सनन्ध - प्रकरण ६
सनंध विरह तामस की
मैं चाहत न स्वांत इन भांत, अजू आउध अंग चले, इन नैनों दोनों नेक न आवे नीर । दरद देहा जरद गरद रद करे, मैं क्यों धरूं धीर अस्थिर सरीर ॥१॥
कठिन निपट विकट घाटी प्रेम की, त्रबंक बंको सूरों किने न अगमाए । धार तरवार पर सचर सिनगार कर, सामी अंग सांगा रोम रोम भराए ॥२॥
सागर नीर खारे लेहेरें मार मारे फिरे, बेटों बीच बेसुध पछाड़ खावे । खेले मच्छ मिले गले ले उछाले, संधो संध बंधे अन्धों योंज भावे ॥३॥
दाहो दसे दसो दिस सब धखे, लाल झाला चले इंड न झलाए । फोर आसमान फिरे सिर सिखरों, ए फलंग उलंघ संग खसम मिलाए ॥४॥
घाट अवघाट सिलपाट अति सलवली, तहां हाथ न टिके पपील पाए । वाओ वाए बढ़े आग फैलाए चढ़े, जले पर अनल ना चले उड़ाए ॥५॥
पेहेन पाखर गज घंट बजाए चल, पैठ सकोड़ सुई नाके समाए । डार आकार संभार जिन ओसरे, दौड़ चढ़ पहाड़ सिर झांप खाए ॥६॥
बहुत बंध फंद धंध अजूं कई बीच में, सो देखे अलेखे मुख भाख न आवे । निराकार सुन्य पार के पार पिउ वतन, इत हुकम हाकिम बिना कौन आवे ॥७॥
मन तन वचन लगे तिन उतपन, आस पिया पास बांध्यो विश्वास । कहे महामती इन भांत तो रंग रती, दई पियाऐं अग्या जाग करूं विलास ॥८॥
॥ प्रकरण ॥६॥ चौपाई ॥१५७॥
