सनन्ध - प्रकरण ४०
सनंध खंडनी जाहेरियों की
लिख्या है कतेब में, पाया न किन ठौर । ना फरिस्तों ना नबियों, तो क्यों पावे कोई और ॥१॥
लिख्या जो रसूल ने, तिन तो कह्या अगम । तबक चौदे ख्वाब के, न्यारा रह्या खसम ॥२॥
खुद तो किन को ना मिल्या, अब काजी कजा चलाए । कहें जो चाहे खुद को, हम मिलावें ताए ॥३॥
पढ़े मुल्लाँ आगूं हुए, सो तो खाए गुमान । लोकों को बतावहीं, कहें हम पढ़े कुरान ॥४॥
दुनी बदले दीन खोवहीं, चलें सो उलटी रीत । सुपने के सुख कारने, लोभें किए फजीत ॥५॥
राह बतावें दुनी को, कहें ए नबिएँ कहेल । लिख्या और फुरमान में, ए खेलें औरै खेल ॥६॥
ए जो मोहोरे खेल के, धरें भेख विवाद । एक भान दूजा धरें, कहें हमें होत सवाब ॥७॥
ओ राजी एक भेख में, ताए मार छुड़ावें दाब । ओ रोवे सिर पीटहीं, ए कहें हमें होत सवाब ॥८॥
एक खाई ग्रहतें काढ़के, ले डारें दूजी खाड़ । ज़ब्हे करें जोरावरी, कहें हमें होत सवाब ॥९॥
हिंदू मुए जलावहीं, और ए आए तिन गाड़ । मिल तिन की जारत करें, कहें हमें होत सवाब ॥१०॥
मार डार पछाड़हीं, ओ रोए पीट होवे ताब । इन विध जातां बदलें, कहें हमें होत सवाब ॥११॥
जैसे मछ गलागल, ना किनकी मरजाद । यों खैंच लेवें आप में, कहें हमें होत सवाब ॥१२॥
करें जुलम गरीब पर, कोई न काहूं फरियाद । कर सुंनत गोस्त खिलावहीं, कहें हमें होत सवाब ॥१३॥
कोई जालिम जीव जनम का, खुराकी गोस्त सराब । तिनको लेवें दीन में, कहें हमें होत सवाब ॥१४॥
सिरोपाव दे गज चढ़ावहीं, ओ जाने हुआ खराब । ए बजाए बाजे कूदहीं, कहें हमें होत सवाब ॥१५॥
काफर को मुस्लिम करें, मिनें लेवें दीन हिसाब । सिर मूढ़ दाढ़ी रखें, कहें हमें होत सवाब ॥१६॥
खाना खिलावें आप में, देखलावें मसीत मेहेराब । लेकर कलमा पढ़ावहीं, कहें हमें होत सवाब ॥१७॥
चित दे एक चुनावहीं, हिंदू जो आद के आद । सो जोरा करके ढ़हावहीं, कहें हमें होत सवाब ॥१८॥
हिंदू मसीताँ ढ़हावहीं, मुसलमान सों वाद । दें सोभा इष्ट दीन को, कहें हमें होत सवाब ॥१९॥
सुध इष्ट ना दीन की, मोह माते उनमाद । ज्यों ज्यों वैर बढ़ावहीं, कहें हमें होत सवाब ॥२०॥
गरक हुए मोह गुमानमें, जनम गमावत वाद । या बिध खैंचें आप में, कहें हमें होत सवाब ॥२१॥
यों पढ़े राह बतावहीं, खेलें मिने ख्वाब । जाहेर जुलम होवहीं, कहें हमें होत सवाब ॥२२॥
पर सवाब तो तिन को होवहीं, छोटा बड़ा सब जिउ । एकै नजरों देखहीं, सब का खावंद पिउ ॥२३॥
जो दुख देवे किनको, सो नाहीं मुसलमान । नबिऐं मुसलमान का, नाम धरया मेहेरबान ॥२४॥
कोई बूझे ना इसलाम को, ना लगें नबी के बान । ना सुध सल्ली ना बंदगी, कहें हम मुसलमान ॥२५॥
कौन दीन क्यों चलना, और क्यों रेहेनी फुरमान । क्यों अंतर मांहें बाहेर, कहें हम मुसलमान ॥२६॥
ना सुध उजू निमाज की, ना रोजे रमजान । ना तसबी ना नाम की, कहें हम मुसलमान ॥२७॥
सुध नहीं दिल साफ की, ना कछू सब्द पेहेचान । ना सुध छल ना वतन, कहें हम मुसलमान ॥२८॥
मैं कौन आया किन ठौर से, कहा देखत हों जहान । कौन नबी भेज्या किने, कहें हम मुसलमान ॥२९॥
हक को कबूं ना याद करें, हुए नहीं गलतान । खुद कबूं ना सुपने, कहें हम मुसलमान ॥३०॥
ए तो आग है जलती, ताए लई सुख मान । देखाए भी अंधे न देखहीं, कहें हम मुसलमान ॥३१॥
बाहेर के देखावहीं, अंदर आंख न कान । सो कहा सुने कहा देखसी, कहें हम मुसलमान ॥३२॥
विध भी देखावें बाहेर की, सुध नहीं वृध हान । ना पेहेचान जो रूह की, कहें हम मुसलमान ॥३३॥
गुन ना देखें काहू को, अवगुन लेवें सिरतान । आप पड़े बस इंद्रियों, कहें हम मुसलमान ॥३४॥
जुलम करें कई जालिम, मूंदी आँखें गुमान । खून करते ना डरें, कहें हम मुसलमान ॥३५॥
नीयत ना नीकी कबहूं, जनम दगाई जान । निस दिन चाहें छल को, कहें हम मुसलमान ॥३६॥
मने उड़ाए तूल ज्यों, न पावें ठौर ठेहेरान । सो सारे गफलतें फिरें, कहें हम मुसलमान ॥३७॥
ले गरब खड़े होवहीं, जाने हम ही मेर समान । ना सुध भारी हलके, कहें हम मुसलमान ॥३८॥
कहे अंग तो काम क्रोध के, गोस्त खान मद पान । हक हराम न जानहीं, कहें हम मुसलमान ॥३९॥
सुपेत हुए स्याही गई, स्याही अंदर बढ़ती जान । काट गला लोहू पीवहीं, कहें हम मुसलमान ॥४०॥
दुख ना देखें और को, ऐसे हिरदे निपट पाखान । दुख देते ना सकुचें, कहें हम मुसलमान ॥४१॥
ब्राह्मण कहें हम उत्तम, मुसलमान कहें हम पाक । दोऊ मुठी एक ठौर की, एक राख दूजी खाक ॥४२॥
कुफर न काढ़ें आपको, और देखें सब कुफरान । अपना अवगुन ना देखहीं, कहें हम मुसलमान ॥४३॥
ज्यों सुपनें में मनुआ, आप भाव सब ठौर । तरंग जैसा आप में, सोई देखे मिने और ॥४४॥
बदी न छोड़ें एक पल, डर न रखें सुभान । फैल करें चित चाहते, कहें हम मुसलमान ॥४५॥
ना परतीत जो और की, यों पढ़े काजी कुरान । राह बतावें और को, कहें हम मुसलमान ॥४६॥
हिरदे फूटे ऐसे बेसुध, एता भी न रहे याद । खुद काजी आखिर होएसी, तब देसी कहा जवाब ॥४७॥
कलाम अल्ला काजी पढ़े, पर होत नहीं आकीन । कैसा डर कौन आवहीं, तो हलका किया दीन ॥४८॥
तिनों तो सस्ता किया, जिनों नहीं भरोसा निदान । या विध आपे अपना, हलका करें कुरान ॥४९॥
महामत केहेवे यों कर, ए पढ़े बड़े कुफर । बातून नजर इन को नहीं, तो कजा की न हुई खबर ॥५०॥
॥ प्रकरण ॥४०॥ चौपाई ॥१५९०॥
