सनन्ध - प्रकरण ९
राग मलार
इस्क बड़ा रे सबन में, ना कोई इस्क समान । एक तेरे इस्क बिना, उड़ गई सब जहान ॥१॥
चौदे तबक हिसाब में, हिसाब निरंजन सुंन । न्यारा इस्क हिसाब थें, जिन देख्या पिउ वतन ॥२॥
लोक अलोक हिसाब में, हिसाब जो हद बेहद । न्यारा इस्क जो पिउ का, जिन किया आद लों रद ॥३॥
एक अनेक हिसाब में, और निराकार निरगुन । न्यारा इस्क हिसाब थें, जो कछू ना देखे तुम बिन ॥४॥
और इस्क कोई जिन कथो, इस्कें ना पोहोंच्या कोए । इस्क तहां जाए पोहोंचिया, जहां सुन्य सब्द ना होए ॥५॥
नाहीं कथनी इस्क की, और कोई कथियो जिन । इस्क आगे चल गया, सब्द समाना सुंन ॥६॥
सब्द जो सूक्या अंग में, हले नहीं हाथ पाए । इस्क बेसुध ना करे, रही अंदर विलखाए ॥७॥
पांपण पल ना लेवही, दसों दिस नैन फिराए । देह बिना दौड़े अंदर, पिया कित मिलसी कहां जाए ॥८॥
इस्क को एह लछन, जो नैनों पलक ना ले । दौड़े फिरे ना मिल सके, अंदर नजर पिया में दे ॥९॥
नजरों निमख ना छूटहीं, तो नहीं लागत पल । अंदर तो न्यारा नहीं, पर जाए न दाह बिना मिल ॥१०॥
जो दुख तुमहीं विछुरे, मोहे लाग्यो तासों प्यार । एता सुख तेरे विरह में, तो कौन सुख होसी विहार ॥११॥
॥ प्रकरण ॥९॥ चौपाई ॥१८७॥
