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विषय-सूची

सनन्ध - प्रकरण ४

सनंध इमाम के स्वाल जवाब की

सुनियो बानी मोमिनो, हुती जो अगम अकथ । सो बीतक कहूं तुमको, उड़ जासी गफलत ॥१॥

हुकम हुआ इमाम का, उदया मूल अंकूर । कलस होत सबन का, नूर पर नूर सिर नूर ॥२॥

कथियल तो कही सुनी, पर अकथ न एते दिन । सो तो अब जाहेर हुई, जो मेंहेंदी महंमद थें उतपन ॥३॥

मुझे मेहेर मेहेबूबे करी, अंदर परदा खोल । सो सुख निसबतियन सों, कहूं सो दो एक बोल ॥४॥

मासूकें मोहे मिल के, करी सो दिल दे गुझ । कहे तूं दे पड़ उत्तर, जो मैं पूछत हों तुझ ॥५॥

तूं कौन आई इत क्यों कर, कहां है तेरा वतन । नार तूं कौन खसम की, दृढ़ कर कहो वचन ॥६॥

तूं जागत है के नींद में, करके देख विचार । बिध सारी याकी कहे, इन जिमी के प्रकार ॥७॥

तब मैं पियासों यों कह्या, जो तुम पूछी बात । मैं मेरी मत माफक, कहूंगी तैसी भांत ॥८॥

सुनो पिया अब मैं कहूं, तुम पूछी सुध मंडल । ए कहूं मैं क्यों कर, छल बल वल अकल ॥९॥

मैं ना पेहेचानों आपको, ना सुध अपनों घर । पिउ पेहेचान भी नींद में, मैं जागत हों या पर ॥१०॥

जल जिमी तेज वाए को, अवकास कियो है इंड । चौदे तबक चारों तरफों, प्रपंच खड़ा प्रचंड ॥११॥

ए मोहोल रच्यो जो मंडप, सो अटक रह्यो अंत्रीख । कर कर फिकर कई थके, पर पाई न काहूं रीत ॥१२॥

यामें खेल कई होवहीं, सो केते कहूं विचित्र । तिमर तेज रूत रंग फिरे, ससि सूर फिरे नखत्र ॥१३॥

तबक चौदे इंड में, जिमी जोजन कोट पचास । साढ़े तीन कोट ता बीच में, होत अंधेरी उजास ॥१४॥

उजास सूर को कहावहीं, सो तो अंधेरी के तिमर । तिनथें कछू ना सूझहीं, जिमी आप ना घर ॥१५॥

जब थें सूरज देखिए, लेत अंधेरी घेर । जीव पसु पंखी आदमी, सब फिरें याके फेर ॥१६॥

काल न देखे इन फेरे, याही तिमर के फंद । ए सूरज आंखों देखिए, पर इन फंद के बंध ॥१७॥

वाओ बादल बीज गाजहीं, जिमी जल न समाए । ए पांचों आप देखाए के, फेर न पैदा हो जाए ॥१८॥

या बिध अनेक ब्रह्मांड में, देत देखाई दसो दिस । ए मोहजल लेहेरां लेवही, सागर सबे एक रस ॥१९॥

ए कोहेड़ा काली रैन का, कोई न पावे कल मूल । कहां कल किल्ली कुलफ, जो द्वार न पाइए सूल ॥२०॥

ए तीनों लोक तिमर के, लिए जो तिनहूं घेर । ए निरखे मैं नीके कर, पर पाइए न काहूं सेर ॥२१॥

ए अंधेरी इन भांत की, काहूं सांध ना सूझे सल । ए सुध काहूं ना परी, कई गए कर कर बल ॥२२॥

ग्यान लिया कर दीपक, अंधेर आप ना गम । इत दीपक उजाला क्या करे, ए तो चौदे तबकों तम ॥२३॥

ए देखे ही परिए दुख में, कोई व्याध को रचियो रोग । छुटकायो छूटे नहीं, नहीं न देखन जोग ॥२४॥

टेढ़ी सकड़ी गलियां, तामें फिरे फेर फेर । गुन पख अंग इंद्रियों, कियो अंधेरी में अंधेर ॥२५॥

तत्व पांचों जो देखिए, तो यामें ना कोई थिर । प्रले होसी पलमें, वैराट सचराचर ॥२६॥

ए उपजे पांचो मोह थें, और मोह को तो नाहीं पार । नेत नेत केहे निगम फिरे, आगे सुध ना परी निराकार ॥२७॥

मूल बिना ए मंडल, नहीं नेहेचल निरधार । निकसन कोई न पावहीं, वार न काहूं पार ॥२८॥

इत पंथ पैंडे कई चलहीं, कई भेख दरसन । ता बीच अंधेरी ग्यान की, पावे न कोई निकसन ॥२९॥

ग्यान संग स्थानप मिली, तित क्यों कर आवे दरद । ना आपे ना दरद किनें, सो होए जाए सब गरद ॥३०॥

दरदी दरदा जानहीं, ग्यानी जाने ग्यान । ए राह दोऊ जुदी परी, मिले ना काहू तान ॥३१॥

दिवाना मूरख मिले, स्यानप मिले सैतान । दरद ग्यान दोऊ जुदे, मिले न पिंड पेहेचान ॥३२॥

कबूं मूढ़ दरदे मिले, पर दरद ना कबूं सैतान । बीज अंकूर दोऊ जुदे, वैर सदाई जान ॥३३॥

ग्याने प्यारी स्यानप, दरदे सेती वैर । दरदें प्यारी दिवानगी, स्यानप लगे जेहेर ॥३४॥

इत जुध किए कई सूरमों, पेहेन टोप सिल्हे पाखर । वचन बड़े रण बोलके, उलट पड़े आखिर ॥३५॥

यामें ज्यों ज्यों खोजिए, त्यों त्यों बंध पड़ते जाए । कई उदम जो करहीं, तो भी तिमर ना छोड़े ताए ॥३६॥

ए सुध अजूं किन ना परी, बढ़त जात विवाद । खेल तो है एक खिन का, पर ए जाने सदा अनाद ॥३७॥

खेल खावंद जो त्रैगुन, जानों याथें जासी फेर । ए निरखे मैं नीके कर, अजूं ए भी मिने अंधेर ॥३८॥

ए द्वार कोई खोलके, कबहूं न निकस्या कोए । ए बुजरक जो छल के, बैठे देखे बेसुध होए ॥३९॥

ए जिन बांधे सो खोलहीं, तोलों ना छूटे बंध । या बिध खेल खावंद की, तो औरों कहा सनंध ॥४०॥

निज बुध आवे हुकमें, तोलों ना छूटे मोह । आतम तो अंधेर में, सो बुध बिना बल ना होए ॥४१॥

ए तो कही इन इंड की, पिया पूछ्यो जो प्रश्न । कहूं और अजूं बोहोत है, वे भी सुनो वचन ॥४२॥

॥ प्रकरण ॥४॥ चौपाई ॥७७॥

इसी सन्दर्भ में देखें-