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विषय-सूची

सनन्ध - प्रकरण ३६

सनंध ईसा इमाम के कजा की

इत ईसा मसी आए के, पेहेले किया सरंजाम । काटे आउध दज्जाल के, पीछे आए रसूल इमाम ॥१॥

अब सब्दातीत की सब्द में, सोभा बरनी न जाए । जो कछू कहूं सो सब्द में, बोलूं कौन जुबांए ॥२॥

खूबी तखत ना केहे सकूं, इन जुबां के जोर । जांनूं रात कुफर की मिट गई, हुआ दिन जाहेर भोर ॥३॥

हिसाब नहीं उजास को, आगे ले खड़ा लदुन्नी नूर । जाए ना बरन्यो इन जुबां, खड़ी अर्स अरवा हजूर ॥४॥

आगे खड़ा असराफील, और जबराईल हुकम । जोस सब रूहन पर, वतन बका खसम ॥५॥

यों बैठे तखत इमाम, सिर छत्र कई चंवर । रसूल अली आए मिले, हुई बधाइयां घर घर ॥६॥

गुझ थे मोमिन अर्स के, ताकी जाहेर हुई खबर । सो बैठे घेर इमाम को, हुई बधाइयां घर घर ॥७॥

कई औलिए कई अंबिए, कई फरिस्ते पैगंमर । सो सब आगे आए खड़े, हुई बधाइयां घर घर ॥८॥

आइयां किताबें जिन पर, बुजरक जो मेहेत्तर । मुसलमान आए संग, हुई बधाइयां घर घर ॥९॥

मुसलमान कई भेखसों, पीर मरद फकर । पीछा कोई ना रेहेवहीं, हुई बधाइयां घर घर ॥१०॥

जुदी जुदी जातें जहानमें, सब आवत हैं मिल कर । होत दीदार सबन को, हुई बधाइयां घर घर ॥११॥

दुनियां चारों खूंट की, सब आवत हैं एक दर । मंगल गावें सब कोई, हुई बधाइयां घर घर ॥१२॥

जिन्होंने कबूं कानों ना सुनी, जात बरन भेख धर । आवत सब उछरंग में, हुई बधाइयां घर घर ॥१३॥

बिना हिसाबें आलम, वैराट सचराचर । दौड़त सब दीदार को, हुई बधाइयां घर घर ॥१४॥

अरवा चौदे तबकों, जो कोई नारी नर । इन तखत इमाम के कदमों, हुई सारों की नजर ॥१५॥

जब आया रब आलमीन, तब आया सबों आकीन । और मजहब सब उड़ गए, एक खड़ा महंमद दीन ॥१६॥

जात एक खसम की, और न कोई जात । एक खसम एक दुनियां, और उड़ गई दूजी बात ॥१७॥

करने दीदार हक का, आए मिली सब जहान । साफ हुए दिल सबन के, उड़ गई कुफरान ॥१८॥

खाए पिऐं सब मिलके, बंदगी एक खसम । नाम न्‍यारे सब टल गए, हुई नई एक रसम ॥१९॥

मेला अति बड़ा हुआ, पसर गई पेहेचान । सेहेदाने सबों घरों, चारों खूंटों बजे निसान ॥२०॥

आए इमाम बाजे बजे, सो केते कहूं विचित्र । बिना हिसाबें बाजहीं, हिसाब बिना बाजंत्र ॥२१॥

कजा हुई तब जानिए, जब खुले माएने कुरान । तब आगे तें उड़ गई, जाने हती नहीं कुफरान ॥२२॥

मगज माएने किन ना खुले, अव्वल बीच और अब । ए कजा तब होवहीं, जब खुले माएने सब ॥२३॥

कछुक रखे रसूलें, माएने सब थें गुझ । सो इमाम मुख खोलाए के, करत काजीकी सुझ ॥२४॥

गुझ का गुझ और जो सुन्या, सो लिख्या न रसूले कुरान । जांने काजी जुबां केहेलाए के, कर देऊं काजी की पेहेचान ॥२५॥

याही वास्ते गुझ रख्या, ए बात दिल में आन । कसनी सेती परखिए, काजी कसौटी कुरान ॥२६॥

मोमिनो सो असल का, महंमद सदा सनेह । सो आखिर लों फुरमान, लिए खड़ा है एह ॥२७॥

महंमद बिना मेंहेदीय की, करदे कौन पेहेचान । इन विध माएने तो लिखे, जो निसबत अव्वल की जान ॥२८॥

एही कलाम अल्लाह के, अपनी देत खबर । काजी ईसा मेंहेदी महंमद, ए जुदे होंए क्यों कर ॥२९॥

केहेनी अकथ इमाम की, खसमें कथाई हम । इन कुरान के माएने, ना होवे बिना खसम ॥३०॥

कलाम अल्ला के माएने, कबूं ना खोले किन । एही कलाम यों केहेवहीं, ना खुले मेंहेंदी बिन ॥३१॥

सो खसमें खोलाए मुझपे, यों कर किया हुकम । कहे तूं आगे रूहें फरिस्ते, जिन प्यारे हक कदम ॥३२॥

हरफ हरफ के माएने, तामें गुझ मता अनेक । खोल तूं आगे अर्स रूहें, जो प्यारी मुझे विसेक ॥३३॥

अब तुम सुनियों मोमिनों, सुनते होइयो श्रवन । पीछे विचार होए विचारियो, तब मगज पाइए वचन ॥३४॥

सनंधे सनंधे साखियां, तिन साखी साखी पाव । तिन पाव पाव के हरफ का, तुम लीजो दिल दे भाव ॥३५॥

नूर हक के अंग का, होवे एकै ठौर । इत थें दूजे पसरे, पर न होवे काहूं और ॥३६॥

ईसा महंमद मेंहेदीय की, जो लों ना पेहेचान तुम । तो लों तुममें कजाए का, क्योंकर चलसी हुकम ॥३७॥

सुध नाहीं फरिस्तन की, ना पेहेचान रूहन । ना पेहेचान मुतकी की, ना पेहेचान मोमिन ॥३८॥

सुध ना उतरने पुल-सरात, ना सुध सरा तरीकत । ना पेहेचान हकीकत की, ना पेहेचान हक मारफत ॥३९॥

पेहेचान आप ना नासूत की, ना पेहेचान मलकूत । ना सुध बका जबरूत की, ना सुध अर्स लाहूत ॥४०॥

ए पेहेचान काहूं ना परी, क्या बेचून बेचगून । ना पेहेचान ला मकान की, ना बेसबी बेनिमून ॥४१॥

ना पेहेचान हवाए की, जामें चौदे तबक झूलत । जिन से आए काफर, ना सुध तिन जुलमत ॥४२॥

ना सुध खासी गिरोह की, जो कहावत है बुजरक । जिन को हिदायत हक की, तिन सोहोबतें पाइए हक ॥४३॥

ना सुध निराकार की, ना सुध निरगुन सुंन । ना सुध ब्रह्म क्यों व्यापक, कैसी सूरत निरंजन ॥४४॥

ना सुध ब्रह्मसृष्ट की, सुध सृष्ट ना ईश्वरी । हिंदू जो जीव सृष्ट के, तिन ए सुध ना परी ॥४५॥

विजिया अभिनंदन बुधजी, और निहकलंक अवतार । वेदों कह्या आखिर जमाने, एही है सिरदार ॥४६॥

इनमें लिखी आखिर, सो सुध ना परी काहू जन । पढ़ पढ़ गए कई वेद को, पर उनों पाया न कयामत दिन ॥४७॥

करनी कजा चौदे तबक, देना सबों आकीन । कुरान माजजा नबी नबुवत, होए साबित हुए एक दीन ॥४८॥

कहां अर्स कहां हक बका, कहां है नूर मकान । क्यों पावे महंमद तीन सूरत, जो लों ना ए पेहेचान ॥४९॥

पेहेले माएने हक कलमें के, सुध हक इमाम रसूल । और कजा सब होएसी, पर बड़ी कजा ए मूल ॥५०॥

आसिक मासूक दो लिखे, दोऊ एक केहेलाए । दो कहे कुफर होत है, अब काजी क्या फुरमाए ॥५१॥

एक भी कहे ना बने, दो भी कहे न जाए । ना भेले ना जुदे कहे, अब फुरमान क्या फुरमाए ॥५२॥

सिरदार न होवे एकला, ज्यों हुकम हाकिम संग । त्यों महंमद मेंहेंदी हक से, ए दोऊ एकै अंग ॥५३॥

जो कछू कहूं महंमद को, तामें अली जान । हुकम छोड़ हाकिम फिरया, सो हाकिम हुकम सुभान ॥५४॥

जाहेर कीजे माएने, काजी एह कजाए । पेहेचान आसिक मासूक की, भी नीके देऊं बताए ॥५५॥

जिन कोई कहे पट बीचमें, मासूक और आसिक । कबूं आसिक परदा ना करे, यों कह्या मासूक हक ॥५६॥

परदा आड़ा मासूक, कबूं आसिक करे ना कोए । आसिक मासूक तब कहिए, एक अंग जब होए ॥५७॥

ना न्‍यारा आसिक मासूक, ए तो एकै किया प्रवान । तो बीच कह्या क्यों फरिस्ता, जो जाए आवे दरम्यान ॥५८॥

कह्या हक सेहेरगसे नजीक, सब हैवान या खलक । तो रसूल जुदागी क्यों हुई, जो बीच भेज्या जबराईल हक ॥५९॥

जो लों ए सक ना मिटे, तो लों होए ना पेहेचान हक । ए भी कीजे जाहेर, सब मोमिन करूं बेसक ॥६०॥

एक सुरत दो बीच में, ए जो फिरे दरम्यान । तिनको कहिए फरिस्ता, नूर जोस अंग का जान ॥६१॥

रसूल आया हुकमें, तब नाम धराया गैन । हुकम बजाए पीछा फिरया, तब सोई ऐन का ऐन ॥६२॥

सब सकें दूर कीजिए, साफ कीजे समझाए । मासूक क्यों महंमद कह्या, क्यों होए आसिक अल्लाह ॥६३॥

तो कह्या मासूक महंमद, आसिक अपना नाम । बांध्या आप हुकम का, केहेवत यों कलाम ॥६४॥

वली पैगंमर फरिस्ते, आए मिले सब संग । ज्यों गुन इंद्री जुदे जुदे, उठ खड़े सब अंग ॥६५॥

जब ईसा मेंहेदी महंमद मिले, तब मिले सब आए । फेर पीछा क्या देखहीं, परदा दिया उड़ाए ॥६६॥

हक जो नूर के पार है, तिन खुद खोले द्वार । बका द्वार तब पाइया, जब खोल देखाया पार ॥६७॥

पेहेचान मेंहेदी महंमद, और ईसा अली मोमिन । ए कजा दिल भीतर, निसां हुई हम सबन ॥६८॥

अब कहो क्यों फरिस्ते, क्यों फना आखिरत । भिस्त क्यों कर होएसी, क्यों होसी कयामत ॥६९॥

ए सबे समझाए के, पाक करो हम दिल । पीछे बात वतन की, हम पूछसी मोमिन मिल ॥७०॥

॥ प्रकरण ॥३६॥ चौपाई ॥१२९५॥

इसी सन्दर्भ में देखें-