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विषय-सूची

सनन्ध - प्रकरण ७

सनंध विरह इस्क वृध की

तलफे तारूनी रे, दुलही को दिल दे । सनमंध मूल जानके, सेज सुरंगी पर ले ॥१॥

सब तन विरहे खाइया, गल गया लोहू मांस । न आवे अंदर बाहेर, या बिध सूकत स्वांस ॥२॥

हाड़ हुए सब लकड़ी, सिर श्रीफल विरह अगिन । मांस मीज लोहू रगां, या विध होत हवन ॥३॥

रोम रोम सूली सुगम, खंड खंड खांडा धार । पूछ पिया दुख तिनको, जो तेरी विरहिन नार ॥४॥

ए दरद जाने सोई, जिन लगे कलेजे घाए । ना दारू इन दरद का, फेर फेर करे फैलाए ॥५॥

ए दरद तेरा कठिन, भूखन लगे ज्यों दाग । हेम हीरा सेज पसमी, अंग लगावे आग ॥६॥

विरहिन होवे पिया की, वाको कोई न उपाए । अंग अपने वैरी हुए, सब तन लियो है खाए ॥७॥

ए लछन तेरे दरद के, ताए गृह आँगन न सोहाए । रतन जड़ित जो मंदिर, सो उठ उठ खाने धाए ॥८॥

ना बैठ सके विरहनी, सोए सके ना रोए । राज पृथी पांव दाब के, निकसी या बिध होए ॥९॥

विरहा न देवे बैठने, उठने भी ना दे । लोट पोट भी ना कर सके, हूक हूक स्वांस ले ॥१०॥

आठों जाम जब विरहनी, स्वांस लियो हूक हूक । पत्थर काले ढिग हुते, सो भी हुए टूक टूक ॥११॥

ए बिध मोहे तुम दई, अपनी अंगना जान । परदा बीच का टालने, ताथें विरहा प्रवान ॥१२॥

॥ प्रकरण ॥७॥ चौपाई ॥१६९॥

इसी सन्दर्भ में देखें-