड़ गए, मसी बका से ल्याए औखद । सो खिलाए जिवाए कोई न सक्या, बिना एक महंमद ॥२९॥

सो रसूल तुम खातिर, होए आया कासद । ए सब मासूक के हुकमें, हुआ जाहेर महंमद ॥३०॥

मोमिन तुम सूते क्या करो, ए कागद ए कासद । काजी कजा पर आइया, दे मुबारकी महंमद ॥३१॥

उठके आप खड़ी रहो, ल्‍यो अंग में आनंद । इस्क देखाओ अपना, मासूक करो परसंद ॥३२॥

॥ प्रकरण ॥२८॥ चौपाई ॥९६३॥

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