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विषय-सूची

सिनगार - प्रकरण १५

हक मेहेबूब की नासिका

गौर निरमल नासिका, सोभा न आवे मांहें सुमार । आसिक जाने मासूक की, जो खुले होंए पट द्वार ॥१॥

निपट सोभा है नासिका, सोहे तैसा ही तिलक । और नहीं इनका निमूना, ए सरूप अर्स हक ॥२॥

कई खुसबोए अर्स की, लेवत है नासिका । दोऊ नैनों के बीच में, सोभा क्यों कहूं सुन्दरता ॥३॥

रंग उजलाई अर्स की, झांई झलके कसूंब बका । देत सलूकी कई सुख, रूह नैन को नासिका ॥४॥

ए छब फब कोई भांत की, निलाट तिलक बीच नैन । ए आसिक नासिका देख के, पावत हैं सुख चैन ॥५॥

भौंह भासत भली भांतसों, पांपण पलकों पर । ए नैन सोभा नूर जहूर, ए जाने मोमिन अन्तर ॥६॥

अर्स फूल सुगन्‍ध अनगिनती, हिसाब नहीं कहूं कोए । रसांग चीज सब अर्स की, कोई जरा न बिना खुसबोए ॥७॥

सो खुसबोए सब लेत है, रस प्रेमल सुगन्ध सार । सब भोग विवेकें लेत है, हक नासिका भोगतार ॥८॥

ए को जानें रस सबन के, को जाने भोग सबन । ए सब भोगी हक नासिका, हक सुख लेत देत रूहन ॥९॥

चित्त चाह्या नासिका भूखन, खुसबोए लेत चित्त चाहे । चित्त चाही जोत सोभा धरे, सुख आसिक अंग न समाए ॥१०॥

हक सुख खुसबोए के, कई नए नए भोग लेत । ले ले हक विवेक सों, नए नए रूहों सुख देत ॥११॥

कई कई लाड़ रूहन के, लेत देत अरस-परस । नित नए सुख देत सनेह सों, जानों नया दूजा लिया सरस ॥१२॥

नित लेत प्रेम सुख अर्स में, जानों आज लिया नया भोग । यों हक देत जो हम को, नित नए प्रेम संजोग ॥१३॥

जिमी जल तेज वाए बन, जो कछू बीच आसमान । सब खुसबोए नूर में, सुख देत रूहों सुभान ॥१४॥

महामत कहे हक नासिका, याकी सोभा न आवे सुमार । कछू बड़ी रूह मोमिन जानहीं, जा को निस दिन एही विचार ॥१५॥

॥ प्रकरण ॥१५॥ चौपाई ॥८१५॥

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