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विषय-सूची

सनन्ध - प्रकरण ३

हिंदुस्तानी भाखा में चौपाई सुरू

भेख भाखा जिन रचो, रचियो माएने असल । भई रोसन जोत रसूल की, अब खुले माएने सकल ॥१॥

लिए माएने ऊपर के, एते दिन इन जहान । मूल माएने पाए बिना, सुध ना पड़ी बिरिध हान ॥२॥

करना सारा एक रस, हिंदू मुसलमान । धोखा सबका भान के, सब का कहूंगी ग्यान ॥३॥

पैंडे सब देखाइए, ज्यों समझे सब कोए । मत सबन की देखाइए, ज्यों एक रस सब होए ॥४॥

मैं देखे सब खेल में, पंथ पैंडे दरसन । देखी इस्क बंदगी सबकी, जैसा आकीन सबन ॥५॥

एती जिमी सब छोड़के, जित आए मेंहेदी महंमद । सो भली जिमी भाखा भली, इत हद मेट होसी बेहद ॥६॥

एते दिन इन हुकमें, जुदे जुदे खेलाए । सो ए हुकम इमाम का, अब लेत सबों मिलाए ॥७॥

॥ प्रकरण ॥३॥ चौपाई ॥३५॥

इसी सन्दर्भ में देखें-