सनन्ध - प्रकरण ३९
सनंध नूर नूर-तजल्ला की
कह्या जाहेर रसूलें, मैं हरफ सुने हैं कान । सो आए केहेसी इमाम, मैं लिखे नहीं फुरमान ॥१॥
जो हरफ जुबां चढ़े नहीं, सो क्यों चढ़े कुरान । और जुबां ले आवसी, इमाम एही पेहेचान ॥२॥
बोलें न मेंहेंदी एक जुबां, जुबां बोलें कई लाख । आगे बिन जुबां बोलसी, बिन अंगों बिन भाख ॥३॥
खेल में मेंहेंदी तोतला, जुबां कजा ए ठौर । आगे तो नूर-तजल्ला, तहां जुबां बोल है और ॥४॥
खातिर मोमिन रसूलें, कई निसान लिखे प्यार कर । सो मैं ठौर ठौर हक बका, कर देऊं सब खबर ॥५॥
इमामें मोहे सब दियो, राख्यो न कछुए बीच । गुन अंग सोभा देय के, आप हुए नेहेचित ॥६॥
अब केहेनी आई असल की, नैन जुबां असल । बातें करूं असलू, असल की अकल ॥७॥
अब कहूं अर्स रूहन को, अर्स हक खिलवत बात । गोसे अपनी रूहोंसों, बैठ करूं अपन्यात ॥८॥
हक बातें तो इत सुनसी, पर हम जो करत गुजरान । पेहेले कहूं आगे नूर-तजल्ला, जो ले खड़ा हक फुरमान ॥९॥
आगे नूर फुरमान के, खड़ा हक नूर का नूर । जिन से पैदा मलायक, चुआ कतरा जिनों अंकूर ॥१०॥
अब नेक कहूं इन नूर की, इन नूर से पैदा नूर । पेहेले कहूं तिन नूर की, जित रूहें खेली मांहें जहूर ॥११॥
अब कहूं रास जहूर की, इन खेल से न्यारा इंड । सो नूर नजर ऐसा हुआ, नूर सारा ब्रह्मांड ॥१२॥
इत खेलत स्याम गोपियां, ए जो किया अर्स रूहों विलास । है ना कोई दूसरा, जो खेले मेहेबूब बिना रास ॥१३॥
ए हमारी अर्स न्यामतें, याके हमपे सहूर । कह्या कतरा नूर का, चुआ है अंकूर ॥१४॥
इत सब्द न पोहोंचे दुनी का, नेक इन की देऊं खबर । कायम हुआ साइत में, जो आया नूर नजर ॥१५॥
ए जो बात बका अर्स नूर की, सो केहेनी या जिमी मांहें । क्यों सुनसी दुनी इन कानों, जो कबहूं ना सुनी क्यांहें ॥१६॥
कोट हिस्से एक हरफ के, हिसाब किया मिहीं कर । एक हिस्सा न पोहोंच्या इन जिमी लग, ए मैं देख्या दिल धर ॥१७॥
एक जरा इन जिमी का, ताके नूर आगे सूर कोट । सो सूर न आवे नजरों, इन जिमी जरे की ओट ॥१८॥
सोने जवेर के बन कहूं, तो ए सब झूठी वस्त । सोभा जो नूर बन की, सो कही न जाए मुख हस्त ॥१९॥
जो कहूं रोसनी एक पात की, सो भी कही न जाए । कोट चांद जो सूर कहूं, तो एक पातै तले ढंपाए ॥२०॥
नूर ससि बन पसु पंखी, जिमी नूरै रेजा रेज । थिर चर नूर सबों मिने, सब चीजें नूर तेज ॥२१॥
वस्तर भूखन इन जिमी के, सो याही जिमी माफक । जिन जिमी जरे की रोसनी, कही न जाए रंचक ॥२२॥
सुख जो अर्स अरवाहों के, जो लिए जिमी इन । सो तुम देखो सहूर कर, कहे न जाए मुख किन ॥२३॥
जिन जिमी की ए रोसनी, ऐसे बाग के दरखत । तो इत सुख ऐसे ही चाहिए, अर्स बका की न्यामत ॥२४॥
ए जिमी बाग पांचों चीजें, ए जो पैदा किए नूर । एक पल लेहेरें कायम किए, नूर का ऐसा जहूर ॥२५॥
इत खेलत रूहें अर्स की, जो स्यामें उतारी किस्ती पर । सो रूहें पोहोंची इन बाग में, और तोफाने डूबे काफर ॥२६॥
ए नूह तोफान कह्या रसूलें, और गुझ रह्या रूहों रोसन । किस्ती पार उतारी सबों सुनी, सुध ना परी पोहोंची बाग किन ॥२७॥
बात बड़ी इन नूर की, ए तो नेक कह्यो प्रकास । इत खेलें रूहें हकसों, बिध बिध के विलास ॥२८॥
कहया जाए ना नूर इन बाग जिमी, हुआ सब रोसन भरपूर । जिन ऐसा रोसन किया पल में, सिफत क्यों कहूं असल नूर ॥२९॥
हद सब्द दुनी में रहया, पोहोंच्या नहीं नूर रास । तो क्यों पोंहोंचे असल नूर को, जिनकी ए पैदास ॥३०॥
बड़ी भिस्त भी याही से, जो कही कजा के मांहें । तिन भिस्त के नूर की, बात बड़ी है तांहें ॥३१॥
नूर रास भी बरन्यो ना गयो, तो भिस्त बरनन क्यों होए । बोहोत बड़ी तफावत, रास भिस्त इन दोए ॥३२॥
सोभा भिस्त जिमीय की, और सोभा भिस्त दरखत । पुरों पुरों नूरी बसें, ए क्यों होए खूबी सिफत ॥३३॥
सोभा भिस्त मोहोल मंदिरों, और सोभा नूरियों अंग । नूर असल अंग भेदिया, ए नाहीं नूर तरंग ॥३४॥
निबेरा भिस्त रास का, कहूं पावने रूहों हिसाब । भिस्त को सुख है जागते, रास को सुख है ख्वाब ॥३५॥
रास भिस्त या जो कछू, ए सब पैदा असल नूर । तिन असल नूर की क्यों कहूं, जो द्वार आगूं हजूर ॥३६॥
ए जो नूर मकान आगूं अर्स के, नूर बका असल । ए रूहें असलू कानो सुनियो, असल तनों के दिल ॥३७॥
ए असल नूर मकान की, ए नूर सागर साबित । देखे नूर के तरंग, रास भिस्त कही तित ॥३८॥
नूर लेहेरें दायम उठें, पाउ पल में बिना हिसाब । कोई लेहेर कायम करे, कई उड़ावें कर ख्वाब ॥३९॥
नूर मकान जिमी असल, असल बन चौफेर । पसु पंखी असल, खेलत घेरों घेर ॥४०॥
नूर जिमी बन नूर जल, आकास वाए सब नूर । नूर पसु पंखी द्वारने, नूर सब ससि सूर ॥४१॥
एक पात ना खिरे बन का, ना गिरे पंखी का पर । नया पुराना न होवहीं, जंगल या जानवर ॥४२॥
दरबार मोहोल नूर सबे, सब नूरै नूर विस्तार । ए नूर कहूं मैं कहां लग, कहूं याको वार न पार सुमार ॥४३॥
ए सब नूर एक होए रह्या, रोसनी न काहूं पकराए । बिना नूर कछू ना देखिए, रह्या बाहेर मांहें भराए ॥४४॥
रास भिस्त लेहेरें कही, कही नूर मकान की बिध । आगे तो नूर तजल्ला, सो ए देऊं नेक सुध ॥४५॥
जहां पर जले जबराईल, इत थें आगे न सके चल । दरगाह अर्स अजीम की, हक हादी रूहें असल ॥४६॥
अब नूर कहूं अंदर का, नूर मोहोल मंदिरों नहीं पार । एही भूल है अपनी, सोभा ल्याइए मांहें सुमार ॥४७॥
नूरजमाल अंग का नूर जो, बड़ी रूह रूहों सिरदार । बड़ी रूह के अंग का नूर जो, रूहें बुजरक बारें हजार ॥४८॥
सुख जो अर्स अजीम के, सो होए नहीं मजकूर । ए अर्स तन से बोलत, मांहें खिलवत हक हजूर ॥४९॥
जो रूह होवे अर्स की, सो सुनियो अर्स तन कान । अर्स अकलें विचारियो, मैं केहेती हों अर्स जुबान ॥५०॥
हम रूहें हमेसा बका मिने, रूह अल्ला के तन । असल तन हमारे अर्स में, और कछू न जानें हक बिन ॥५१॥
हम सब में इस्क हक का, ऊपर बरसे हक का नूर । हम हमेसा हक खिलवतें, हम सब हक हजूर ॥५२॥
पेहेले कह्या नूर मकान जो, सो नूर मांहें वाहेदत । हक हादी रूहें खिलवत, ए वाहेदत सब निसबत ॥५३॥
बाग जिमी जो अर्स की, और पसु जानवर । कहा कहूं सुख साहेबी, जिन पर हक नजर ॥५४॥
और जरा न हक बका बिना, खेल सदा होत नूर से । एक पल में कई पैदा करे, इंड उड़ावे पल में ॥५५॥
हम रूहें खेल जानें नहीं, जो नूर से उपजत । ओ खेले अरवा गफलत में, ऊपर भी गफलत ॥५६॥
हम जानें इस्क बड़ा हमपे, बड़ी रूह और हक से । बड़ी रूह जाने सब से, बड़ा इस्क है हम में ॥५७॥
हकें कह्या हादी रूहन से, तुम नहीं मेरे माफक । तुम तेहेकीक मेरे मासूक, मैं तुमारा आसिक ॥५८॥
होत हांसी हमेसा, सब बड़ा जाने अपना प्यार । ए बेवरा वाहेदत में होए नहीं, जित नाहीं जुदागी लगार ॥५९॥
तब हकें कह्या फरामोस का, खेल देखावें हम । मैं जुदे भी तुमें ना करूं, देखाऊं तले कदम ॥६०॥
हकें हुकम किया दिल पर, तब खेल मांग्या हम एह । तब हमको खेल देखाइया, खेल हुआ नूर का जेह ॥६१॥
तो खेल हम देखिया, ना तो कैसा खेल कौन हम । क्यों उतरें रूहें अर्स से, छोड़ के एह कदम ॥६२॥
खेल हुआ हम वास्ते, हम पर हादी ल्याए फुरमान । हम वास्ते कुंजी रूहअल्ला, दई इमाम हाथ पेहेचान ॥६३॥
ए तीनों सूरत हादीय की, आई जुदी जुदी हम कारन । आखिर खेल देखाए के, सब समझाई रूहन ॥६४॥
अर्स हक की लज्जत, दई खेल में हम को । हक साहेबी हक इस्क, हमारे लाड़ पाले कुंजीसों ॥६५॥
हम बैठे देख्या वतन में, हकें ऐसी करी हिकमत । आए न गए हादी हम, ऐसा देख्या मांहें खिलवत ॥६६॥
हक न्यामत मैं देत हों, जो होसी अर्स अरवाए । ए सुनते निसानियां अर्स की, लगसी कलेजे घाए ॥६७॥
पेहेचान हक अर्स रूहन की, ए केहेते आवसी इस्क । ए सुन रूहें ना सेहे सकें, बिछोहा अर्स हक ॥६८॥
हम उतरें चढ़ें तो खेल में, जो जरा दूसरा होए । ए देखो हक इलम से, अर्स अरवा न उरझे कोए ॥६९॥
हकें दिया इलम अपना, तिनका तो हकै से काम । और हम को क्या हक बिना, रात दिन लेना क्यों आराम ॥७०॥
हम खेल देख्या लग मुद्दत, जेते रूहअल्ला के तन । खेल देख पीछे फिरें, जानें बेर न लगी अधखिन ॥७१॥
ए देख्या बैठे वतन में, हक सुख लिए हम इत । सो इन देह इन जिमिऐें, लिए सुख हक निसबत ॥७२॥
फेर फेर हक वाहेदत, फेर फेर हक खिलवत । फेर फेर सुख निसबत के, फेर फेर ए लई न्यामत ॥७३॥
महामत कहें मोमिन की, मिट गई दुनियां चाल । देखिए हक दिल अर्स में, तो अबहीं बदले हाल ॥७४॥
॥ प्रकरण ॥३९॥ चौपाई ॥१५४०॥
