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विषय-सूची

सनन्ध - प्रकरण २९

सनंध - अब सो कहां है महंमद

अब सो कहां है महंमद, तुम उठ क्यों न देखो जाग । कह्या कौल सो आए मिल्या, अब नहीं नींद को लाग ॥१॥

तुम जो अरवाहें अर्स की, पर छलें किए हैरान । बाहेर देखना छोड़ के, तुम अंतर करो पेहेचान ॥२॥

हकें लिख्या फुरमान में, मेरा अर्स मोमिन कलूब । क्यों न जागो देख ए सुकन, दिल में अपना मेहेबूब ॥३॥

ए छल झूठा देख के, तुम लई जो तिनकी बुध । तो नजर बाहेर पड़ गई, जो भूले अर्स की सुध ॥४॥

जात भेख ऊपर के, ए सब छल की जहान । जो न्यारा मांहें बाहेर से, तुम तासों करो पेहेचान ॥५॥

काजी कजा जो करसी, तब कह्या रसूलें संग हम । ए सोई दिन आइया, अब क्यों भूलें कदम ॥६॥

कह्या रसूलें आवसी, आखिर ए मेहेरबान । नजर जाहेरी क्यों देखोगे, जोलों बातून नहीं पेहेचान ॥७॥

पेहेले क्यों थे रसूल हक पें, क्यों ल्‍याए फुरमान । अब कौन सरूपें आखिर, ए सब करो पेहेचान ॥८॥

वजूद आवे जो ख्वाब में, सो सब ख्वाब के जान । ख्वाब देखे जो पार थें, तुम तासों करो पेहेचान ॥९॥

जो हक सूरत देखिए इनमें, तो ख्वाब देवें सब भान । ले माएने देखो बातून, ज्यों होवे सब पेहेचान ॥१०॥

ए तो आगे थें कई उड़हीं, नूरै की नजर । तो नूर-तजल्ला की नजरों, ए रेहेसी क्यों कर ॥११॥

हक नजर या पर पड़े, तो उड़े जिमी आसमान । नूर आगे अंधेरी ना रहे, तुम दिल दे करो पेहेचान ॥१२॥

अब बताऊं या बिध, देखो दिल में आन । जाहेर मैं देखाऊंगी, मेरे इमाम की पेहेचान ॥१३॥

आवे अर्स से हुकम, तिन हुकमें चले हुकम । फिरे सो मतलब करके, जाए मिले खसम ॥१४॥

भी तितथें रूह आवहीं, आवें नूर से जोस कूवत । सो फुरमाया सब करे, पकड़ के सूरत ॥१५॥

नूर मकान से फरिस्ता, आवे असराफील । सब उड़ावे सूर बजाए के, पलक न होवे ढील ॥१६॥

भी इत अर्स अजीम से, मसी ल्यावें कुंजी रोसन । सो तोड़ कुफर आलम का, साफ करें सबन ॥१७॥

जब इमाम इत आइया, तब ए सारे संग । सरूप मेंहेंदी याही को, यामें देखोगे कई रंग ॥१८॥

याही साथ मिलावा मोमिनों, सबों खास बंदों सोहोबत । बंदगी जाहेर या बातून, सब बेवरा होसी इत ॥१९॥

औलिए अंबिए आसिक, जो खास बंदे सिरदार । हक बिना कछू ना रखें, इनों दुनी करी मुरदार ॥२०॥

ए माएने ले रसूलें, आए केता किया पुकार । ए सो किन खातिर किया, रूहें अजूं न करें विचार ॥२१॥

ए किन भेज्या कौन आइया, ए सो कौन कारन । अब कहे कौन कासों कहे, तुम उठ देखो वतन ॥२२॥

तुमें सूती कौन जगावहीं, केहे केहे मगज कुरान । सुध देवे काजी कजाए की, ले माएने करो पेहेचान ॥२३॥

पेहेले ओलखो आपको, पीछे करो मोसों पेहेचान । देखो अपने अर्स को, याद करो निसान ॥२४॥

यामें रूह कई भांत के, लेत लज्जत खान पान । अंदर बैठा ताए देखहीं, तुम सब बिध करो पेहेचान ॥२५॥

कहां इनों की असल, दृढ़ करो सोई निसान । पार अर्स जो कायम, तुम तासों करो पेहेचान ॥२६॥

रूहें फरिस्ते पैगंमर, सुध होवे नूर मकान । सो नूर छोड़ आगे चले, तब होवे पेहेचान ॥२७॥

ए सुध सब बिध ल्याइया, रसूल हाथ फुरमान । काजी कजा भिस्त पार की, ले माएने करो पेहेचान ॥२८॥

बात रसूल की जो सुने, ताको तअजुब बड़ा होए । हक बका सुध देवहीं, सो कहे न दूजा कोए ॥२९॥

एक पैंडे चले दुनियां, रसूल सामी बल । नबी नजर देखे चलें, दुनियां चले अटकल ॥३०॥

दुनियां जो छाया मिने, सो करे अटकलें अनेक । छाया सूर न देखहीं, पीछे कहे ताए रूप न रेख ॥३१॥

क्यों सब्द आगे चले, तुम कर देखो विचार । छाया पार किरना रहें, सूरज किरनों पार ॥३२॥

पैदास जुलमत काल की, सो तो है सब नास । खेलें काल के मुख में, ताए अबहीं करेगो ग्रास ॥३३॥

हक सूरत नूर के पार है, तहां सब्द न पोहोंचे बुध । चौदे तबक छाया मिने, इनें नहीं सूर की सुध ॥३४॥

कोई ना उलंघे काल को, निराकार हवा ला सुंन । याको कोई ना उलंघ सके, ए ग्रासे सब उतपन ॥३५॥

बात बड़ी है काल की, ऐसे कई ब्रह्मांड उपाए । काल भी आखिर ना रहे, पर ए पेहेले सब को खाए ॥३६॥

रसूल बिना इन काल को, किने न उलंघ्यो जाए । ए सब्द काल के पार हैं, सो क्यों औरों समझाए ॥३७॥

छाया की जो दुनियां, ताए अचरज होए सबन । काल के पार जो पोहोंचहीं, सो क्यों कर रेहेवे तन ॥३८॥

हक की खबर जो ल्यावहीं, सो तेहेकीक न रहे आकार । जो कदी रहे तो बेहोस, पर कर ना सके पुकार ॥३९॥

जिन कोई सक तुमे रहे, मैं सब विध देऊं समझाए । माएने इन रसूल के, भांत भांत देऊं बताए ॥४०॥

सत छाया जीव पर पड़े, सो तबहीं मुरछाए । ख्वाब न देखे सांच को, वह देखत ही मिट जाए ॥४१॥

पर अंधे यों न समझहीं, जो इनका नाम रसूल । सो तो पार से आया हक पे, याको जुलमत ना मूल ॥४२॥

बात मासूक की सो करे, आगे आसिक अरधंग । कहे कुरान पुकार के, रसूल न छाया संग ॥४३॥

सो बात करे मेहेबूब की, वाको अंग न कोई उरझाए । ज्यों किरने सूरज देखहीं, त्यों त्यों जोत चढ़ाए ॥४४॥

सो जाने सुध पार की, हक मिलिया जिन । किरना सूरज ना अंतर, यों मासूक आसिक तन ॥४५॥

सीधे सब्द रसूल के, पर ए समझे कछू और । जोलों सब्द ना चीनहीं, तोलों न पाइए ठौर ॥४६॥

॥ प्रकरण ॥२९॥ चौपाई ॥१००९॥

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