सिनगार - प्रकरण १७
हक मासूक के वस्तर
देत निमूना बीच नासूत, जानों क्योंए आवे मांहें दिल । आगूं मेला बड़ा होएसी, लेसी मोमिन ए विध मिल ॥१॥
एक देऊं निमूना दुनी का, जो पैदा दुनी में होत । धागा होत है रूई का, और जवेरों जोत ॥२॥
धागा असल रूई तांतसा, जवेर जैसी जोत नंग । हुकमें बनें ताके वस्तर, होए कैसा पेहेनावा अंग ॥३॥
पैदा निमूना दुनी का, अर्स जिमिएं नहीं पोहोंचत । दुनी निमूना हक को, ए कैसी निसबत ॥४॥
जामा कहूं मैं सूत का, के कहूं कपड़ा रेसम । के कहूं हेम नंग जवेर का, के कहूं अव्वल पसम ॥५॥
ए पांचों उत पोहोंचे नहीं, जो कर देखो सहूर । क्यों पोहोंचे फना जड़ निमूना, ए हक बका चेतन नूर ॥६॥
जो कहूं बका जिमीय के, जवेर या वस्तर । सो भी रूह के अंग को, सोभा कहिए क्यों कर ॥७॥
जो चीज पैदा जिमी की, सो दूसरी कही जात । चीज दूसरी वाहेदत में, कैसे कर समात ॥८॥
हक इलमें चुप कर न सकों, और सब्द में न आवे सिफत । ताथें हुकम केहेत है, सुनो जामें की जुगत ॥९॥
पर कछुक निमूने बिना, नजरों न आवे तफावत । तो चुप से तो कछू कह्या भला, रूह कछू पावे लज्जत ॥१०॥
ए दिल में ले देखिए, अर्स धागा और नंग । जोत न माए आकास में, जो सोभें पेहेने हक अंग ॥११॥
वस्तर नहीं जो पेहेर उतारिए, ए हक अंग नूर रोसन । दिल चाह्या रंग जोत पोत, अर्स अंग वस्तर भूखन ॥१२॥
ए जो कही जुगत जामे की, हक अंग का रोसन । और भांत सुख आसिकों, पेहेने तन वस्तर भूखन ॥१३॥
नीला रंग इजार का, मिहीं चूड़ी घूंटी ऊपर । तिन पर झलके दावन, हरी झांई आवत नजर ॥१४॥
रंग नंग बूटी कछुए, लगत नहीं हाथ को । ए सुख बारीक अर्स के, इन अंग का नूर अर्स मों ॥१५॥
जोत करे दिल चाहती, जैसी नरमाई अंग चाहे । सोभा धरे दिल चाहती, जुबां खुसबोए कही न जाए ॥१६॥
चोली अंग को लग रही, सेत जामा अंग गौर । चीन से कुसादी दावन, ताको क्योंकर कहूं जहूर ॥१७॥
पेहेनावा अर्स अजीम का, क्यों कहिए मांहें सुपन । कंकरी एक अर्स की, उड़ावे चौदे भवन ॥१८॥
वस्तरों में कई रंग हैं, सो हाथ को लगत नाहें । और भी हाथ लगे नहीं, जो जवेर वस्तरों मांहें ॥१९॥
रंग रेसम जवेर जो देखत, सो सब मसाला नंग । वस्तर भूखन सब नंगों के, मांहें अनेक देखावें रंग ॥२०॥
कई बेली किनार में, और कई विध बेली चीन । बीच बूटी छापे कई नकस, इन जल की जाने जल मीन ॥२१॥
रंग कंचन कमर कस्या, पटुका जो पूरन । केते रंग इनमें कहूं, जानों एही सबे भूखन ॥२२॥
सो रंग सारे जवेरन के, कई रंग छेड़े किनार । हर धागे रंग कई विध, नहीं रंग जोत सुमार ॥२३॥
दोऊ बगलों केवड़े, किन विध कहूं रोसन । कई रंग नंग मांहें झलकत, जामा क्यों कहूं अर्स तन ॥२४॥
ए सोभा देख सुख उपजे, हक वस्तर या भूखन । और इनकी मैं क्यों कहूं, जो रेहेत ऊपर इन तन ॥२५॥
गिरवान दोऊ देखत, अति सुन्दर अनूपम । मुख आगे मासूक के, निरखत अंग आतम ॥२६॥
बातें करें सलोनियां, मासूक सलोंने मुख । नैन सलोंने रस भरे, कई देत आसिकों सुख ॥२७॥
दोऊ बेल दोऊ बगलों पर, जानों कुन्दन नंग जड़तर । नीले पीले लाल जवेर, सुख पाऊं देत नजर ॥२८॥
दोऊ बांहें चूड़ी अति सुन्दर, मिहीं मिहीं से लग मोहोरी । कई रंग नंग चूड़ियों, जवेर जवेर बीच जरी ॥२९॥
मोहोरी जड़ाव फूल बने, जानों के एही नंग भूखन । बेल जामें जो जुगतें, सबथें सोभा अति घन ॥३०॥
किन विध जामा लग रह्या, ए जो अंग का जहूर । कई नकस बूटी मिहीं बेलियां, रूह कर देखे अर्स सहूर ॥३१॥
पार न जामें सलूकी, ना कछू नरमाई पार । इन मुख गुन केते कहूं, खूबी तेज न सुगंध सुमार ॥३२॥
इन ऊपर जो भूखन, नेक इनकी कहूं विगत । क्यों नूर कहूं अर्स अंग का, पर तो भी कहूं नेक मत ॥३३॥
धागे बराबर नकस, झीने बारीक अतंत । ए फूल बेल तो आवें नजरों, जो अंग अंग खुलें वाहेदत ॥३४॥
ए नकस सो जानहीं, नैनों देखें जो होए निसबत । ए देखें याद आवहीं, पेहेले बातें हुई खिलवत ॥३५॥
हक पाग जो निरखते, होए अचरज मांहें सहूर । ए याद किए क्यों जीव ना उड़े, देख नूरजमाल मुख नूर ॥३६॥
हुकमें पाव पल में, पाग कई कोट होत । रंग नंग फूल कई नकस, दिल चाही धरे जोत ॥३७॥
हक पाग बनावें हाथ अपने, अर्स खावंद दिल दे । ए देखें रूह सुख पावत, जब हाथ गौर पेच ले ॥३८॥
आसिक चाहे मैं देखों, हक यों पेच लेत हाथ मांहें । कई विध फेरें पेच को, कोई इन सुख निमूना नाहें ॥३९॥
जो रंग चाहिए जिन मिसलें, सो नंग धरत तित जोत । फूल नकस कटाव कई, ए कछू अचरज पाग उद्दोत ॥४०॥
मध्य चौक जित चाहिए, ऊपर चाहिए चौकड़ी जित । बेल पात सब रंग नंग, सोई बनी पाग जुगत ॥४१॥
ताथें हक लेत पेच हाथ में, कोमल अंगुरियों । गौर अंगुरियां पतली, मीठा सोभें मुंदरियों ॥४२॥
पोहोंचे देखूं के अंगुरी, नरमाई देखूं के गौर । मुंदरी देखूं के हथेलियां, लीकें देखूं के नख नूर ॥४३॥
चलवन करते हाथ की, नैनों देखत सब सलूक । यों देखत मासूक को, अजूं होत न आसिक टूक ॥४४॥
महामत निमूना ख्वाब का, क्यों दीजे हक वस्तर । हक नूर न आवे सब्द में, पर रह्या न जाए क्योंए कर ॥४५॥
॥ प्रकरण ॥१७॥ चौपाई ॥९२७॥
