सनन्ध - प्रकरण ८
राग मेंवाड़
विरहा गत रे जाने सोई, जो मिल के बिछुरो होए । ज्यों मीन बिछुरी जलथें, या गत जाने सोए ॥ मेरे दुलहा ॥ तारूनी तलफे विलखे विरहनी, विरहनी विलखे कलपे कामनी ॥ टेक ॥१॥
बिछुरो तेरो वल्लभा, सो क्यों सहे सोहागिन । तुम बिना पिंड ब्रह्मांड, होए गई सब अगिन ॥२॥
विरहा जाने विरहनी, वाको आग न अंदर समाए । सो झालें बाहेर पड़ी, तिन दियो वैराट लगाए ॥३॥
विरहा न छूटे वल्लभा, जो पड़े विघन अनेक । पिंड न देखों ब्रह्मांड, देखों दुलहा अपनो एक ॥४॥
विरहिन विरहा बीच में, कियो सो अपनो घर । चौदे तबक की साहेबी, सो वारूं तेरे विरहा पर ॥५॥
आंधी आई विरह की, तिन दियो ब्रह्मांड उड़ाए । विरहिन गिरी सो ना उठ सकी, रही मूल अंकूर भराए ॥६॥
विरहा सागर होए रह्या, बीच मीन विरहनी नार । दौड़त हों निसवासर, कहूं बेट न पाइए पार ॥७॥
॥ प्रकरण ॥८॥ चौपाई ॥१७६॥
