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विषय-सूची

सनन्ध - प्रकरण ५

सनंध खोज की

पिया मैं विध विध तोको ढूंढ़िया, छोड़ धंधा सब और । पूछत फिरों सोहागनी, कोई बतावे पिया ठौर ॥१॥

मैं नेक बात याकी कहूं, तुम कारन खोज्या खेल । कोई ना कहे हम देखिया, जिन नीके कर खोजेल ॥२॥

सास्त्र साधू जो साखियां, मैं देखी सबन की मत । जोलों साहेब ना पाइए, तोलों कीजे कासों हेत ॥३॥

छोटे बड़े जिन खोजिया, न पाया करतार । संसा सब कोई ले चल्या, पर छूटा नहीं विकार ॥४॥

ए झूठा छल कठन, कांहूं न किसी की गम । कहां वतन कहां खसम, कौन जिमी कौन हम ॥५॥

ए देखी बाजी छल की, छल की तो उलटी रीत । इनमें सीधा दौड़ के, कोई ना निकस्या जीत ॥६॥

मैं देख्या दिल विचार के, चितसों अर्थ लगाए । इस मंडल में आतमा, चल्या न कोई जगाए ॥७॥

मेहेनत तो बोहोतों करी, अहनिस खोज विचार । तिन भी छल छूटा नहीं, गए हाथ पटक सिर मार ॥८॥

मोहादिक के आद लों, जेती उपजी सृष्ट । तिन सारों ने यों कह्या, जो किनहूं न देख्या दृष्ट ॥९॥

वरना वरनो खोजिया, जेती बनिआदम । एता दृढ़ किने ना किया, कहां खसम कौन हम ॥१०॥

आद मध्य और अबलों, सब बोले या विध । केवल विदेही होए गए, तिन भी न कही ए सुध ॥११॥

वेदों कथ कथ यों कथ्या, सब मिथ्या चौदे लोक । बकते बकते यों बके, एक अनेक सब फोक ॥१२॥

बुध तुरिया दृष्ट श्रवना, जहां लों पोहोंचे मन । ए होसी उतपन सब फना, जो आवे मिने वचन ॥१३॥

वेदांती भी केहे थके, द्वैत खोजी पर पर । अद्वैत सब्द जो बोलिए, तो सिर पड़े उतर ॥१४॥

मन चित्त बुध श्रवना, पोहोंचे दृष्ट न सब्दा कोए । खट प्रमान ते रहित है, सो दृढ़ कैसे होए ॥१५॥

द्वैत आड़े अद्वैत के, सब द्वैतै को विस्तार । छोड़ द्वैत आगे वचन, किने ना कियो निरधार ॥१६॥

ए अलख किने ना लखी, आदै थें अवल । ऐसी निराकार निरंजन, व्याप रही सकल ॥१७॥

चेतन व्यापी व्याप में, सो फेर आवे जाए । जड़ को चेतन ए करे, चेतन को मुरछाए ॥१८॥

ऊपर तले मांहें बाहेर दसो दिसा सब एह । छोड़ याको कोई ना कहे, ठौर खसम का जेह ॥१९॥

जो कछू कहिए वचने, सो सब मिने गफलत । ना सरूप ना काहू वतन, तो क्यों कर जाइए तित ॥२०॥

पेड़ काली किन ना देखी, सब छाया ही में रहे उरझाए । गम छाया की भी ना पड़ी, तो पेड़ पार क्यों लखाए ॥२१॥

जाए ना उलंघी देखीती, ना कछु होए पेहेचान । तो दुलहा कैसे पाइए, जाको नेक ना सुन्यो निसान ॥२२॥

खसम जो न्यारा द्वैत से, और ठौरों सब द्वैत । किने ना कह्यो ठौर नेहेचल, तो पाइए कैसी रीत ॥२३॥

या विध ग्यान जो चरचहीं, सो मैं देख्या चित ल्याए । ज्यों मनुआं सुपने मिने, बेसुध गोते खाए ॥२४॥

खिनमें कहे सब ब्रह्म है, खिनमें बंझा पूत । मदमाते मरकट ज्यों, करे सो अनेक रूप ॥२५॥

खिनमें कहे सत असत, माया कछुए कही न जाए । यों संग संसा दृढ़ हुआ, सो धोखे रहे फिराए ॥२६॥

खिनमें कहे है आप में, खिनमें कहे बाहेर । खिनमें माहें न बाहेर, यों सब्द न कोई निरधार ॥२७॥

खिनमें कछू और कहे, खिनमें और की और । सो बात दृढ़ क्यों होवही, जाको वचन ना रेहेवे ठौर ॥२८॥

जैसे बालक बावरा, खेले हंसता रोए । एसे साधू सास्त्रमें, दृढ़ न सब्दा कोए ॥२९॥

ए सबे सींग ससक, बंझा पूत वैराट । फूल गगन नाम धराए के, उड़ाए देवे सब ठाट ॥३०॥

आप होत फूल गगन, बढ़त जात गुमान । देखीतां छल छेतरे, हाए हाए ऐसी नार सुजान ॥३१॥

कोई ना परखे छल को, जिन छलमें हैं आप । तो न्‍यारा खसम जो छल थें, सो क्यों पाइए साख्यात ॥३२॥

अटक रहे सब इतहीं, आगे सब्द न पावे सेर । ए खोजें सब द्वैत में, ओतो अद्वैत लों अंधेर ॥३३॥

ए मत वेद वेदांत की, सास्त्र सबों ए ग्यान । सो साधू लेकर दौड़हीं, आगे मोह न देवे जान ॥३४॥

ए खेल सारा कुदरती, फिराया फिरस्तों फेर । ए इंड गोलक बीच में, गिरद गफलत की अंधेर ॥३५॥

कुदरत को माया कही, गफलत मोह अंधेर । या विध चौदे तबकों, कह्या फिरस्ते का मन फेर ॥३६॥

ए खेल सारा सुन्य का, फिरे मने मन फेर । ए इंड गोलक बीच में, याके मोह तत्व चौफेर ॥३७॥

सब्द जो सारे मोह लों, एक लवा ना निकस्या पार । खोज खोज ताही सब्द को, फेर फेर पड़े अंधार ॥३८॥

केतेक बुजरक कहावहीं, सो याही सुन्य को चाहें । सो गले सब इतहीं, आगे ना निकसे पाए ॥३९॥

फिरे जहां थें नारायन, नाम धराया निगम । सुन्य पार ना ले सके, हटके कह्या अगम ॥४०॥

सुन्य की बिध केती कहूं, ए इंड जाके आधार । नेत नेत केहेके फिरे, निगम को अगम अपार ॥४१॥

अब नेक तो भी कहूं, सुन्य मंडल की सुध । जाको कोई ना उलंघे, अगम अगाध या बिध ॥४२॥

इत नहीं तत्व गुन निरगुन, पख नहीं परमान । अंग ना इंद्री जान ना आवन, लख नहीं निरमान ॥४३॥

इत आद अंत ना थिर चर, नर ना कोई नार । अंधेर ना कछू उजाला, ना निराकार आकार ॥४४॥

जिमी जल ना वाए अगनी, ना सब्द सोहं आसमान । ना कछू जोति रूप रंग, नहीं नाम ठाम कोई बान ॥४५॥

ना जीव करम ना काल कोई, गंध नहीं बल ग्यान । तीर्थंकर भी इत गले, जो कहावें सदा प्रवान ॥४६॥

बीज बिरिख ना कमल फल, भंग ना कछू अभंग । मोहादिक एही सुन्य, बीच सरूप या संग ॥४७॥

तबक चौदे ख्वाब के, याको पेड़ै नींद निदान । नींद के पार जो खसम, सो ए क्यों कर करे पेहेचान ॥४८॥

ए ख्वाबी दम सब नींद लो, दम नींदै के आधार । जो कदी आगे बल करे, तो गले नींदै में निराकार ॥४९॥

जिनहूं जैसा खोजिया, सब बोले बुध माफक । मैं देखे सबद सबन के, सो गए जाहेर मुख बक ॥५०॥

ए पुकार खोजी सुनके, हट रहे पीछे पाए । पार सुध किन ना परी, सब इतहीं रहे उरझाए ॥५१॥

यामें जो बुजरक हुए, सो सीतल भए इन भांत । ना सुध छल ना पार की, यों गले सुन्य ले स्वांत ॥५२॥

या बिध तो भई नास्त, सो ना‍स्त जानो जिन । सार सब्द मैं देख के, लिए सो दृढ़ कर मन ॥५३॥

जिन जानो पाया नहीं, है पावन हार प्रवान । सो छिपे इन छल थें, वाकी मिले न कासों तान ॥५४॥

सो तो प्रेमी छिप रहे, वाको होए गयो सब तुच्छ । खेले पिया के प्रेम में, और भूल गए सब कुछ ॥५५॥

सुरत न वाकी छल में, वाही तरफ उजास । प्रेमै में मगन भए, ताए होए गयो सब नास ॥५६॥

प्रेमी तो नेहेचे छिपे, उन मुख बोल्यो न जाए । सब्द कदी जो निकसे, सो ग्यानी क्यों समझाए ॥५७॥

सब्द जो सीधे प्रेम के, सास्त्र तो स्यानप छल । या विध कोई न समझे, बात पड़ी है बल ॥५८॥

ए जो साधू सास्त्र पुकारहीं, सो तो सुनता है संसार । पर गुझ किनहूं न पाइया, सोई सबद हैं पार ॥५९॥

देखे सारे सास्त्र, सो तो गोरख धंध । मूल कड़ी पाए बिना, देखीते ही अंध ॥६०॥

ऐसा तो कोई ना मिल्या, जो दोनों पार प्रकास । मगन पिया के प्रेम में, भी स्यानप ग्यान उजास ॥६१॥

जो कोई ऐसा मिले, सो देवे सब सुध । माएने गुझ बताए के, कहे वतन की बिध ॥६२॥

सबद सारे वैराट के, बोलत अगम अगम । कोई न कहे रसूल बिना, जो खुद पें आए हम ॥६३॥

ए नबिएँ जाहेर कह्या, मैं पार से आया रसूल । खुद की सुध सब ल्याइया, निद्रा न मेरा मूल ॥६४॥

मैं कारज खसम के, ले आया फुरमान । आखिर इमाम आवसी, तब मैं भी संग सुभान ॥६५॥

मैं आया हुकम हाकिम का, पर आवेगा हाकिम । करसी कजा सबन की, तब संग आखिर हम ॥६६॥

ए फुरमान तब बांचसी, इमाम आवसी जब । लिखिया जो इसारतें, सब जाहेर होसी तब ॥६७॥

काजी कजा कर के, देसी परदा उड़ाए । परदा उड़े सब उड़सी, लेसी कयामत उठाए ॥६८॥

खसम सुध सब देवही, गुझ बतावे कुरान । बातें कहे वतन की, पैगंमर प्रवान ॥६९॥

ए सबद तो जाहेर कहे, पर आया न किनो आकीन । तो लगे सब छल को, हिंदू या मुसलमीन ॥७०॥

ए सबद मैं दृढ़ किए, पिया ना करें निरास । रूह मेरी यों कहे, होसी दुलहे सों विलास ॥७१॥

नबी सबद मोहे मद चढ़यो, बढ़यो बल महामत । अब एक खिन ना रहे सकूं, उड़ गई कहुंए स्वांत ॥७२॥

॥ प्रकरण ॥५॥ चौपाई ॥१४९॥

इसी सन्दर्भ में देखें-