सनन्ध - प्रकरण ३८
सनंध हुकम की
हुकमें परदा उड़ाइया, कर देऊं सब पेहेचान । तुमसों गोसे बैठ के, देऊंगी सब निसान ॥१॥
हुकमें बात वतन की, जो है गुझ खसम । गोसे तुमको कहूंगी, जो हुआ मुझे हुकम ॥२॥
निसान बका हक अर्स के, सो सब देऊंगी तुम । पर पेहेले नेक ए कहूं, जो तुम वास्ते हुआ हुकम ॥३॥
कहूं हुकम हक के, जो बैठे कदमों मोमिन । सो हमेसा अर्स में, ताए मेहेर बड़ी बातन ॥४॥
खसमें हमारे दिल पर, ऐसे किया हुकम । तो यों दिल में उपज्या, मांगें खेल खसम ॥५॥
तब हम मोमिन मिल के, खेल मांग्या हादी हक पे । तब हुकमें पेहेले पैदा किया, हमारी नजर हुई खेल में ॥६॥
तब सरूप हुकम के, खेल किया मिने पल । हाथ फुरमान ले आइया, रसूल हमारा चल ॥७॥
हम भी देखें खेल को, हुकमें मोमिन मिल । ढूंढ़ें अपने खसम को, पेड़ हुकमें फिराई कल ॥८॥
ए खेल सब हुकमें हुआ, सब खेलें हुकम मांहें । हुकमें सब होसी फना, हुकम बिना कछू नांहें ॥९॥
एक हुकमें बुजरक, दूजे न खाक समान । बेसुध कर सब हुकमें, खेलावत है जहान ॥१०॥
हुकमें जड़ चेतन करे, करे चेतन को जड़ । हुकमें सेती हारिए, हुकमें मारे पकड़ ॥११॥
एक चलाए पांउसों, एक उड़ाए पर । पेटें हुकम चलावहीं, एक खड़े रखे जड़ कर ॥१२॥
कई दीन फिरके मजहब, खेल फरिस्ते दम । ए खेल किया हुकमें देखने, सब पर एक हुकम ॥१३॥
भेख भाखा जातें जुदियां, ना तो सोई दम सोई देह । खैंचा-खैंच कर हुकमें, खेल बनाया एह ॥१४॥
एकों को हुकम हुआ, तिन लई राह मुस्लिम । पीछे जुदी जुदी जिनसों, ए सब खेलें खेल हुकम ॥१५॥
हुकमें करहीं बंदगी, हुकमें इस्क ले । हुकमें चोरी कर ल्यावहीं, हुकमें जाए सिर दे ॥१६॥
चले रहे सब हुकमें, बैठे सोवे हुकम । बिना हुकम रूह सबके, मुख ना निकसे दम ॥१७॥
करम काल सब हुकमें, बांधे खोले हुकम । भिस्त दोजख हुकमें, हुकमें देवे कदम ॥१८॥
दाना दिवाना हुकमें, हुकमें दोस निरदोस । दूर नजीक करे हुकमें, हुकमें अपना जोस ॥१९॥
हुकमें जोग जो लेवहीं, हुकमें देवे भोग । हुकमें रोग जो आवहीं, हुकमें देवे सोग ॥२०॥
लेवे देवे सब हुकमें, नेकी बदी हुकम । मरे मारे सब हुकमें, या चीजें या दम ॥२१॥
दुस्मन हुकमें सज्जन, सज्जन हुकमें वैर । खूंनी मेहेर सीधा उलटा, हुकमें मीठा जेहेर ॥२२॥
जिमी हद न छोड़हीं, ना हद छोड़े जल । रूत रंग सब हुकमें, होवे चल विचल ॥२३॥
वाओ बादल बीज गाजहीं, जिमी जल न समाए । पल में हुकम यों करे, पल में देवे उड़ाए ॥२४॥
जल को थल उलटावहीं, थल को उलटावे जल । कायर सूरे खाली भरे, सब में हुकम बल ॥२५॥
पात ना रेहेवे बन में, हुकमें फल फूल बास । हुकमें उजाला अंधेर, हुकमें अंधेर उजास ॥२६॥
ताता सीरा फिरे हुकमें, ससि सूर नखत्र । इन जुबां बल हुकम के, केते कहूं विचित्र ॥२७॥
सब पर हुकम हक का, कहे पुकार रसूल । जल थल चौदे तबकों, कोई जरा ना हुकमें भूल ॥२८॥
कई कोट इंड ऐसे पल में, करके पैदा उड़ाए । बल जरा इन हुकम का, इन जुबां कहयो न जाए ॥२९॥
सरूप रसूल हुकम, आगे खड़ा खसम । हुकमें देखाया रूहन को, बैठे देखें तले कदम ॥३०॥
इन हुकम की इसारतें, कई फरिस्ते उपजत । कई समावें सुन्य में, कई डारें ले गफलत ॥३१॥
जिन कहो अजाजील को, इनने फेरया हुकम । इन हुकम की इसारतें, हादी वास्ते करी खसम ॥३२॥
अजाजील भूल्या नहीं, पर हुकमें भुलाया ताए । ओ तो सिर ले हुकम, खड़ा है एक पाए ॥३३॥
तो पीछा फेरे हुकम, जो कोई दूसरा होए । हुकम सबों समझावहीं, हुकमें न समझे कोए ॥३४॥
नूरी फरिस्ता हुकमें, ले डारया उलटाए । ए मोमिनों खातिर हुकम, कई विध खेल बनाए ॥३५॥
पाँउ ना उठे हुकम बिना, मुख ना निकसे दम । दिल चितवन भी ना करे, फरिस्ता बिना हुकम ॥३६॥
तले खड़ा हुकम के, नाम जो नूरी जिन । माएने जाहेर ना किए, हुकमें एते दिन ॥३७॥
बुरका डाल अजाजील पर, हुकमें किया रद । सिजदा कराया आदम पर, जित मेंहेदी मोमिन महंमद ॥३८॥
बेसुध हुकमें करके, खेल कराया छल । ताए जो सिजदा करावहीं, पर हुकम बस अकल ॥३९॥
फरिस्ता कतरे नूर से, लानत दीनी ताए । सो मोमिन जाहेर करके, हुकमें सिजदा कराए ॥४०॥
जिन आदम में महंमद, हुकमें आए मोमिन । अजाजील अब हुकमें, पकड़ कदम हुआ रोसन ॥४१॥
हुकमें आवे लदुन्नी, हुकमें आवे किताब । सोई खोले हक हुकमें, जिन सिर दिया खिताब ॥४२॥
नफा नुकसान सब हुकमें, हुकमें भिस्त दोजख । झूठा सांच करे हुकमें, हुकम करे सबों हक ॥४३॥
हुकमें मोमिनों वास्ते, कई चीजें करी पैदाए । अर्स अरवाहें पेहेचान, कई विध हुकम कराए ॥४४॥
हुकमें मुसाफ इसारतें, करें मोमिनों पेहेचान । खोले बातून मोमिन हुकमें, याद आवे अर्स निसान ॥४५॥
ए खेल किया हुकमें, हुकमें आए रसूल । हुकमें मोमिन आए के, गए खेल में भूल ॥४६॥
आप हुकम आया इत, चलाया हुकम । हुकमें छलतें छोड़ाए के, जाहेर किए खोल इलम ॥४७॥
रूहों को खेल देखाइया, विध विध हुकम कर । आप बांध्या हुकम का, होए रसूल आया आखिर ॥४८॥
बांधे आप हुकम के, काजी हुए इत आए । कौल किया मोमिनोंसों, सो पाल्या खेल देखाए ॥४९॥
हुकमें सब जुदे जुदे, खेल किए विवेक । मोमिनों को देखाए के, आखिर किया दीन एक ॥५०॥
अबलों बेसुध हुकमें, खेली सकल जहान । तिनों सुध हुई हुकमें, यों खुली इसारते फुरमान ॥५१॥
अजाजील दम सबन में, लगी लानत दम तिन । लोक जाने लगी अजाजील को, वह तो हुकमें कही सबन ॥५२॥
पीछे हुकमें जाहेर करी, अबलीस सब दिलों पातसाह । हुआ सबों का दुस्मन, ना करने देत सिजदाए ॥५३॥
एही फौज दुनी अजाजील की, याही अकलें लगी लानत । पेहेचान हुई सब हुकमें, पीछे छूटी बखत कयामत ॥५४॥
असल आदम रसूल, कह्या सिजदा इन पर । चीन्हया न नबी को लानती, तो दुनी रही सिजदे बिगर ॥५५॥
हुकमें चिन्हाया रसूल, तब आया सबों आकीन । किया सबों ने सिजदा, जब हुकमें हुआ एक दीन ॥५६॥
लानत उतरी अजाजील से, सब कायम हुए तले नूर । हुई हैयाती सबों हुकमें, उग्या रोसन अर्स बका सूर ॥५७॥
हुकमें हम आए इत, लें हुकमें हक इलम । मैं खासा मोहोल खसम का, कर हुकम केहेलाया तुम ॥५८॥
जाहेर किया हुकमें, हुकमें किया हक । हुकमें लीन्ही अंदर, जुबां रही इत थक ॥५९॥
हुकम न आवे सब्द में, तो भी कह्या नेक सोए । अब केहेनी जुबां बदले, सो मेंहेदी बिना न होए ॥६०॥
अब लेने अर्स अजीम में, बोलसी जुबां इमाम । सो तो अपने आप को, केहेने हैं कलाम ॥६१॥
अब बातें अंदर की, पूछसी सब मोमिन । जाहेर देऊं निसानियां, ज्यों देखो अर्स वतन ॥६२॥
समझो एक इसारतें, ऐसा कर दें हम । तब फेर इत का पूछना, रहे उमेदां तुम ॥६३॥
जब समझे तब देखिया, याद जो आवे दिल । बीच खिलवत बातें हकपे, जो मांग्या तुम मिल ॥६४॥
याद आए आंखां खुलें, तब तुमें रहे उमेद । ज्यों मकसूद सब होवहीं, अब कहूं तिन भेद ॥६५॥
ए नेक रखी रात खैंच के, सो भी वास्ते तुम । ना तो लेते अंदर, केती बेर है हम ॥६६॥
॥ प्रकरण ॥३८॥ चौपाई ॥१४६६॥
