Logo  Kuljam.org

विषय-सूची

सनन्ध - प्रकरण ३३

सनंध कजा की

सुनियो दुनियां आखिरी, भाग बड़े हैं तुम । जो कबूं कानों ना सुनी, सो करो दीदार खसम ॥१॥

कई राए राने पातसाह, छत्रपति चक्रवर्त । ताए हक सुपने नहीं, सो गए लिए गफलत ॥२॥

कई देव दानव हो गए, कई तीर्थंकर अवतार । किन सुपने ना श्रवनों, सो इत मिल्या नर नार ॥३॥

करी अनेकों बंदगी, इस्क लिया कई जन । तिन काहूं ना नजीक, सो इत मिल्या सबन ॥४॥

चौदे तबक के खावंद, कर कर गए उपाए । तित परदा सबन पर, सो इत दिया उड़ाए ॥५॥

तुम जानते थे मलकूत को, हम सिर एही बुजरक । तिनको न बका ख्वाब में, सो इत पाया सबों हक ॥६॥

मारता था राह दुनी की, सबका था दुस्मन । जित हिदायत एक हादी की, तित भी मारे तिन ॥७॥

एक राह थी अव्वल, तित भी दिए फिराए । कई इलम देखाए जुदे डारे, बल सैतान कह्यो न जाए ॥८॥

बैठ दुनी के दिल पर, चलाया हुकम । हक राह छुड़ाए डारे उलटे, ए दुस्मने किया जुलम ॥९॥

ए दुस्मन देखाया रसूलें, पर इनसों चल्या न किन । आप जैसा होए के, राह मारी सबन ॥१०॥

सो काफर उड़ाए दिया, जिन मारी थी सबकी राह । सो जानिए हता नहीं, जब आया हक पातसाह ॥११॥

मैं बड़ भागी तुमें तो कहे, जो आए इन आखिर । तो कहूं जो दूर होवही, अब देखोगे नजर ॥१२॥

यामें बड़े रूह मोमिन, सो जुबां कह्यो न जाए । अबहीं इमाम के कदमों, देखोगे सब आए ॥१३॥

ए कह्या रसूलें अव्वल, ए जो चौदे तबक । इनमें काजी आखिर दिनों, इत कजा जो करसी हक ॥१४॥

रसूलें इत आए के, पेहेलें किया पुकार । आवसी रब आलम का, तब हूजो खबरदार ॥१५॥

लिख्या आगम कदीम का, सो आए मिल्या दिन । याही सदी आखिर की, पुकार करे सब जन ॥१६॥

नूर अकल ले लदुन्नी, हुकमें किया पसार । महंमद मेंहेंदी ईसा आवसी, आगे चेतावें नर नार ॥१७॥

आप इमाम अजूं गोप है, होत आगे रोसन नूर । रात अंधेरी क्यों रहे, जब ऊग्या कायम सूर ॥१८॥

सॉंच झूठ तफावत, जैसे दिन और रात । साँच सूर जब देखहीं, तब कुफर रात मिट जात ॥१९॥

जो लों थे परदे मिने, दुनियां उरझी तब । सो परदा अब खोलिया, दिया मन चाह्या सुख सब ॥२०॥

जो लों जाहेर हक ना हुए, तो लों मारे दिमाक । हक प्रगटे कुफर मिट गया, सब दुनियां हुई पाक ॥२१॥

जब कुफर कछू ना रह्या, तब दुनियां हुई एक दीन । ए नूर कजा का झिल मिल्या, आया सबों आकीन ॥२२॥

दुनियां टेढ़ी मूल की, ताको गयो पेड़ से बल । पाक किए सब इमामें, कुफर गया निकल ॥२३॥

पुकार कह्या वेद कतेबों, पर बस न किया काहूं दिल । कर कर मेहेनत कई थके, पर हुआ न कोई निरमल ॥२४॥

ना तो कई बुजरक हुए, कैयों करियां नसीहत । ओ मुरीद विचारे क्या करें, किनें पीर न पाई मारफत ॥२५॥

सो इमामें इत किए, सब जन के मन बस । होए ना किन इमाम को, इन जुबां ए जस ॥२६॥

सो इमाम इत आइया, इन जिमी हिंदुस्तान । सब तलबें याही दिसा, चौदे तबक की जहान ॥२७॥

पर मुझे प्यारी बरारब, जिन जिमी आए रसूल । मेहेर नजर महंमद की, पर काफर गए सब भूल ॥२८॥

पीछे केहेर नजर करी, सो भी वास्ते मेहेर । पर काफर जो उलटे, सो देखे सब जेहेर ॥२९॥

केहेर नजर देखाए के, फेर लिए मेहेर मांहें । मुस्लिम नाम धराए के, बैठे मुस्लिम की छांहें ॥३०॥

अब तो लगे सब बंदगी, आया भला आकीन । नर नारी हक कलमें, कायम खड़े हैं दीन ॥३१॥

पेहेले बीतक रसूलसों, सो भी सुनो नेक बोल । आरब समझें आरबी, दोए कहूँ लुगे दिल खोल ॥३२॥

॥ प्रकरण ॥३३॥ चौपाई ॥११७७॥

इसी सन्दर्भ में देखें-