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विषय-सूची

सनन्ध - प्रकरण ३१

सनंध दज्जाल की

जिन मोमिन के कारने, रचिया एह मंडल । तिनकी उमेदां पूरने, मेंहेंदी महंमद आए मिल ॥१॥

अब नेक कहूं आखिर की, जो होसी सब जाहेर । बांधे दज्जालें मोमिन, अंतर मांहें बाहेर ॥२॥

आया इमाम आलम का, तब कुफर रेहेवे कित । पर कहूं मोमिन दज्जाल की, नेक हुई लड़ाई इत ॥३॥

क्यों कहूं बल दज्जाल का, जाहेर बड़ा पलीत । जोर न चले काहू का, लिए जो सारे जीत ॥४॥

अंग जो बांधे या बिध, पेहेले पेड़ से फिराई बुध । उलटाए सबों या बिध, परी न काहूं सुध ॥५॥

दज्जाल नजरों न आवहीं, सब में किया दखल । जाने दोस्त को दुस्‍मन, कोई ऐसी फिराई कल ॥६॥

अंदर जो बांधे या बिध, कही न जाए करामत । सत असत कर देखहीं, असत लग्या होए सत ॥७॥

मन चित बुध अहंकार, काम क्रोध गफलत । आउध ए दज्जाल के, स्यानप ग्यान असत ॥८॥

भी आउध अमृत रूप रस, छल बल वल अकल । कोमल कुटिल अंग सीतल, चंचल चतुर चपल ॥९॥

जाकी अग्याएँ अगनी चले, चले जिमी और जल । वाउ भी हुकम पर खड़ा, ऐसा दज्जाल का बल ॥१०॥

ए दज्जाल बड़ा जोरावर, मूल गफलत याके साथ । मनसा वाचा करमना, ए सब इनके हाथ ॥११॥

जुध बड़ा दज्जाल का, लिए जो सारे जीत । भागे भी ना छूटहीं, कोई ऐसा बड़ा पलीत ॥१२॥

सूर बड़े इन जहान में, जिन किए सामें बल । ताबे अपने कर लिए, बाए गले सांकल ॥१३॥

छीन लिए बल सबन के, जो सूरमें बड़े केहेलाए । बांध्या जो कोई बल करे, तो बड़े जो गोते खाए ॥१४॥

जो बुजरक बड़े कहावहीं, तिन जुध किए मिल मिल । सो फरिस्ते उलटाए के, ले डारे गफलत दिल ॥१५॥

ए जुध करे सबनसों, आप नजर न आवे किन । दज्जाल जोर करामत, सब किए आप से तन ॥१६॥

कोई न छोड़या दज्जालें, जीत लिए सकल । ऐसे अंधे कर लिए, कोई सके न काहूं चल ॥१७॥

सब अंग बांधी दुनियां, सारे हुए बेअकल । अबलों किन देख्या नहीं, कुफर करामात कल ॥१८॥

या बिध बांधी दुनियां, खोल ना सके कोई बंध । राह हक की छुड़ाए के, ले डारे गफलत फंद ॥१९॥

दुनियां बाहेर देखहीं, अजूं आया नहीं दज्जाल । बंदगी करते आवसी, तब लड़सी तिन नाल ॥२०॥

खाए गया सबन को, अजूं देखत नाहीं ताए । तिनसे लड़ने बाहेर, बांध बांध कमरें जाए ॥२१॥

जुध याको जाहेर कह्या, देसी बंदगी छुड़ाए । आप अंदर से उठसी, जीत्यो न काहू जाए ॥२२॥

जाहेर कहे जो माएने, ए तित भी रहे उरझाए । लिखियां जो इसारतें, सो इनों क्यों समझाए ॥२३॥

तो कह्या नबिऐं इमन को, ला बारकला मुसल्मीन । दई बारकला हिंद मुस्लिम, लिए सिर कलाम आकीन ॥२४॥

कहा कहूं बल दज्जाल को, जोर बड़ा जालिम । पेहेले पढ़े सब लिए, पीछे छोड़या न कोई आलम ॥२५॥

नाम इमाम धरावहीं, पर फुरमान की ना सुध । बरकत कलमें रसूल के, साफ होसी सब बिध ॥२६॥

नजरों काहू न आवहीं, करत गैब की मार । कोई छूट्या मोमिन भाग के, और कर लिए सब कुफार ॥२७॥

फरिस्ता चौदे तबकों, फिरवल्या सब पर । हुकम चलाया अपना, कोई रह्या न ताबे बिगर ॥२८॥

ओ जाने हम सीधा चलें, इन बिध राह मारत । तो कही पुल-सरात, तरवार धार है इत ॥२९॥

ए आदम औलाद सब जानत, इन बदला मांग लिया हक पें । क्यों छूटे बंध दुस्मन के, तो किन चल्या ना इनसें ॥३०॥

क्यों करें जंग दज्जाल सें, काफर या मुसलमान । औलाद आदम सब ताबीन, पातसाह दिलों सैतान ॥३१॥

तो क्या चले बंदन का, जिन दिल पर ए पातसाह । सब जानें दुस्‍मन मारसी, हक तरफ चलते राह ॥३२॥

दिल मोमिन हक अर्स कह्या, तो इन दुनियां करी हराम । पीठ दई मुरदार को, जिन दिलों अर्स आराम ॥३३॥

जो दिल कह्या अर्स हक का, तिन तरफ जले काफर । मार ना सके राह मोमिनों, सब बंधे इनों बिगर ॥३४॥

मोमिन उतरे नूर बिलंद से, तो कह्या अर्स कलूब । तिन तरफ क्यों आए सके, जिनका हक मेहेबूब ॥३५॥

सब साफ किए दिल मोमिन, जब इत आए इमाम । जिन दिल पातसाह सैतान, किए पाक जलाए तमाम ॥३६॥

खबर न पाई काहूं ने, जो दिल ऊपर सैतान । साफ किए सबन को, जाहेर कर हुकम सुभान ॥३७॥

जाहेर काहूं ना हुआ, छिप कर लिए सब । इमाम आए जाहेर हुआ, ए जो दज्जाल न देख्या किन कब ॥३८॥

जब इमाम इत आए, तब क्यों रहे ढांप्या चोर । मोमिन पेहेले छुड़ाए के, दिए दुनी के बंध तोर ॥३९॥

ए जो जीती दज्जालें दुनियां, कर लई थी निरबल । सो बल सबको देय के, दिए सुख नेहेचल ॥४०॥

लिख्या है फुरमान में, मेंहेंदी आवेगा आखिर । उड़ाए मारसी दज्जाल को, राह देसी सीधी कर ॥४१॥

अब हुए सब जाहेर, कुफर करामात कल । महंमद मेंहेंदी के प्रताप से, जासी बंध सब जल ॥४२॥

कुदरत रूप दज्जाल को, किनहूं न जान्या जाए । तब सबों को सुध परी, जब ईसे दिया उड़ाए ॥४३॥

इमाम तो मारे इनको, जो ए आपे होए वजूद । इमाम के आवाज से, होए गया नाबूद ॥४४॥

जब इमाम जाहेर हुए, तब क्यों रेहेवे अंधेर । अपनी तरफ सबन के, लिए दुनी दिल फेर ॥४५॥

जो कबहूं प्रगटे होते, तो होत कुफर को नास । जब इमाम जाहेर हुए, तब नूर हुआ उजास ॥४६॥

मेंहेंदी महंमद ढांपे ना रहें, जासों झूठ भी सांच होए । ऐसा खसम जोरावर, यासें सुख पावे सब कोए ॥४७॥

॥ प्रकरण ॥३१॥ चौपाई ॥१०९९॥

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