Logo  Kuljam.org

विषय-सूची

सनन्ध - प्रकरण ३७

सनंध फरिस्ते फना आखिरत भिस्त कयामत की

अब कहूं बिध नूरियों, जो जहां जिन ठौर । ए माएने इमाम बिना, कोई करे जो होवे और ॥१॥

पांच फरिस्ते नूर से, खड़े मिने हुकम । पाव पल में पैदा करे, ऐसे कई इंड आलम ॥२॥

यामें एक रसूल संग, ए जो जबराईल । सो नूर से आवत रूहन पर, हकें भेज्या रोसन वकील ॥३॥

ए जो ले खड़े खेल को, और कहे जो चार । ए असल कतरा नूर का, जिनको एह विस्तार ॥४॥

यामें एक फरिस्ता, तिन से उपजे सब । सरत आखिर असराफील, नूर से आया अब ॥५॥

अजाजील असराफील, इन दोऊ की असल एक । पैदा अजाजील से, सो भी कहूंं विवेक ॥६॥

कतरे से पैदा हुआ, इन से उपजे दोए । तामें एक सबों को पालहीं, एक करत कबज रूह सोए ॥७॥

ए दोऊ जो पैदा हुए, सो ले खड़े सब छल । नूर की नजरों चढ़े, तिनों आया सबों बल ॥८॥

यों चारों पैदा हुए, खड़े रहे जिन खातिर । सोई काम सोई जाएगा, ए भी दोऊ देऊं खबर ॥९॥

एक पैदा कर वजूद खेलावहीं, दूृजा पाले तिन । तीसरा किन किन लेवहीं, चौथा उड़ावे सबन ॥१०॥

यों नूर नजर चारों पर, इन बिध हुई पैदास । फेर कहूं बेवरा इन का, ए जो खेलें खेल लिबास ॥११॥

या विध उपजे नूर से, इन से सब विस्तार । थिर चर चौदे तबकों, हुआ खेल कुफार ॥१२॥

अजाजील को गफलतें, हुकमें दिया उलटाए । ले तखत बैठाया छल के, सब फरेब जुगत बनाए ॥१३॥

अजाजील से फरिस्ते, उपजे बिना हिसाब । सो दम सबों में इनका, ए जो खेलें मिने ख्वाब ॥१४॥

परदा इन सिरदार पर, ए जो कही जुलमत । पीछा हटाया हुकमें, ताए कुफर सेवें कर सत ॥१५॥

ले बैठा हुकमें साहेबी, जाकी असल कतरा नूर । सो सरमाए के पीछा हट्या, अपना देख अंकूर ॥१६॥

इन सेती जो उपजे, तिन सिर दिया भार । आप तिन से न्यारा रख्या, ए दोए भए सिरदार ॥१७॥

एक दाना पानी घास सबको, मेकाईल बुध बल । ठौर बैठा आप देवहीं, कर पसारा अकल ॥१८॥

जोर जालिम अजराईल, बैठा छल में हुकम ले । फिरत दोहाई इन की, तले काफर खेलत जे ॥१९॥

फरामोस सरूप अजराईल, मौत हुकम सिर सबन । जिन वजूद धरया खेल में, आए लेत कौल पर तिन ॥२०॥

पाले मेकाईल इन को, रूह कबज करे अजराईल । ए खेल समेत फरिस्ते, आखिर उड़ावे असराफील ॥२१॥

ला हवा से तेहेतसरा लग, ए सब खेल में पातसाह एक । कहे या बिन और कोई नहीं, एही है एक नेक ॥२२॥

और जो इनके तले, ठकुराइयां कहावत । देखाए दुनी को साहेबी, अपने तले ल्यावत ॥२३॥

एक दूजे के गुमास्ते, वजीर वकील दिवान । एक फरिस्ता सबका खावंद, यों खेल बन्या सब जहान ॥२४॥

यामें बुजरक आलम आरफ, तिन करियां कई किताब । इन सिर हक एक मलकूत, चौदे तबकों लेत हिसाब ॥२५॥

ब्रह्मा सिव या देव जन, कई दुनियां तिन सेवक । सो कहे ए सुख देवहीं, खैंचे अपनी तरफ खलक ॥२६॥

करे पातसाही खेल में, ऐसी कर बंदोबस्त । देत काफरों दोजख, बंदों कदमों चार भिस्त ॥२७॥

जिन हक बका अर्स न पाइया, तिन खुदा हवा या मलकूृत । सो कटे पुलसरात में, जिन पकड़े वजूद नासूत ॥२८॥

सो ले न सके भिस्त कदमों, तिन अरवाहों देत दोजख । और हिसाब सुख दुख हैं कई, ए खेल कह्यो चौदे तबक ॥२९॥

ए जो खेल पैदा की सब कही, इनों सिर अर्स मलकूत । ला मकान जिमी तहेतसरा, ए सब फना तले जबरूत ॥३०॥

ए जो तले ला हवा के, जो खेल कह्या फना । इनों सुध ना जबरूत लाहूत, ए बका वह सुपना ॥३१॥

लोक जिमी आसमान के, सुरिया ना उलंघत । कह्या चौदे तबक का पलना, बीच हवा के झूलत ॥३२॥

चार लाख कोंम आजूज माजूज, ए जो आवे जाए रात दिन । गिनती कौल पूरा कर, आखिर एही काल सबन ॥३३॥

जबरूत लाहूत अर्स कहे, देवें रूह अल्ला हकीकत । ए बका मता दोऊ अर्सों का, सो महंमद पे मारफत ॥३४॥

रूहें अर्स अजीम की, फौज असराफील फरिस्तन । दोऊ गिरो उतरी दोऊ अर्सों से, खेल फरिस्तों का देखन ॥३५॥

पेहेले कही सब खेल की, और कहे देखनहार । रूहें फरिस्ते खेल देखहीं, पकड़ ख्वाब आकार ॥३६॥

अजाजील खेल खावंद, ए भी न्यारा रह्या सबन । ए खेल कुफार इन भांत का, तो ऐसा किया इन ॥३७॥

ऐसी छोड़ साहेबी अजाजील, पीठ दई आप बचाए । ए खेल ऐसा कुफार का, बिना काजी कौन बताए ॥३८॥

मोमिनों को देखलावने, किया खेल कुफार । अब जो अर्स रूहें होवहीं, सो क्यों चलें इन लार ॥३९॥

खेल कुफार इन भांत का, सब खेलें हक बका भूल । इनमें फुरमान ल्याइया, मेरे मासूक का रसूल ॥४०॥

आया रसूल पुकारता, राह सीधी बका वतन । ए माएने कौन लेवहीं, बिना अर्स रूह मोमिन ॥४१॥

हम उतरे लैलत-कदर में, माहें उरझे खेल कुफार । दसों दिस हम ढूंढ़िया, पर काहूं न पाइए पार ॥४२॥

रसूलें हम वास्ते, मुनारे मुल्लां चढ़ाए । जिन कोई मोमिन भूलहीं, ठौर ठौर पुकार कराए ॥४३॥

कोई भूली राह बतावहीं, ताए बड़ा सवाब । ढिंढोरा फिराइया, कर कर एह जवाब ॥४४॥

हम ढूंढ़ ढूंढ़ कुफार में, गए जो तिनमें भूल । ऐसे मिने खसम के, पाए दसखत हाथ रसूल ॥४५॥

इन फुरमान में इसारतें, लिखियां जो खसम । निसान अर्स अजीम के, पाए हमारे हम ॥४६॥

हम ढूंढ़ें हक वतन, और रसूल ढूंढ़ें हम । यों करते सब आए मिले, मोमिन रसूल खसम ॥४७॥

सुनो मोमिनों बेवरा, ए जो आपन देख्या खेल । जो तीनों देखे आलम, उतर के मांहें लैल ॥४८॥

हकें बचाए कोहतूर तले, तोफान हूद महत्तर । दूसरे तोफान नूह के, बचाए किस्ती पर ॥४९॥

साल हजार पीछे रसूल के, मांहें उतरे लैलत-कदर । हुआ अर्स बका दिन जाहेर, सदी अग्यारहीं के फजर ॥५०॥

एही फरदा रोज कयामत, जो कही हजरत । सो ए हुए सबे जाहेर, जिनको दुनी ढूंढ़त ॥५१॥

सीधी राह वतन की, अब लों न पाई किन । पैगंमर ना फरिस्ते, ना अहंमद मेंहेदी बिन ॥५२॥

खेल फरिस्ते अर्स बका, हक मता पाया हम सब । आखिर भिस्त कयामत, ए कजा कहिए अब ॥५३॥

ए कहूं फना पेहेले जिन विध, होसी इन आखिरत । ज्यों पावें सुख भिस्तमें, उठ के रूह कयामत ॥५४॥

ए कजा हुई दुनियां मिने, खोले हकीकत मारफत । तिन मता बका अर्स का, जाहेर करी न्यामत ॥५५॥

बका सूरत पर बंदगी, करी इमामें इमामत । दोऊ अर्स बताए दोऊ गिरोह को, करी महंमद सिफायत ॥५६॥

ए नूर कजा का या बिध, जिन टाली फेर अंधेर । जो न राखूं ले हुकम, तो भोर होत केती बेर ॥५७॥

कयामत काजी मोमिनों, पेहेले होसी जब । फैलसी नूर आलम में, काजी कजा का सब ॥५८॥

ए किरने कौन पकरे, इन नूरै के आवाज । करत ए सब खसम, अर्स अरवाहों काज ॥५९॥

काजी कजा के नूर की, बजसी कई करनाल । नूर अकल असराफील, बजाए स्वर रसाल ॥६०॥

कई करोर करनाइयां, कई करोर निसानों घोर । यों गरज्या आलम में, सो कह्या न जाए सोर ॥६१॥

याही सब्द के सोर से, पेहेले उड़सी इंड अंधेर । कुदरत बुरका गफलत, उड़ाया फरिस्तों फेर ॥६२॥

आकास जिमी जड़ मूल से, पहाड़ आग जल वाए । फिरया कतरा नूर का, और दिया सब उड़ाए ॥६३॥

इन घाव के पड़घाव से, उड़सी चौदे तबक । और आवाज के नूर से, बैठे भिस्त में कर हक ॥६४॥

पेहेले दिए सब उड़ाए के, चौदे तबक दम जे । काजी कजा के नूर से, भिस्त में बैठे नूर ले ॥६५॥

क्यों बरनों सुख भिस्त के, हो बैठे नूरी नेहेचल । रेहेमत इन रेहेमान की, रच दिया और मंडल ॥६६॥

अपने अपने ताएफें, अरवाहें मिली सब धाए । महंमद मेंहेदी की मेहेर से, भिस्त में बैठे आए ॥६७॥

पेहेले सब फना कर, उठाए लिए ततखिन । साफ किए सब नूर ने, यों भिस्त भई वतन ॥६८॥

निमख में नूर नजरों, उठे अंग उजास । बरस्या नूर सबन में, कायम सुख में बास ॥६९॥

ए कायम नूर नजर की, सिफत या जुबां कही न जाए । पाक हुए सब खेलहीं, जरा खतरा न पाइए ताए ॥७०॥

खाना पीना दिल चाहता, सब बिध का करार । नूर सरूपें होए के, भिस्त में बसें नर नार ॥७१॥

रूप रंग सब नूर के, गुन अंग इंद्री नूर । वस्तर भूखन नूर सबे, नूरै दिए अंकूर ॥७२॥

मेवा मिठाई सेज सुख, सकल बिध भर पूर । इस्क सबों में अति बड़ा, दिल हिरदे नूर हजूर ॥७३॥

या भिस्त में इन सुख को, केतो कहूं विस्तार । दिल चाह्या सब पावहीं, सब बिध सुख करार ॥७४॥

लागी बरखा नूर की, चौदे तबक चौफेर । अंतर माहें बाहेर, कहूं पैठ न सके अंधेर ॥७५॥

चौदे तबक नूरने, फेर किया मंडल । खेल चाल दिल चाहते, नूर अरवा नूर बल ॥७६॥

सुन्य चाही तिन सुन्य दई, भिस्त चाही तिन भिस्त । नूर चाह्या तिन नूर दिया, यों पाई अपनी किस्त ॥७७॥

मात हुई मात चाहते, बुध बाबा आलम । मन चाह्या सबको दिया, अर्स रूहों के खसम ॥७८॥

मोमिन रूहें कदमों लिए, फरिस्ते नूर समाए । तीसरे सारे भिस्त में, सो बैठे नूर की छांए ॥७९॥

भिस्त भी बरकत मोमिनों, दई दुनियां को अविनास । पर सुख बड़े मोमिन के, लिए कदमों अपने पास ॥८०॥

पैदास कतरे नूर की, ए जो हुई चल विचल । फेर समेत समानी नूर में, सो नूर सदा नेहेचल ॥८१॥

असराफील बुध नूर की, ए जो आई काजी हजूर । सो नूर में जाए झिल मिली, ऐसी हुई कजा के नूर ॥८२॥

उड़ाया कतरा नूर का, सो जाए रह्या मिने नूर । फेर नजर करी भिस्त पर, हुई रोसन भर पूर ॥८३॥

कजा हुई सबन की, पर मोमिन बड़े अंकूर । इन को खेल देखाए के, लिए कदमों अपने हजूर ॥८४॥

यों कजा करी सबन की, बांट दिए सब ठौर । ए सुध इन काजी बिना, कोई देवे जो होवे और ॥८५॥

काजी कजा करके, ले उठसी रूह मोमिन । पेहेले ए कयामत होएसी, पीछे अरवाहें सबन ॥८६॥

माएने इन कुरान के, या जाहेर या बातन । दई सबों को हैयाती, खोल के इलम रोसन ॥८७॥

कुदरत की सारी कही, बुरका जो गफलत । दोजख भिस्त फरिस्ते, आखिर कही कयामत ॥८८॥

ए सब्द तो लों कहे, जो लों आए जुबांए । सब्द न अब आगे चले, आवे नहीं कजाए ॥८९॥

आखिर हुई इन जिमी, इन जिमी आया कागद । जिन कोई हिसबो खेल में, याको ना लगे सब्द ॥९०॥

इन जिमी में महंमद, होए आया कासद । जिन कोई हिसबो खेल में, याको न लगे सब्द ॥९१॥

ल्‍याए ल्याए रूहों पिलावहीं, इस्क प्याले मद । जिन कोई हिसबो खेल में, याको न लगे सब्द ॥९२॥

करी कजा चौदे तबकों, उड़ाए दई सब हद । जिन कोई हिसबो खेल में, याको ना लगे सब्द ॥९३॥

नूर अकल असराफील, ले पोहोंच्या पार बेहद । जिन कोई हिसबो खेल में, याको न लगे सब्द ॥९४॥

नूर इन आखिर का, और रोसन काजी सुभान । क्योंकर इन जुबां कहूं, रसूल नूर फुरमान ॥९५॥

काजी नूर सोहागनियों, इस्क प्याला ले । क्यों बरनों मैं इन जुबां, ए जो भर भर सबको दे ॥९६॥

नूर इस्क इन मद का, ए जो चढ़सी सबन । ताए लेसी असलू नूर में, क्यों करे जुबां बरनन ॥९७॥

अर्स रूहें मोमिन, ए सब रूहें सोहागिन । क्यों बरनू मैं इस्क इन का, ए जो रूह अल्ला के तन ॥९८॥

ए झूठी जिमी जो ख्वाब की, खाकी बुत सब रद । ताए भी मद ऐसा चढ़्या, जो लगे न काहू को सब्द ॥९९॥

लिखे हरफ सारे कहे, ए जो लिखे हरफ नांहें । अब सो ए करूं मैं जाहेर, जो रसूल के दिल मांहें ॥१००॥

ए जो रसूलें कानों सुने, पर लिखे नहीं फुरमान । सो गुझ मोमिनों को देऊंगी, अर्स अजीम के निसान ॥१०१॥

क्यों वतन क्यों खसम, कौन ठौर क्यों नूर । ए सेहेरग से देखे नजीक, जो मोमिन सदा हजूर ॥१०२॥

दोऊ अर्स बका जाहेर किए, जबरूत नूर जलाल । हादी रूहें लाहूत में, हक सूरत नूर जमाल ॥१०३॥

अब कहूं हुकम की, जिन से सब उतपत । खेल फरिस्ते हुकमें हुए, हुकमें हुई कयामत ॥१०४॥

हुकमें झूठे सांच कर, ताए सुख दिए नेहेचल । अब हुकम कजा में न आवहीं, पर तो भी कहूं नेक बल ॥१०५॥

॥ प्रकरण ॥३७॥ चौपाई ॥१४००॥

इसी सन्दर्भ में देखें-