सनन्ध - प्रकरण ३२
सनंध इमाम के प्रताप की
प्रताप इमाम कहा कहूं, इन जुबां कह्यो न जाए । तो भी नेक रोसन करूं, तुम लीजो चित ल्याए ॥१॥
ए नेक करूं इसारत, तुम सुनियो आखिर दिन । पेहेले मिलसी रूह मोमिन, पीछे तो सब जन ॥२॥
ए सरत सोई जो आगे करी, हक इलम होसी जाहेर । लिख्या है कुरान में, आया सो आखिर ॥३॥
सब्द गुझ पुकारहीं, सब में सचराचर । सो सारे कदमों तले, जब आए इमाम आखिर ॥४॥
खेल पाया इप्तदाए से, आप असल बका घर । सब सुध हुई प्रताप तें, जब आए इमाम आखिर ॥५॥
ए जो खेल था कुदरती, काहूं खोल न देखी नजर । सो उड़ाए दई पेड़ जुलमत, जब आए इमाम आखिर ॥६॥
त्रिगुन त्रैलोकी मोह की, कहां तें हुई किन पर । सो संसे न रह्या किन का, जब आए इमाम आखिर ॥७॥
निरंजन निराकार तें, खेल रच्यो नारी नर । ए सुध हुई सबन को, जब आए इमाम आखिर ॥८॥
ए जो फरिस्ते नूर से, खेल तिने किया पसर । ए गुझ सारों ने पाइया, जब आए इमाम आखिर ॥९॥
काल सुन्य जड़ चेतन, ए सब हुए जाहेर । ए धोखा किन का ना रहया, जब आए इमाम आखिर ॥१०॥
वेद कतेब के माएने, सब दृढ़ हुए दिल धर । किए मगज माएने जाहेर, जब आए इमाम आखिर ॥११॥
इलम ले ले अपना, सब जुदे हुए झगर । सो सारे एक दीन हुए, जब आए इमाम आखिर ॥१२॥
गैबी मार दज्जाल का, सब में गया पसर । सो साफ हुई सब दुनियां, जब आए इमाम आखिर ॥१३॥
आग बिना सब दुनियां, अगिन हुई जर बर । सो सारे ठंढ़े किए, जब आए इमाम आखिर ॥१४॥
दुनियां गोते खावहीं, बिन जल भवसागर । सो सारे ही थिर किए, जब आए इमाम आखिर ॥१५॥
क्यों पैदा क्यों होसी फना, ए ना काहू को खबर । सो सारों को सुध हुई, जब आए इमाम आखिर ॥१६॥
छिपिया सांच सबन से, झूठ गया पसर । सो सारे सत ले खड़े, जब आए इमाम आखिर ॥१७॥
काम क्रोध दिमाग में, सब धखे निस वासर । सो सारे ठंढ़े हुए, जब आए इमाम आखिर ॥१८॥
सब्द न लगे काहू को, ऐसे हिरदे भए बजर । सो गलित गात हुए निरमल, जब आए इमाम आखिर ॥१९॥
मुस्लिम को मुस्लिम की, हिंदुओं हिंदुओं की तर । ए समझे सब अपनी मिने, जब आए इमाम आखिर ॥२०॥
मने फिराई दुनियां, रेहे ना सक्या कोई थिर । सो मन सारे थिर किए, जब आए इमाम आखिर ॥२१॥
अलख जो अगम कहावहीं, ताकी कर कर थके फिकर । सो सक सुभे सब उड़ गई, जब आए इमाम आखिर ॥२२॥
सुध आतम परआतमा, सक्या ना कोई कर । सो सारे धोखे मिटे, जब आए इमाम आखिर ॥२३॥
हद बेहद के पार की, सब देख थके फेर फेर । सो सारों ने देखिया, जब आए इमाम आखिर ॥२४॥
पार सुध किन ना हती, बाहेर अंदर अंतर । सो सारे संसे गए, जब आए इमाम आखिर ॥२५॥
ढूंढ़ ढूंढ़ के सब थके, ए जो लैलत-कदर । ए दरवाजा खोलिया, जब आए इमाम आखिर ॥२६॥
कहांतें नूर-तजल्ला की, जो नूर की भी नहीं खबर । सो परदे उड़े सबन के, जब आए इमाम आखिर ॥२७॥
कहांतें अछरातीत की, जो सुध ना अछर छर । सो सारे जाहेर हुए, जब आए इमाम आखिर ॥२८॥
इस्क खसम बतावहीं, उड़ाए दिया सब डर । कायम सुख सब लेवहीं, जब आए इमाम आखिर ॥२९॥
मोमिन पीछे ना रहें, ताए सके ना कोई पकर । उमेदां पूरी सबन की, जब आए इमाम आखिर ॥३०॥
बड़े सुख मोमिन लेवहीं, रस इस्क पिएं भर भर । औरों को भी पिलावहीं, जब आए इमाम आखिर ॥३१॥
ए सुख कह्यो न जावहीं, रह्यो न कछू अंतर । मोमिन रूहें जाहेर हुए, जब आए इमाम आखिर ॥३२॥
सुख आसिकों क्यों कहूं, जो लेवें मासूक अंदर । सुन मोमिन टूक होवहीं, जब आए इमाम आखिर ॥३३॥
पीछे जहान इन दुनी की, दौड़ी आवे एक दर । तब तो सुख सागर हुआ, जब आए इमाम आखिर ॥३४॥
चौदे तबक हुई कजा, एक जरा ना रह्यो कुफर । सो साफ किए सबन को, जब आए इमाम आखिर ॥३५॥
ए जो काजी कजा करी, सो भी मोमिनों की खातिर । औरों पाया मोमिन बरकतें, जब आए इमाम आखिर ॥३६॥
बेचून बेचगून बेसबी, है बेनिमून क्यों कर । सो जाहेर हुआ सबन को, जब आए इमाम आखिर ॥३७॥
सेहेरग से हक नजीक, ए खोली ना किन नजर । सो पट उड़ाए जाहेर किए, जब आए इमाम आखिर ॥३८॥
कई आलम पल में पैदा फना, करें हक कादर । सो देखाए दुनी कायम करी, जब आए इमाम आखिर ॥३९॥
थी उरझन चौदे तबक में, सब जाते थे मर मर । दई हैयाती सबन को, जब आए इमाम आखिर ॥४०॥
किन पाया ना मगज मुसाफ का, जो ल्याया आखिरी पैगंमर । किया जाहेर यासों हक बका, जब आए इमाम आखिर ॥४१॥
लेवे खिताब इमाम का, बातून खुले ना इन बिगर । सो खोलके भिस्त दई सबों, जब आए इमाम आखिर ॥४२॥
थी रात अंधेरी सबन में, बका दिन देखाए करी फजर । मकसूद किया सबन का, जब आए इमाम आखिर ॥४३॥
इलम लदुन्नी काहूं ना हुता, कर जाहेर मिटावे कुफर । दिया सुख कायम सब को, जब आए इमाम आखिर ॥४४॥
कोई बेसक दुनी में ना हता, गई दुनियां एती उमर । सो दृढ़ कर दई हक सूरत, जब आए इमाम आखिर ॥४५॥
इमाम नूर है अति बड़ो, पर सो अब कह्यो न जाए । मेला होसी जब मोमिनों, तब देऊंगी नीके बताए ॥४६॥
॥ प्रकरण ॥३२॥ चौपाई ॥११४५॥
