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विषय-सूची

सिनगार - प्रकरण १४

हक मासूक के नेत्र अंग

देखों नैना नूरजमाल, जो रूहों पर सनकूल । अरवा होए जो अर्स की, सो जिन जाओ खिन भूल ॥१॥

दिल अर्स नाम धराए के, नैना बरनों नूरजमाल । हाए हाए छेद न पड़े छाती मिने, रोम रोम लगे ना रूह भाल ॥२॥

जो अरवा कहावे अर्स की, सुने बेसक हक बयान । हाए हाए ए झूठी देह को छोड़ के, पोहोंचत ना तित प्रान ॥३॥

सिफत पाई हक नैन की, हक नैनों में गुन अपार । सो गुन अखंड अर्स के, ए रंग हमेसा करार ॥४॥

गुन नैनों के क्यों कहूं, रस भरे रंगीले । मीठे लगें मरोरते, अति सुन्दर अलबेले ॥५॥

सोभावंत कई सुख लिए, तेजवंत तारे । बंके नैन मरोरत मासूक, सब अंग भेदत अनियारे ॥६॥

मेहेर भरे मासूक के, सोहें नैन सुन्दर । भृकुटी स्याम सोभा लिए, चुभ रेहेत रूह अंदर ॥७॥

जोत धरत कई जुगतें, निहायत मान भरे । लज्या लिए पल पापण, आनंद सुख अगरे ॥८॥

नैनों की गति क्यों कहूं, गुनवंते गंभीर । चंचल चपल ऐसे लगें, सालत सकल सरीर ॥९॥

नूर भरे नैना निरमल, प्रेम भरे प्यारे । रस उपजावत रंग सों, मानों अति कामन-गारे ॥१०॥

जब खैंचत भर कसीस, तब मुतलक डारत मार । इन विध भेदत सब अंगों, मूल तन मिटत विकार ॥११॥

निपट बंकी छबि नैन की, नूरै के तारे कारे । सोभें सेत लालक लिए, नूर जोत उजियारे ॥१२॥

बड़े लम्बे टेढ़क लिए, अति अनियां सोभे ऊपर । सीतल करूना अमी झरे, मद रंग भरे सुन्दर ॥१३॥

सोहत छैल छबीले, कहा कहूं सलूक । एह नैन निरखे पीछे, हाए हाए जीव न होत भूक भूक ॥१४॥

दयासिंध सुख सागर, इस्क गंज अपार । सराब पिलावत नैन सों, साकी ए सिरदार ॥१५॥

छब फब इन नैनों की, जो रूह देखे खोल नैन । आठों पोहोर न निकसे, पावे आसिक अंग सुख चैन ॥१६॥

प्रेम पुंज गंज गंभीर, नेत्र सदा सुखदाए । जो रूह मिलावे नैन नैन सों, तो चोट फूट निकसे अंग ताए ॥१७॥

सीतल दृष्ट मासूक की, जासों होइए सनकूल । होए आसिक इन सरूप की, पाव पल न सके भूल ॥१८॥

नैन देखें नैन रूह के, तिनसों लेवे रंग रस । तब आवें दिल में मासूक, सो दिल मोमिन अरस-परस ॥१९॥

रूह देखे हक नैन को, नेत्र में गुन अनेक । सो गुन गिनती में न आवहीं, और केहेने को नैन एक ॥२०॥

कई गुन देखे छब फब में, कई गुन मांहें सलूक । गुन गिनते इन नैनों के, हाए हाए अजूं न होए दिल भूक ॥२१॥

मेरी रूह नैन की पुतली, तिन नैन पुतली के नैन । मासूक राखूं तिन बीच में, तो पाऊं अर्स सुख चैन ॥२२॥

प्रेम प्रीत रस इस्क, सब नैनों में देखाई देत । ए रस जानें रूहें अर्स की, जो भर भर प्याले लेत ॥२३॥

देख देख जो देखिए, तो अधिक अधिक अधिक । नैन देखे सुख पाइए, जानों सब अंगों इस्क ॥२४॥

ए नैन देख मासूक के, आसिक के सब अंग । सुख सीतल यों चुभत, सब अंग बढ़त रस रंग ॥२५॥

कई गुन बड़े नैनके, और कई गुन नैन टेढ़ाए । कई गुन तेज तारन में, कई गुन हैं चंचलाए ॥२६॥

कई गुन हैं तिरछाई में, कई गुन पाँपण पल । कई गुन सीतल कई मेहेर में, कई तीखे गुन नेहेचल ॥२७॥

कई गुन सोभा सुन्दर, कई गुन प्रेम इस्क । कई गुन नैन रंग में, कई गुन नैन रस हक ॥२८॥

कई गुन नैनों के नूर में, कई गुन नैनों के हेत । कई गुन तीखे कई सील में, गुन मीठे कई सुख देत ॥२९॥

कई गुन केते कहूं, गुन को न आवे पार । ए भूल देखो अपनी, ए सोभा गुन गिनूं मांहें सुमार ॥३०॥

कई गुन नेत्र सुभान के, सो क्यों कहूं चतुराई इन । इत जुबां बल न पोहोंचहीं, हिस्सा कोटमा एक गुन ॥३१॥

प्यारे मेरे प्राण के, नैना सुख सागर सलोने । रेहे ना सकों बिना रंगीले, जो कसूंबड़ी उजलक में ॥३२॥

जब देखों सीतल नजरों, सब ठरत आसिक के अंग । सब सुख उपजे अर्स में, हक मासूक के संग ॥३३॥

मैं नैनों देखूं नैन हक के, हुई चारों पुतली तेज पुन्ज । जब नैन मिलें नैन नैन में, नूरै नूर हुआ एक गन्‍ज ॥३४॥

हक देखें पुतली अपनी, मैं देखूं अपनी पुतलियां । मैं हक देखूं हक देखें मुझे, यों दोऊ अरस-परस भैयां ॥३५॥

हक देखें मेरे नैन में, पुतली जो अपनी । मैं अपनी देखूं हक नैन में, यों दोऊ जुगलें जुगल बनी ॥३६॥

अति गौर पांपण नैन की, पल वालत देखत सरम । गुन गरभित मेहेरें पाइए, रूह हुकमें देखे ए मरम ॥३७॥

स्याम बंके भौंह नैनों पर, रंग गौर जुड़े दोऊ आए । निपट तीखी अनियां नेत्र की, मारे आसिकों बान फिराए ॥३८॥

जब खैंचत नैना जोड़ के, तब दोऊ बान छाती छेदत । अंग आसिक के फूट के, वार पार निकसत ॥३९॥

दमानक ज्यों कहूं कहूं, यों पीछली देत गिराए । ए चोट आसिक जानहीं, जो होए अर्स अरवाए ॥४०॥

भौंह बंके नैन कमान ज्यों, भाल बंकी सामी तीन बल । बान टेढ़े मारत खैंच मरोर के, छाती छेद न गया निकल ॥४१॥

तीर कह्या तीन अंकुड़ा, छाती छेद न गया चल । रह्या सीने बीच आसिक के, हुआ काढ़ना रूहों मुस्किल ॥४२॥

केहेर कह्या तीर त्रगुड़ा, रही सीने बीच भाल । रोई रात दिन आसिक, रोवते ही बदल्या हाल ॥४३॥

अर्स बका तीर त्रगुड़ा, रह्या अर्स रूहों हिरदे साल । ना पांच तत्व तीर त्रिगुन, ए नैन बान नूरजमाल ॥४४॥

ए बलवान सेहेज के, जो कदी मारे दिल में ले । न जानों तिन आसिक का, कौन हाल होवे ए ॥४५॥

ए बान टेढ़े अव्वल के, और टेढ़े लिए चढ़ाए । खैंच टेढ़े मारें मरोर के, सो क्यों न आसिक टेढ़ाए ॥४६॥

कहे गुन महामत मोमिनों, नैना रस भरे मासूक के । अपार गुन गिनती मिने, क्यों कर आवें ए ॥४७॥

॥ प्रकरण ॥१४॥ चौपाई ॥८००॥

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