सनन्ध - प्रकरण ४१
सनंध - पत्री बड़ी
तुमको देऊँ सुख जागनी, साथजी मेरे आधार । भेख धरे जो वासना, छोटे बड़े नर नार ॥१॥
सुनियो भीम मकुंदजी, ऊद्धव केसो स्याम । हम पाती पढ़ी महंमद की, सब पाई हकीकत धाम ॥२॥
अपने घर की इसारतें, और न समझे कोए । और कोई तो समझे, जो कोई दूसरा होए ॥३॥
वतन की बातें सबे, पाई हमारी हम । सो ए रोसन करत हों, कहियो साथ को तुम ॥४॥
किया बरनन श्री धाम का, कई विध लिखे निसान । साथ को सुख उपजावने, ठौर ठौर किए बयान ॥५॥
जमुना जरी किनार पर, कई दयोहरियाँ तलाब । भांत भांत रंग झलकत, यों कई जवेर जड़ाव ॥६॥
नीर उजले खीर से, खुसबोए जिमी रेत सेत । पसु कई विध खेलहीं, यों कागद निसानी देत ॥७॥
सबज बन कई रंग के, जवेर कई झलकत । सैयां बरनन इसारतें, कई पंखी मिने घूमत ॥८॥
कह्या मैं तारतम तुमको, मूल वचन जिन पर । सो सारे इनमें लिखे, निसान अपने घर ॥९॥
ऊपर से तले आए के, सब बैठियाँ खेल देखन । भेली रूह भगवान की, हुकम हुआ सबन ॥१०॥
हुई रात सबन को, तिन फेरे खेल में मन । सोई रात सोई साइत, पर भूल गैयाँ वह दिन ॥११॥
तीन तकरार कहे रात के, तिन तीनों के बयान । बृज रास और जागनी, ए कई विध लिखे निसान ॥१२॥
फुरमान उसी साइत का, पिया भेज्या हम पर । सारी विध सोई लिखी, जो कही बाई सुन्दर ॥१३॥
धाम रास और बृज की, कही सुन्दरबाईऐं जेह । ए तो कागद नेक देखिया, देत साख सब एह ॥१४॥
काल माया जोग माया, तीसरी लीला जागन । सुन्दरबाईऐं ना कहे, ए आगम के वचन ॥१५॥
सुन्दरबाईऐं देखिया, दिल के दीदों मांहें । बृज रास और धाम की, पर जागनी की सुध नांहें ॥१६॥
और सुख कई विध के, कई विध किए प्यार । सुन्दरबाई के संगतें, कई औरों पाए दीदार ॥१७॥
अंतरगत आरोगते, तीन बेर पिया आऐं । आप भी मेवे मिठाइयाँ, कई हम को आन खिलाऐं ॥१८॥
विध विध के सुख और कई, देत दायम अनेक । पर लीला जो जागन की, कदी वचन न पाया एक ॥१९॥
लरी सुन्दरबाई पिउसों, इन आगम के कारन । पर पाया नहीं पड़ उत्तर, एक आधा भी सुकन ॥२०॥
इन पड़ उत्तर वास्ते, बाईजीऐं किए उपाए । विलख विलख वचन लिखे, सो ले ले रूहें पोहोंचाए ॥२१॥
यों उनहत्तर पातियां, लिखियां धाम धनी पर । तब सैयां हम भी लिखी, पर नेक न दई खबर ॥२२॥
सो सुध सारी ल्याइया, लीला आगूं से निसान । जागनी की सुध सब लिखी, तुम लीजो साथ चित आन ॥२३॥
अव्वल मध और आखिर, यामें तीनों की हकीकत । पर ए पावें एक इमाम, जित हुकम नूर महामत ॥२४॥
ज्यों आया नूर तारतम, श्री देवचंदजी के पास । सो विध सब इनमें लिखी, ज्यों कर हुआ प्रकास ॥२५॥
फुरमान ल्याए महंमद, सब लिखी हमारी बात । जरा एक ना घट बढ़, सब अंग निसानी जात ॥२६॥
श्री देवचंदजी सों जुध किया, कुली दज्जाल जिन पर । ईसा दो जामें पेहेरसी, सो लिखी सारी खबर ॥२७॥
श्री देवचंदजी सों हम मिले, मुझ अंग हुआ रोसन । सो बातें सब इनमें लिखी, निसान नाम सोई दिन ॥२८॥
बोहोत बातें कई और हैं, सो केते लिखों निसान । साथ हम तुम मिलके, हँस हँस करसी बयान ॥२९॥
कई विध की निसानियां, जिन विध हुई जागन । हँसते हरखे जागसी, सुख देसी सब सैयन ॥३०॥
बाल लीला और किसोर, तीसरी बुढ़ापन । तीन अवस्था तीन ब्रह्मांड, देखाए मिने एक खिन ॥३१॥
बाबा बूढा होए खेलावसी, दे मन चाह्या सुख सब । तीन अवस्था एक साइत में, देखाए के हँससी अब ॥३२॥
तीन ठौर लीला करी, देखाए तीन ब्रह्मांड । सो तीनों एक पलमें, देखाए के उड़ावसी इंड ॥३३॥
खेले एकै रात में, बृज रास जागन । बेर साइत भी ना हुई, यों होसी सब सैयन ॥३४॥
बीच ब्रह्मांड ना जुग कोई, बरस मास ना दिन । खिन में सब देखाए के, दोए साखें करी जागन ॥३५॥
दाना एक खस खस का, तामें देखाए चौदे भवन । सो दाना फेर होएसी, तुम देखोगे सब जन ॥३६॥
पट कर बड़ा देखाइया, चौदे तबक बनाए । तुम पर हाँसी करके, देसी पट उड़ाए ॥३७॥
ज्यों ज्यों होसी जागनी, त्यों त्यों उड़सी एह । देखोगे सब नजरों, पिया हाँसी करी है जेह ॥३८॥
पियाजीएँ कई हाँसी करी, सो लिखी मिने किताब । जब सैयां सबे मिली, तब होसी बिना हिसाब ॥३९॥
और भी कहूं सो सुनो, जाहेर महंमद बात । और सबे उड़ाए के, एक रखी कदर की रात ॥४०॥
सब रोसनाई इनमें, सांची कहियत हैं जेह । उतरी है पिया पास थें, रात नूर भरी है एह ॥४१॥
वतन थें पिउ प्यारियां, आइयां सबे मिल । इसी रात के बीच में, करने को सैल ॥४२॥
पिया भेजे मलायक, रखोपे रूहों कारन । सो संग अंदर रेहेवहीं, करत सदा रोसन ॥४३॥
तबक चौदे इन में, जिमी और आसमान । रात बड़ी कदर की, कोई नाहीं इन समान ॥४४॥
फिरत चिरागां इन में, एक चांद दूजा सूर । ए तो सोर सेहेरन का, नहीं रोसन वतनी नूर ॥४५॥
रसूलें ए जाहेर कहया, दिन रोसन पिया वतन । और अंधेर सब दज्जाल, जो गोविंद भेड़ा फितन ॥४६॥
नींद को रात कदर कही, दुनी ढूंढ़ें खेल में रात । कहे जो आजूज माजूज, ए तिन में गोते खात ॥४७॥
दरिया रूप अंधेरी, आदम रूप दज्जाल । एही सरूप कुलीय का, वैर विखे लानती चाल ॥४८॥
आदम रूप वैराट, अनेक विध खेलत । झूठ कुफर कुली पसरया, सब सचराचर पसु मत ॥४९॥
सुन्दरबाइऐं याको कह्या, गोविंद भेड़ा मंडल । सोई कलजुग दज्जाल, व्याप रह्या सकल ॥५०॥
खेल कह्या है नींद का, सब खेलें बीच अंधेर । ए जो आइयां खेल देखने, ताए खैंच लिया दिल फेर ॥५१॥
जंग किया सैयां तिनसों, जो आगे कछुए नांहें । ए भी कहें ओ ना कछू, पर उरझ रहियां तिन मांहें ॥५२॥
लई लड़ाई सैयां तिनसों, जाए पड़ियां बंध । ना रस्सी ना बांधे जिने, पर छूट ना सके कोई फंद ॥५३॥
जुदी जातें भाँतें जुदी, खड़ियां जुदे भेख धर । जानत नीके झूठ है, तो भी पकड़ रहियां सत कर ॥५४॥
जुदे जुदे नाम खसम के, एक नारी दूजे नर । खुद खसम को भूल के, खेल में बैठियां सत कर ॥५५॥
पिया खजाना खरच के, आए बंध से लैयां छुड़ाए । अब सो करें मेहेमांनियां, बस्तर भूखन पेहेराए ॥५६॥
कई भोजन मेवे मिठाइयां, तकिए सेज जवेर । सेवक सेवा दुनियां, करसी ब्याह सुंदर ॥५७॥
यामें कई विध हाँसियां, पियाजी लिखी चित ल्याए । सो आप मिने बैठ के, हंससी साथ मिलाए ॥५८॥
वैराट सब पुकारहीं, सो भी इनमें लिखे सब्द । कई विध लीला जागनी, पर भली गाई महंमद ॥५९॥
याही लीला सब कोई, गावत गुझ अगम । गरजसी वैराट में, हुए जाहेर सैयां हम ॥६०॥
वैराट सारा गाएसी, नर नारी चित ल्याए । पर गावना सुन महंमद का, रेहेसी सबे अचंभाए ॥६१॥
महंमद बातें बोहोत हैं, सो केती लिखूं तुम । ए बातें तब होएसी, जब मिलसी हम तुम ॥६२॥
महंमद कहे मैं हुकमें, सब रूहें मुझ मांहें । मैं चल्या अर्स मेयराज को, पर पोहोंच सक्या नांहें ॥६३॥
मैं ल्याया धनीय की, इसारतें जिन खातिर । सो ताला अजूं खुल्या नहीं, तो मैं पोहोंचों क्यों कर ॥६४॥
ताला द्वार कजाए का, आए खोलसी जब । कयामत रोसन करके, मिल भेले चलसी सब ॥६५॥
बाईजीएँ घर चलते, जाहेर कहे वचन । आड़ी खड़ी इन्द्रावती, है इनके हाथ जागन ॥६६॥
जुदी हम से भगवान की, रूह फिरी एक सोए । जब फिरे सुनसी हम को, तब घरों आवसी रोए ॥६७॥
ए जो भिस्त हमों करी, फेर एही भानसी दुख । बुध असराफील पोहोंचहीं, तब ताए भी देसी सुख ॥६८॥
रूहअल्ला ईसा मसी, नूर नाम तारतम । मूल बुध असराफील, ए हमारी मिने हम ॥६९॥
काजी कजा ऐसी करी, रही ना किसी की हाम । हुआ महंमद खिताब मेंहेदी, मिल्या मिने इमाम ॥७०॥
जबराईल पिया हुकमें, रूहों करत रखोपा आए । सोई सूरत है अपनी, पिया हुकमें लेत मिलाए ॥७१॥
जुदे जुदे नामें गावहीं, जुदे जुदे भेख अनेक । जिन कोई झगड़ो आप में, धनी सबों का एक ॥७२॥
अब सुनो प्यारे साथजी, पिया प्रगट होत सबन । सारों को सुख देय के, उड़ावत एह सुपन ॥७३॥
वैराट चौदे तबक, करके नूर नजर । कायम दिए सुख मन बंछे, ब्रह्मांड सचराचर ॥७४॥
॥ प्रकरण ॥४१॥ चौपाई ॥१६६४॥
