सिनगार - प्रकरण १३
हक मासूक के श्रवण अंग
श्रवन की किन विध कहूं, लेत आसिक इत आराम । देख सुन सुख पावहीं, आसिक रूह इन ठाम ॥१॥
कानन के गुन अनेक हैं, सुख आसिक बिना हिसाब । आठों जाम इत पीवहीं, अर्स अरवाहें ए सराब ॥२॥
देख कोमलता कान की, नैनों सीतलता होए । आसिक इन सरूप के, ए सुख जानें सोए ॥३॥
मासूक का मुख सोभित, देख लवने केस कान । पेहेचान वाले सुख पावहीं, देख अर्स अजीम सुभान ॥४॥
कानों सुनें आसिक की, दिल दे गुझ मासूक । कहे आधा सुकन इस्क का, आसिक होए जाए भूक भूक ॥५॥
मुख जुबां मासूक की, सो भी कानों के ताबीन । रूह देखे गुन कानन के, जासों हक जुबां होत आधीन ॥६॥
हकें आसिक नाम धराइया, वाको भी अर्थ ए । मासूक उलट आसिक हुआ, सो भी बल कानन के ॥७॥
हक कहे मेरा नाम आसिक, सो भी सुनके गुझ मोमिन । ए जाने अरवा अर्स की, कहूं केते कानों गुन ॥८॥
खावंद अर्स अजीम का, गुझ सुनत रात दिन । ए जो अरवाहें अर्स की, कई सुख लेवें कानन ॥९॥
हक आसिक हुआ याही वास्ते, सो रूहें क्यों न सुनें हक बात । ए कौन जाने अर्स रूहों बिना, कान गुन अंग अख्यात ॥१०॥
बोहोत बड़े गुन कान के, बिना आसिक न जाने कोए । कई गुझ गुन श्रवन के, और कोई जाने जो दूसरा होए ॥११॥
और देखो गुन कानन के, जब हक देत रूहों कान । वाको ले अपने नजर में, देखें सनकूल दृष्ट सुभान ॥१२॥
सब सुख पावे रूह तिनसों, हुए नेत्र भी कानों तालूक । सीतल दृष्टें देखत, ए जो मासूक मलूक ॥१३॥
ए सब बरकत कानों की, सो सुन सुन रूहकी बान । दिल भी हक तहां देत हैं, मेहेर करत मेहेरबान ॥१४॥
ए गुन सब कानन के, कई गुझ सुख रूह परवान । रूहें कई सुख कानों लेत हैं, रेहेमत इन रेहेमान ॥१५॥
हक इस्क जो करत है, सो सब कानों की बरकत । अनेक सुख हैं इनमें, सो जानें हक निसबत ॥१६॥
आसिक जाए कहूं ना सके, छोड़ सुख हक श्रवन । हिसाब नहीं गुन कानों के, कोई सके न ए गुन गिन ॥१७॥
खोल देखो एक इस्क को, तो कई सुख अर्स अपार । सो सुख लेसी कर बेवरा, जो होसी निसबती हुसियार ॥१८॥
दिल के सुख केते कहूं, जो हक दिल दरिया पूरन । सब अंग ताबे दिल के, होसी अर्समें हिसाब इन ॥१९॥
तो इन जुबां क्यों होवहीं, हक हादी सागर सुख । ए बारीक सुख बीच अर्स के, होसी मूल मेले के मुख ॥२०॥
जो अर्थ ऊपर का लेवहीं, सो सुख जाने एक हक श्रवन । एक एक के कई अनेक, सो कई गुन मगज लेवें मोमिन ॥२१॥
कई अंग ताबे कान के, कान अंग सिरदार । कोई होसी रूह अर्स की, सो जानेगी जाननहार ॥२२॥
इलम भी ताबे कानों के, जो इलम कह्या बेसक । ए झूठी जिमिएं सेहेरग से नजीक, इन इलमें पाइए इत हक ॥२३॥
कई गुन हैं कानन के, जाके ताबे दिल खसम । क्यों सिफत कहूं इन दिलकी, जिन दिल ताबे हुकम ॥२४॥
हुकम इलम ताबे कान के, मेहेर दिल ताबे इस्क के । क्यों कहूं इनसे आगे वचन, कानों ताबे भए सागर ए ॥२५॥
निकस न सके आसिक, हक के एक अंग से । तिन अंग ताबे कई सागर, अर्स रूहें पड़ी इनमें ॥२६॥
जो सागर कहे ताबे कान के, तिन सागरों ताबे कई सागर । जो गुन देखूं हक एक अंग, याथें रूह निकसे क्यों कर ॥२७॥
जो गुन मैं केहेती हों, हक अंग गुन अपार । अर्स रूहें गिनें गुन अंग के, सो गुन आवे न कोई सुमार ॥२८॥
सुनो मोमिनों एक ए गुन, एक अंग ऊपर के कान । अंग अपार कहे कई बातून, अजूं जुदे भूखन सुभान ॥२९॥
जैसी सोभा देखों साहेब की, तैसे कानों पेहेने भूखन । आसमान जिमी के बीच में, हो रही सबे रोसन ॥३०॥
एक अंगमें कई खूबियां, सो एक खूबी कही न जाए । तिन खूबी में कई खूबियां, गिनती होए न ताए ॥३१॥
सो खूबियां भी अर्स की, जाके कायम सुख अखंड । सो कायम सुख इत क्यों कहूं, ए जो जुबां इन पिंड ॥३२॥
क्यों बरनों अर्स अंग को, एक अंग में अनेक रंग । जो देखों ताके एक रंग को, तिन रंग रंग कई तरंग ॥३३॥
सो एक तरंग ना केहे सकों, एक तरंगे कई किरन । जो देखूं एक किरन को, तो पार न पाऊं गुन गिन ॥३४॥
एह निमूना देत हों, सो रूहें जानें जो सिफत करत । जथार्थ सब्द न पोहोंचहीं, तो जुबां पोहोंचे क्यों हक सिफत ॥३५॥
जो कबूं कानों ना सुनी, सो सुन जीव गोते खाए । दम ख्वाबी बानी वाहेदत की, सुनते ही उड़ जाए ॥३६॥
श्रवन गुन गंज क्यों कहूं, जाके ताबे हुए कई गंज । इन गंजो गुन सुख सो जानहीं, जिन बका हक समझ ॥३७॥
गुन एक अंग कह्यो न जावहीं, जो देखों दिल धर । तो गंज अलेखे अपार के, सुख कहूं क्यों कर ॥३८॥
जब देखो गुन श्रवना, जानों कोई न इन सरभर । सहूर करों एक गुन सुख, तो जाए निकस उमर ॥३९॥
ताथें सुख और अंगों के, सो भी लिए दिल चाहे । ना तो श्रवन ताबे कई गंज हुए, ताको एक गुन दिल न समाए ॥४०॥
ए सुख बिना हिसाब के, ए जानें मोमिन दिल अर्स । ए रस जिन रूहों पिया, सोई जाने दिल अरस-परस ॥४१॥
जो देखी सारी कुदरत, सो भी इन श्रवन की बरकत । जो विचार करों इन तरफ को, तो देखों सब में एही सिफत ॥४२॥
जो सहूर कीजे हक सिफतें, तो ए तो हक बका श्रवन । ए सुख क्यों आवें सुमार में, कछू लिया अर्स दिल मोमिन ॥४३॥
जेता सहूर जो कीजिए, सब सिफतें सिफत बढ़त । जो कदी आई बोए इस्क, तो मुख ना हरफ कढ़त ॥४४॥
कहे हुकमें महामत मोमिनों, क्यों कहे जाए गुन कानन । जाके ताबे कई गंज सागर, ए सुख सेहे सके अर्स के तन ॥४५॥
॥ प्रकरण ॥१३॥ चौपाई ॥७५३॥
