सिनगार - प्रकरण १
श्री किताब महासिनगार की जो हुकमें बरनन किया
॥ मंगला चरण ॥
बरनन करो रे रूहजी, हकें तुम सिर दिया भार । अर्स किया अपने दिल को, मांहें बैठाओ कर सिनगार ॥१॥
रूह चाहे बरनन करूं, अखंड सरूप की इत । सुपने में सत सरूप की, किन कही न हक सूरत ॥२॥
रात दिन बसें हक अर्स में, मेरा दिल किया अर्स सोए । क्यों न होए मोहे बुजरकियां, ऐसा हुआ न कोई होए ॥३॥
किन कायम द्वार न खोलिया, अव्वल से आज दिन । जो कोई बोल्या सो फना मिने, किन पाया न बका वतन ॥४॥
अर्स बका हक बरनन, सो बीच फना जिमी क्यों होए । अव्वल से आज दिन लगे, बका सब्द न बोल्या कोए ॥५॥
ए चेतन कहावे झूठी जिमी, सो सब जड़ तूं जान । जो थिर कहावे अर्स में, सो चेतन सदा परवान ॥६॥
ए झूठी रवेसें और हैं, और अर्स में और न्यामत । ए किया निमूना अर्स जानने, पर बने ना तफावत ॥७॥
सतलोक मृतलोक दो कहे, और स्वर्ग कह्या अमृत । जो नीके किताबें देखिए, तो ए सब उड़सी असत ॥८॥
इन झूठी जिमी में केहेत हों, सांच झूठ हैं दोए । जब आगूं अर्स के देखिए, तब इनमें न सांचा कोए ॥९॥
अर्स हमेसा कायम, ए दुनी न तीनों काल । हुआ है ना होएसी, तो क्यों दीजे अर्स मिसाल ॥१०॥
ए बारीक बातें अर्स की, इन दिल जुबां पोहोंचे नाहें । ए हुकम कहावे हक का, इलम हुकम के मांहें ॥११॥
सत सुख कई सरूप में, कई आनन्द आराम । कई खुसाली खूबियां, अंग छूटे न आठों जाम ॥१२॥
अर्स सबे है चेतन, हर चीज में सब गुन । सब न्यामतें एक चीज में, कमी न मांहें किन ॥१३॥
इन झूठी जिमी में बरनन, सत सरूप को कह्यो न जाए । कबूं किन कानों ना सुनी, सो क्यों जीव हिरदे समाए ॥१४॥
ए लीला जानें सृष्ट ब्रह्म की, जाए पोहोंच्या होए तारतम । ए दृष्ट पूरन तब खुले, जाए अव्वल आखिर इलम ॥१५॥
कहे वेद वैराट कछुए नहीं, जैसे आकास फूल । ए चौदे तबक जरा नहीं, ना कछू डाल न मूल ॥१६॥
कतेबे भी यों कह्या, चौदे तबक ए जोए । एक जरा नजरों न आवहीं, जाके टूक न होवें दोए ॥१७॥
ऐसा चौदे तबक का निमूना, क्यों हक को दिया जाए । ए सब्द झूठी जिमी का, क्यों सकिए अर्स पोहोंचाए ॥१८॥
कही जाए न सोभा इन मुख, ना कछू दई जाए साख । एक जरा हरफ न पोहोंचहीं, जो सब्द कहिए कई लाख ॥१९॥
ना अर्स बका किन देखिया, ना कछू सुनिया कान । तरफ भी किन पाई नहीं, तो करे सो कौन बयान ॥२०॥
एक कह्या अर्स-अजीम, दूजा सदरतुल-मुंतहा । तीसरा कह्या मलकूत, जो अर्स फरिस्तों का ॥२१॥
ए तीनों अर्स मुख थें कहें, पर बेवरा न पासे किन । ए दुनियां क्यों समझे, हकीकत खोले बिन ॥२२॥
हक हुकम जाहेर हुआ, दोऊ हादी हुए मेहेरबान । खुली हकीकत मारफत, तो जाहेर करूं फुरमान ॥२३॥
ए तीनों गिरो का बेवरा, एक रूहें और फरिस्ते । तीसरी खलक आम जो, कुन्न केहेते उपजे ॥२४॥
रूहें गिरो कही लाहूती, और फरिस्ते जबरूती । और गिरो जो तीसरी, जो कही मलकूती ॥२५॥
अव्वल खासल खास रूहन की, गिरो फरिस्तों की खास कही । और कुन्न की तीसरी, ए जो आम खलक भई ॥२६॥
दुनियां सरीयत फरज बंदगी, और फरिस्तों बंदगी हकीकत । रूहों हकीकत इस्क, और इन पे है मारफत ॥२७॥
रूहें आसिक सोई लाहूती, जाके अर्स-अजीम में तन । कह्या हकें दोस्त रूहें कदीमी, जो उतरे अर्स से मोमिन ॥२८॥
अर्स कह्या दिल मोमिन, जो मोमिन दिल आसिक । सो मोमिन कछुए न राखहीं, बिना अर्स बका हक ॥२९॥
सोई मोमिन जानियो, जो उड़ावे चौदे तबक । एक अर्स के साहेब बिना, और सब करे तरक ॥३०॥
उतरे हैं अर्स से, वे कहे महंमद मेरे भाई । सो आखिर को आवसी, ए जो अहेल इलाही ॥३१॥
वे फकीर अतीम हैं, मुझे उठाइयो उनों में । हक बरकत दुनियां मिने, होसी सब इनों से ॥३२॥
मोहे इलम दिया हक ने, सो इनों को देसी इमाम । आखिर बड़ाई इनों की, कहे मुसाफ हदीसें तमाम ॥३३॥
ए मांग्या अलिएं हकपे, मुझे उठाइयो आखिरत । मेहेंदी के यारों मिने, मैं पाउं निसबत ॥३४॥
इमाम जाफर सादिक, उनोंने मांग्या हकपे । मुझे उठाइयो आखिरत, मेहेंदी के यारों में ॥३५॥
मूसा इबराहीम इस्माईल, जिकरिया एहिया सलेमान । दाऊदें मांग्या मेंहेंदी जमाना, उस बखत उठाइयो सुभान ॥३६॥
लिख्या यों फुरमान में, सब आवेंगे पैगंमर । जासी जलती दुनियां सब पे, कोई सके न मदत कर ॥३७॥
आखिर महंमद छुड़ावसी, और आग न छूटे किन से । सब जलें आग दोजख की, ए लिख्या जाहेर फुरमान में ॥३८॥
सब पैगंमर सरमिंदे, होसी बीच आखिरत । इत छिपी न रहे कछुए, खुले पट हकीकत मारफत ॥३९॥
पीठ देवे दुनी को, सो मोमिन मुतलक । देखो कौल सबन के, सब बोले बुध माफक ॥४०॥
मांहें मैले बाहेर उजले, सो तो कहे मुनाफक । मासिवा-अल्लाह छोड़ें मोमिन, तामें कुफर नहीं रंचक ॥४१॥
पाक दिल पाक रूह, जा में जरा न सक । जा को ऊपर ना डिंभक, एक जरा न रखे बिना हक ॥४२॥
सरभर एक मोमिन के, कई कोट मिलो खलक । जा को मेहेर करें मोमिन, ताए सुपने नहीं दोजक ॥४३॥
तुम सुनो मोमिनों वचन, जो धनिएँ कहे मुझे आए । साथ आया अपना खेलमें, सो लीजो सबे बोलाए ॥४४॥
मोहे कह्या आप श्री मुख, तेरी अर्स से आई आतम । तो को दिया अपनायत जानके, हक बका अर्स इलम ॥४५॥
निज हुकम आया सिर मोमिनों, जिनके ताले निज नूर । ऐसे ताले हमारी रूह के, क्यों न करें हम हक जहूर ॥४६॥
ब्रह्मसृष्ट हुती बृज रास में, प्रेम हुतो लछ बिन । सो लछ अव्वल को ल्याय रूह अल्ला, पर न था आखिरी इलम पूरन ॥४७॥
जो लों मुतलक इलम न आखिरी, तो लों क्या करे खास उमत । पेहेचान करनी मुतलक, जो गैब हक खिलवत ॥४८॥
लिख भेज्या फुरमान में, हक रमूजें इसारत । सो पाइए इलम हक के, जब खुलें हकीकत मारफत ॥४९॥
जो कीजे बरनन हक बका, होए जोस मेहेर हुकम । निसबत हक हादीय सों, और आखिर इस्क इलम ॥५०॥
अर्स अरवाहों को चाहिए, खोलें रूह की नजर । तब देखें आम खलक को, ज्यों खेल के कबूतर ॥५१॥
तो न लेवें निमूना इनका, ना लेवें इनकी रसम । हक बिना कछुए ना रखें, अर्स अरवाहों ए इलम ॥५२॥
इत सब मुतलकियाँ चाहिए, बरनन करना मुतलक । लिख्या आखिर जाहेर होएसी, सूरत बका जात हक ॥५३॥
लिख्या अव्वल फुरमान में, जाहेर होसी कयामत । जो लों होए इलम मुकैयद, तोलों जाहेर न हक मारफत ॥५४॥
जेती चीजें अर्स में, सो सब मुतलक न्यामत । सो मुतलक इलम बिना, क्यों पाइए हक खिलवत ॥५५॥
ए जो चौदे तबक का बातून, तिन बातून का बातून नूर । ताको भी बातून नूर बिलंद, केहेना तिन बिलंद का बातून जहूर ॥५६॥
ए बातून अर्स बारीकियां, सो होए मुतलकियों इलम । अर्स बका करें जाहेर, सबों भिस्त देवें हुकम ॥५७॥
बरनन करें बका हक की, हम जो अर्स अरवा । लेवें सब मुतलकियां, हम सें रहे न कछू छिपा ॥५८॥
और बात बारीक ए सुनो, अर्स छोड़ न आए मोमिन । और बातें मुतलक खेल की, करसी अर्स में देखे बिन ॥५९॥
हम झूठी जिमी में आए नहीं, झूठ रहे न हमारी नजर । ब्रह्मांड उड़ावे अर्स कंकरी, तो रूहों आगे रहे क्यों कर ॥६०॥
और माया देखाई हम को, करी वास्ते हमारे ए । होसी पूरन हमारी अर्स में, रूहें उमेद करी दिल जे ॥६१॥
हम रूहें न आइयां खेल में, हक अर्स सुख लिए इत । हक हुकमें इलम या विध, सुख दिए कर हिकमत ॥६२॥
हम तो हुए इत हुकम तले, मैं न हमारी हम में । ए मैं बोले हक का हुकम, यों बारीक अर्स माएने ॥६३॥
हुकम किया चाहे बरनन, ले हक हुकम मुतलक । करना जाहेर बीच झूठी जिमी, जित छूटी न कबूं किन सक ॥६४॥
दिन एते हक जस गाइया, लदुन्नी का बेवरा कर । हकें हुकम हाथ अपने लिया, जो दिया था महंमद के सिर पर ॥६५॥
॥ प्रकरण ॥१॥ चौपाई ॥६५॥
