सनन्ध - प्रकरण ३०
सनंध इमाम रसूल की
खातिर प्यारी रूहें मोमिन, मैं कहूं अर्स सब्द । बका सब्द कहे बिना, उड़े ना सरियत हद ॥१॥
सुध दुनी हद ना बेहद, कौन रसूल कौन हम । कागद ल्याया किनका, कहां सो अर्स खसम ॥२॥
ए सुध किन पाई नहीं, जो लिखी माहें कागद । ए सब खेलें ख्वाब में, कोई न छोड़े हद ॥३॥
हद की बांधी सब दुनियां, हक तरफ न करे नजर । पीठ दे हद बेहद को, यों हादी हक देवें खबर ॥४॥
हाए हाए किनें ना पेहेचानिया, ए जो रसूल रेहेमान । कहे किताबें जाहेर, सब पर ए मेहेरबान ॥५॥
सब्द रसूल क्यों चीनहीं, ए जो चाम के दाम । ख्वाबी दम क्यों समझहीं, ए जो अल्ला के कलाम ॥६॥
जो दम होवें ख्वाब के, तिन क्यों उपजे विचार । ए सब ढूंढ़ें ख्वाब में, माएने हवा नूर पार ॥७॥
ए सांचा नूरी सांई का, इनके सब्द अगम । फरिस्ते आदम जो मिलो, किन निकसे ना मुख दम ॥८॥
आप रसूल नहीं हद का, इनों अर्सअजीम असल । दुनी सुरिया उलंघ ना सके, पूरी हद की भी नहीं अकल ॥९॥
ए सब्द पार बेहद के, ताके माएने करसी सोए । सब्द महंमद जानें मेंहेंदी, दूजा हद का न जाने कोए ॥१०॥
हद बेहद दोऊ जुदे, मेंहेंदी महंमद बिना न होए । अब देखो जाहेर हुए, रह्या सब्द न हद का कोए ॥११॥
एही किताब बोहोतन पे, पर माएने न पाए किन । अब देखो आलम में, इन किताब नूर रोसन ॥१२॥
जो दम होवें ख्वाब के, सो क्यों करसी पेहेचान । चीन्हया नहीं रसूल को, किन हिंदू न मुसलमान ॥१३॥
केतेक संग रसूल के, रेहेते रात दिन मांहें । नातो ओ बुजरक हुते, पर कछू अली बिन चीन्हया नांहें ॥१४॥
तबक चौदे हद के, चौगिरद निराकार । ए सब्द हदी क्यों समझहीं, जो निराकार के पार ॥१५॥
बेहद को सब्द न पोहोंचही, ए हद में करें विचार । कोई इत बुजरक कहावहीं, सो केहेवे निराकार ॥१६॥
फेर इनों को पूछिए, क्या बेचून बेचगून । क्या है सुन्य निरंजन, कछू खबर न दई इन ॥१७॥
निराकार आकारों ना सुध, ना सुध आप खसम । ना सुध छल ना वतन, ए बुजरकों बड़ी गम ॥१८॥
खासा नूरी खुदाए का, ए बोल्या सब्दातीत । सब मिल सब्द विचारहीं, पर पावें ना वे रीत ॥१९॥
आदम मिलो कई औलिए, अंबिए बड़े आकीन । नूरी कहावें फरिस्ते, पर किन रसूल को ना चीन ॥२०॥
सिफत बड़ी रसूल की, निराकार के पार अखंड । ऐसा कोई न हुआ, ना तो हुए कई ब्रह्मांड ॥२१॥
दीन दरसन फिरके मजहब, और मिलो कई जात । पढ़ पढ़ सिर बांधे पर, पर पाई ना नबी की बात ॥२२॥
चौदे तबक की रूह में, ऐसा ना कोई समर्थ । सब्द महंमद मेंहेंदी बिना, करे सो कौन अर्थ ॥२३॥
ए माएने इमाम बिना, कोई कर ना सके और । अब देखोगे इन माएनों, सुख लेसी सब ठौर ॥२४॥
नूर बड़ा इन सब्द में, सो देख थके सब कोए । इमाम बिना इन नूर को, रोसन क्यों कर होए ॥२५॥
इन जुबां मैं क्यों कहूं, मुसाफ मगज नूर । कुफर चौदे तबक का, किया इमामें दूर ॥२६॥
फुरमान नूर के पार का, सो क्यों कर इनों समझाए । ए माएने रोसन तब होवहीं, जब बैठे इमाम इत आए ॥२७॥
ल्याए खजाना वतनी, करसी आए इंसाफ । देसी सुख कायम, आवसी सो असराफ ॥२८॥
ए रसूलें पेहेले कह्या, खोलसी माएने इमाम । उमेदां मोमिन दुनी की, होसी जाहेर हुए कलाम ॥२९॥
मोमिन कारन आवसी, आखिर करी सरत । हम भी फेर तब आवसी, सुख देसी कर सिफायत ॥३०॥
जो सुख देसी इमाम, सो या जुबां कह्यो न जाए । उमेदां मोमिन की, पूरी ईसा इमामें आए ॥३१॥
नूर बड़ो इन माएनों, सो अब हुआ रोसन । तबक चौदे गरजिया, बरस्या नूर वतन ॥३२॥
कह्या जो इमाम आवसी, सो सरत हुई सत । आगे इन इमाम के, जाहेर होसी बड़ी मत ॥३३॥
एक लुगा झूठ ना होवहीं, जो बोले हजरत । आगे ही थें सब कह्या, पर क्यों समझे रूह गफलत ॥३४॥
अब सो इमाम आइया, याही दिन आखिर । सब्द रसूल के जाहेर, फिरवलसी सब पर ॥३५॥
पैंडा बताया रसूलें, पर कोई न समझया तब । तिन राह सब चलसी, राजी हो हो अब ॥३६॥
धंन रसूल धंन फुरमान, धंन आया जिन खातिर । धंन मेंहेंदी महंमद रूहअल्ला, धंन धंन ए आखिर ॥३७॥
अब सब में जाहेर हुए, बड़े रसूल के सब्द । इमाम आए फजर हुई, उड़ गई अंधेरी हद ॥३८॥
एते दिन ढांपे हते, मगज माएने बातन । आए इमाम बखत बदल्या, सैतान मारया सबन ॥३९॥
जाहेर साहेब हुए पीछे, चले न दूजी बाट । पंथ पैंडे मजहब सब उड़ गए, सब हुआ एकै ठाट ॥४०॥
आया सबका खसम, सब सब्दों का उस्ताद । महंमद मेंहेंदी आए बिना, कौन मिटावे वाद ॥४१॥
घर घर होसी सादियां, उड़ गई गफलत । जो कह्या सो सब हुआ, आई ए आखिरत ॥४२॥
तारीफ महंमद मेंहेंदी की, ऐसी सुनी न कोई क्यांहें । कई हुए कई होएसी, पर किन ब्रह्मांडों नांहें ॥४३॥
॥ प्रकरण ॥३०॥ चौपाई ॥१०५२॥
