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विषय-सूची

सिनगार - प्रकरण ११

खुले अंग सिनगार छबि छाती

रूह मेरी क्यों न आवे तोहे लज्जत, तो को हकें कही अर्स की । अर्स किया तेरे दिल को, तोहे ऐसी बड़ाई हकें दई ॥१॥

जो कदी तैं आई नहीं, तोमें हक का है हुकम । हुज्जत दई तो को अर्स की, दिया बेसक अपना इलम ॥२॥

बिन जामें देखों अंग को, आसिक सब सुख चाहे । बागा पेहेने हमेसा देखिए, कछू ए छबि और देखाए ॥३॥

आसिक इन मासूक की, नए सुख चाहे अनेक । निरखे नए नए सिनगार, जानें एक से दूजा विसेक ॥४॥

जुदे जुदे सुख ले हक के, रूह आसिक क्योंए न अघाए । ताथें जुदा जुदा बरनन, सुख आसिक ले दिल चाहे ॥५॥

खाना पीना खिन खिन लिया, प्यार अर्स रूहन । पल पल मासूक देखना, एही आहार आसिकन ॥६॥

हक बैठे अपने अर्स में, सो अर्स मोमिन का दिल । तो अनेक खूबी खुसालियां, हम क्यों न लेवें मिल ॥७॥

ए जो हक वस्तर की खूबियां, सो हक अंग परदा जहूर । बारीक ए सुख जानें रूहें, जिनपे अर्स सहूर ॥८॥

वस्तर भूखन सब पूरन, सुख बिन जामें और जिनस । देख देख देखे जो आसिक, जो देखे सोई सरस ॥९॥

कटि कोमल अति पतली, सुन्दर छाती गौर । देख देख सुख पाइए, जो होवे अर्स सहूर ॥१०॥

कटि कोमल कही जो पतली, कछु ए सलूकी और । ए जुबां सोभा तो कहे, जो कहूं देखी होए और ठौर ॥११॥

और पेट पांसली हक की, ए कौन भांत कहूं रंग । रूह देखे सहूर अर्स के, और कौन केहेवे हक अंग ॥१२॥

पांसे पांखड़ी बगलें, सोभित बंधो बंध । अंग रंग खूबी खुसालियां, पार ना सुख सनंध ॥१३॥

ज्यों बरनन सुपन सरूप की, ए भी होत विध इन । ए चारों चीज उत हैं नहीं, ना अर्स में ख्वाब चेतन ॥१४॥

ए बरनन अर्स अंग होत है, ले मसाला इतका । ताथें किन बिध रूह कहे, ना जुबा पोहोंचे सब्द बका ॥१५॥

जो अरवा होए अर्स की, सो कीजो इलम सहूर । इलम सहूर जो हकें दिया, लीजो इनसे रूहें जहूर ॥१६॥

हक को जेता रूह देखहीं, सुध तेती ना बुध मन । तो सुपन जुबां क्या केहेसी, अंग हक बका बरनन ॥१७॥

नरम नाजुक पेट पांसली, क्यों कहूं खूब रस रंग । देत आराम आठों जाम, हक बका अर्स अंग ॥१८॥

छाती निरखों हक की, गौर अति उज्जल । देख हैड़ा खूब खुसाली, तो मोमिन कह्या अर्स दिल ॥१९॥

जिन देख्या हक हैड़ा, क्यों नजर फेरे तरफ और । वाको उसी सूरत बिना, आग लगे सब ठौर ॥२०॥

जो हक अंग देख्या होए, हक जमाल न छोड़े तिन । जाके अर्स की एक रंचक, त्रैलोकी उड़ावे त्रैगुन ॥२१॥

वह देख्या अंग क्यों छूटहीं, हक परीछा एही मोमिन । ए होए अर्स अरवाहों सों, जिनके अर्स अजीम में तन ॥२२॥

हक जात अर्स उन तन से, बीच रेहेत मोमिन के दिल । अर्स मोमिन दिल तो कह्या, यों हिल मिल रहे असल ॥२३॥

दिल हक का और हादी का, ए दोऊ दिल हैं एक । एकै मता दोऊ दिल में, ए अर्स रूहें जानें विवेक ॥२४॥

जो गंज हक के दिल में, सो पूरन इस्क सागर । कोई ए रस और न ले सके, बिना मोमिन कोई न कादर ॥२५॥

तो अर्स कह्या दिल मोमिन, जो इन दिल में हक बैठक । तो इत जुदागी कहां रही, जहां हकै आए मुतलक ॥२६॥

ए क्यों होए बिना निसबतें, इतहीं हुई वाहेदत । निसबत वाहेदत एकै, तो क्यों जुदी कहिए खिलवत ॥२७॥

इतहीं हक मेहेरबानगी, इतहीं हुकम इलम । तो इत जोस इस्क क्यों न आवहीं, जो हकें दिल में धरे कदम ॥२८॥

सोई सहूर अर्स का, जो कह्या हक इलम । सोई मोमिन पे बेसकी, यों अर्स रूहें जुदे ना खसम ॥२९॥

जुबां क्या कहे बड़ाई हक की, पर रूहें भूल गई लाड़ लज्जत । एक दम न जुदे रहे सकें, जो याद आवे हक निसबत ॥३०॥

हक हैड़े के अंदर, मता अनेक अलेखे । उपली नजरों न आवहीं, जो लों रूह अंदर ना देखे ॥३१॥

क्यों छूटे हक हैयड़ा, मोमिन के दिल सें । अर्स मता जो मोमिन का, सब हक हैड़े में ॥३२॥

सब अंग देखत रस भरे, प्रेम के सुख पूरन । रूह सोई जाने जो देखहीं, ले हिरदे रस मोमिन ॥३३॥

ए जो बातून गुन हक दिल में, सो क्यों आवे मिने हिसाब । ए दृष्ट मन जुबां क्या कहे, ए जो मसाला ख्वाब ॥३४॥

छाती मेरे खसम की, जिन का नाम सुभान । जो नेक देखूं गुन अन्दर, तो तबहीं निकसे प्रान ॥३५॥

जो निध हक हैड़े मिने, सो कई अलेखे अनेक । सो सुख लेसी अर्स में, जिन बेवरा लिया इत देख ॥३६॥

हक हैड़े में जो हेत है, रूहों सों प्रेम प्रीत । जिन मेहेर होसी निसबत, सोई ल्यावसी परतीत ॥३७॥

हक हैड़े में इस्क, सब अंगों सनेह । रूह देखसी हक मेहेर से, निसबती होसी जेह ॥३८॥

हक हैड़े में एही बसे, मैं लाड़ पालों रूहों के । ए हक हुज्जत आवे तिनों, तन असल अर्स में जे ॥३९॥

हक हैड़े में निस दिन, सुख देऊं रूहों अपार । जिन रूह लगी होए अन्दर, सो जानेगी जाननहार ॥४०॥

एक नुकता इलम हक दिल से, आया मेरे दिल मांहें । इन नूर नुकते की सिफत, केहे न सके कोई क्यांहें ॥४१॥

ले नूर नुकते की रोसनी, मैं ढूंढ़े चौदे भवन । इनमें कहूं न पाइया, मांहें त्रैलोकी त्रैगुन ॥४२॥

इन इलम नुकते की रोसनी, नहीं कोट ब्रह्मांडों कित । सो दिया मोहे सुपने दिल में, जो नहीं नूर अछर जाग्रत ॥४३॥

खाक पानी आग वाए को, ए चौदे तबक हैं जे । सो मेरे दिल कायम किए, बरकत नुकते इलम के ॥४४॥

एक बूंद आया हक दिल से, तिन कायम किए थिर चर । इन बूंद की सिफत देखियो, ऐसे हक दिल में कई सागर ॥४५॥

एक बूंद ने बका किए, तो होसी सागरों कैसा बल । तो काहूं न पाई तरफ किने, कई चौदे तबक गए चल ॥४६॥

ऐसे कई सुख हक हैड़े मिने, सो ए जुबां कहें क्योंकर । हैड़े बल तो नेक कह्या, जो इत बूंद आई उतर ॥४७॥

कोट ब्रह्मांड का केहेना क्या, जिमी झूठी पानी आग वाए । ए चौदे तबक जो मुरदे, नुकते इलमें दिए जिवाए ॥४८॥

क्यों कहिए सोभा हक की, ना कछू झूठ में आए हम । लेहेजे हुकमें झूठे बैराट को, सांचे किए नुकते इलम ॥४९॥

कही न जाए झूठमें, हक हैड़े की सिफत । हक सोभा छल में तो होए, जो सांच जरा होए इत ॥५०॥

तो कह्या वेद कतेब में, ए ब्रह्मांड नहीं रंचक । तो क्यों कहिए आगे इनके, ए जो सिफत दिल हक ॥५१॥

कहूं सुन्दर सोभा सलूकी, कहूं केते गुन उपले । ए सुख न आवे हिसाब में, ए जो गिरो देखत है जे ॥५२॥

हक छाती सलूकी सुनके, रूह छाती न लगे घाए । धिक धिक पड़ो तिन अकलें, हाए हाए ओ नहीं अर्स अरवाए ॥५३॥

हक छाती नरम कोमल, रूह सदा रहे सूर धीर । पाए बिछुरे पिउ परदेस में, हाए हाए सो रही ना कछू तासीर ॥५४॥

छाती मेरे खसम की, देखी जोर सलूक । न्यारे होत निमख में, हाए हाए जीवरा न होत टूक टूक ॥५५॥

छाती मेरे मासूक की, चुभी मेरी छाती मांहें । जो रूह अर्स अजीम की, तिनसे छूटत नाहें ॥५६॥

बिछुरे पाए परदेस में, देखी पिउ अंग छाती । अब पलक पड़े जो बिछोहा, हाए हाए उड़े ना करे आप घाती ॥५७॥

मासूक छाती रूह थें ना छूटहीं, अति मीठी रंग भरी रस । ए क्यों कर छोड़े मोमिन, जो होए अरवा अर्स ॥५८॥

ए अंग मेरे मासूक के, मीठे अति मुतलक । ए लज्जत असल याद कर, ए लें अरवा आसिक ॥५९॥

मुख न फेरें मोमिन, छाती इन सुभान । ए करते याद अनुभव, क्यों न आवे असल ईमान ॥६०॥

मासूक छाती निरखते, क्यों याद न आवे अर्स । विचार किए आवे अनुभव, जा को दिल कह्यो अरस-परस ॥६१॥

हकें अर्स कह्या दिल मोमिन, अर्स में मता हक सब । अजूं हक आड़े पट रहे, ए देख्या बड़ा तअजुब ॥६२॥

पट एही अपने दिल को, हकें सोई दिल अर्स कह्या । हक पट अर्स सब दिल में, अब अंतर कहां रह्या ॥६३॥

जो विचार विचार विचारिए, तो हक छाती न दिल अंतर । ए पट आड़ा क्यों रहे, जब हुकमें बांधी कमर ॥६४॥

ए क्यों रहे पट अर्स में, पूछ देखो हक इलम । ओ उड़ाए देसी पट बीच का, जब रूह हुकमें आई कदम ॥६५॥

एही पट फरामोस का, दिल में रही अंतर । जब हुकमें बंधाई हिम्मत, तब होस में न आवे क्योंकर ॥६६॥

दिल अर्स कह्या याही वास्ते, परदा कह्या जहूर । दोऊ दिलके बीच में, जो दिल देखे कर सहूर ॥६७॥

हक छाती निपट नजीक है, सेहेरग से नजीक कही । हक सहूर किए बिना, आड़ी अंतर तो रही ॥६८॥

हक भी कहे दिल में, अर्स भी कह्या दिल । परदा भी कह्या दिलको, आया सहूरें बेवरा निकल ॥६९॥

जो पीठ दीजे ब्रह्मांड को, हुआ निस दिन हक सहूर । तब परदा उड़या फरामोस का, बका अर्स हक हजूर ॥७०॥

मेहेबूब छाती की लज्जत, देत नहीं फरामोस । फरामोस उड़े आवे लज्जत, सो लज्जत हाथ प्रेम जोस ॥७१॥

इस्क जोस और इलम, ए हक हुकम के हाथ । तब हक हैड़ा ना छूटहीं, ए सब सुख हैड़े साथ ॥७२॥

ए मेहेर करें जो मासूक, तो रूह हुकमें बांधे कमर । तब फरामोसी दूर दिलसे, हक हैड़े चुभी नजर ॥७३॥

ए होए हक निसबतें, रूहों हुकम देवे हिंमत । तब फरामोसी रेहे ना सके, दे हक छाती लाड़ लज्जत ॥७४॥

इन विध छाती न छूटहीं, रूहों सों निस दिन । असल सुख हक हैड़े के, ए लज्जत लगे अर्स तन ॥७५॥

जोस इस्क सुख अर्स के, ए लगें रूह मोमिन । जब ए सबे मदत हुए, तब क्यों रहे पट रूहन ॥७६॥

असल नींद सो फरामोसी, फरामोसी सोई अंतर । जो अर्स लज्जत आवहीं, तो इलमें तबहीं जुड़े नजर ॥७७॥

इलम सहूर मेहेर हुकम, ए चारों चीजें होंए एक ठौर । तिन खैंच लिया मता अर्स का, पट नहीं कोई और ॥७८॥

अर्स तन दिल में ए दिल, दिल अन्तर पट कछू नाहें । सुख लज्जत अर्स तन खैंचहीं, तब क्यों रहे अन्तर मांहें ॥७९॥

सुपन होत दिल भीतर, रूह कहूं ना निकसत । ए चौदे तबक जरा नहीं, ए तो दिल में बड़ा देखत ॥८०॥

हक छाती रूहथें न छूटहीं, नजर न सके फेर । जो कोई रूह अर्स की, ताए हक बिना सब अन्धेर ॥८१॥

हक छाती में लाड़ लज्जत, और छाती में असल आराम । ए सब सुख को रस पूरन, जो रूह लग रही आठों जाम ॥८२॥

रूहों हक छाती चुभ रही, सो देवे लज्जत अरवाहों को । असल सुख सागर भयो, देखें अर्स आराम सबमों ॥८३॥

ए जो हक हैड़े की खूबियां, सो क्या केहेसी बुध माफक । पर ए कहे हक हुकम, और हक इलम बेसक ॥८४॥

रूह खड़ी करे हुकम, और बेसक लदुन्नी इलम । ना तो रूह कहे क्यों नींद में, हक हैड़ा बका खसम ॥८५॥

महामत कहे बोलूं हुकमें, अर्स मसाला ले । दरगाही रूहन को, सुख असल देने के ॥८६॥

॥ प्रकरण ॥११॥ चौपाई ॥६४१॥

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