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विषय-सूची

सिनगार - प्रकरण १८

हक मेहेबूब के भूखन

भूखन सब्दातीत के, क्यों इत बरनन होए । सोभा अर्स सरूप की, इत कबहूं न बोल्या कोए ॥१॥

तो क्यों माने बीच दुनियां, ए जो हक जात भूखन । रैन अंधेरी क्यों रहे, जब जाहेर हुआ बका दिन ॥२॥

अनेक गुन नंग इनमें, रूह दिल चाह्या जब । जिन जैसा दिल उपजे, सो होत आगूं से सब ॥३॥

जेती अरवाहें अर्स में, ताए मन चाह्या सब होए । दिल चितवन भी पीछे करे, आगे बनि आवे सोए ॥४॥

जैसा मीठा लगे मन को, भूखन तैसा ही बोलत । गरम ठंढा सब अंग को, चित्त चाह्या लगत ॥५॥

हक बरनन करत हों, कहूं नया किया सिनगार । ए सब्द पोहोंचे नहीं, आवत न मांहें सुमार ॥६॥

वस्तर और भूखन, ए हक अंग का नूर । सो निमख न जुदा होवहीं, ज्यों सूरज संग जहूर ॥७॥

इन जिमी आसिक क्यों रहे, बिना किए अपनों आहार । खाना पीना एही आसिकों, अर्स रूहों एही आधार ॥८॥

सोई कलंगी सोई दुगदुगी, सोभे पाग ऊपर । केहे केहे मुख एता कहे, जोत भरी जिमी अंबर ॥९॥

कई विध के सुख जोत में, और कई सुख सुन्दरता । कई सुख तरह सलूकियां, सिफत पोहोंचे न हक बका ॥१०॥

मोतिन की जोत क्यों कहूं, इन जुबां के बल । सोभा लेत दोऊ श्रवनों, अति सुन्दर निरमल ॥११॥

मोती जोत अचरज, और अति उत्तम दोऊ लाल । जो रूह देखे नैन भर, तो अलबत बदले हाल ॥१२॥

कहे जुबां जोत आकास लों, जोतें सोभा कई करोर । सो बोल न सके जुबां बेवरा, इन अकल के जोर ॥१३॥

ए तो मोती लाल कुन्दन, वाहेदत खावंद श्रवन । आकास जिमी भरे जोत सों, तो कहा अचरज है इन ॥१४॥

चोली अंग सों लग रही, ज्यों अंग नूर जहूर । ए लज्जत दिल तो आवहीं, जो होवे अर्स सहूर ॥१५॥

एक देख्या हार हीरन का, कई कोट सूरज उजास । इन उजास तेज बड़ा फरक, ए सुख सीतल जोत मिठास ॥१६॥

हार दूजा मानिक का, जानों उन थें अति सोभाए । जब लालक इनकी देखिए, जानों और सबे ढंपाए ॥१७॥

तीसरा हार अंग देखिया, अति उज्जल जोत मोतिन । जानों सबथें ऊपर, एही है रोसन ॥१८॥

जब हार चौथा देखिए, जानों नीलक अति उजास । जानों के सरस सबन थें, ए देत खुसाली खास ॥१९॥

हार लसनियां पांचमा, कछू ए सुख सोभा और । जानों जोत जिमी आकास में, भराए रही सब ठौर ॥२०॥

जब नंग देखूं नीलवी, जानों एही सुख सागर । जोत मीठी रंग सुन्दर, जानों के सब ऊपर ॥२१॥

हारों बीच जो दुगदुगी, मांहें नव रतन । नव जोत नव रंग की, जानों सब ऊपर ए भूखन ॥२२॥

ए जोत सब जुदी जुदी, देखिए मांहें आसमान । सब जोत जोत सो लड़त हैं, कोई सके न काहूं भान ॥२३॥

भूखन सामी न देखिए, जो देख्या चाहे जंग । पेहेले देखिए आकास को, तो जुध करे नंग सों नंग ॥२४॥

जो कदी पेहेले हार देखिए, तो वाही नजर भरे जोत । या बिन कछू न देखिए, सब में एही उद्दोत ॥२५॥

नेक कहूं बाजू बन्ध की, जोत न जामें सुमार । तो जो नंग बाजू बन्ध के, सो क्यों आवें मांहें विचार ॥२६॥

नंग पटली दस रंग की, मांहें कई विध के नकस । ए सलूकी बेल बूटियां, एक दूजे पे सरस ॥२७॥

लटके बाजू बन्ध फुन्दन, झलकत झाबे अपार । कई नंग रंग एक झाबे में, सो एक एक बाजू चार चार ॥२८॥

तामें नंग कहूं केते जरी, तिन फुन्दन में कई रंग । रंग रंग में कई किरने, किरन किरन कई तरंग ॥२९॥

बांहें हलते फुन्दन लटके, हींचे फुन्दन जोत प्रकास । बांहें हलते ऐसा देखिए, मानों हींचत नूर आकास ॥३०॥

जो पटलियां पोहोंची मिने, सात पटली सात नंग । सो सातों नंग इन भांत के, मानों चढ़ता आकासे रंग ॥३१॥

स्याम सेत नीली पीली, जांबू आसमानी लाल । हाए हाए करते पोहोंची बरनन, अजूं होस लिए खड़ा हाल ॥३२॥

जो एक नंग नीके निरखिए, तो रोम रोम छेदत भाल । जो लों देखों उपली नजरों, तो लों बदलत नाहीं हाल ॥३३॥

कड़ियां कांड़ों सोभित, तिनकी और जुगत । बल ल्याए कई दोरी नंग, रूह निरखें पाइए विगत ॥३४॥

ए नजरों नंग तो आवहीं, जो आवे निसबत प्यार । ना तो भूखन हाथ हक के, दिल करसी कहा विचार ॥३५॥

जुदे जुदे जवेरन की, दस विध की मुंदरी । दोऊ अंगूठों अंगूठिएँ, और मुंदरी आठ अंगुरी ॥३६॥

मानिक मोती नीलवी, पाच पांने पुखराज । लसनिएं और मनी, रहे कुंदन मांहें बिराज ॥३७॥

ए दसे अंगुरियों मुंदरी, नूर नख अंगुरी पतलियां । पोहोंचे हथेली उज्जल लीकें, प्रेम पूरन रस भरियाँ ॥३८॥

अब चरनों चारों भूखन, चारों में जुदे जुदे रंग । जानो के रस जवेर के, जैसे जोत अर्स के नंग ॥३९॥

दस रंग नंग मांहें झांझरी, ए बानी जुदी झनकार । ए सोभा अति अनूपम, अर्स के अंग सिनगार ॥४०॥

यामें बेल पात नकस कई, कई करकरी फूल कांगरी । बानी सोभा सुख देत है, घाट अचरज ए झांझरी ॥४१॥

और बेली कई नकस, मिहीं मिहीं जुगत जिनस । जब नीके कर देखिए, जानों सब थें एह सरस ॥४२॥

जो सोभावत चरन को, सो केते कहूं गुन इन । कोई घायल अरवा जानहीं, जो होसी अर्स के तन ॥४३॥

भूखन अंग अर्स के, जानसी कोई आसिक । अनेक सुख गुन गरभित, ए अर्स सूरत अंग हक ॥४४॥

दोऊ मिल मधुरे बोलत, लेऊं खुसबोए के सुनों बान । सोभा कहूं के नरमाई, ए भूखन चरन सुभान ॥४५॥

बान मधुरी घूंघरी, ए जुदे रूप रंग रस । पांच रंग नंग इनमें, जानो उनपे एह सरस ॥४६॥

कई करड़े कई बूटियां, नकस नाके रंग और । ए सोभा कहूँ मैं किन मुख, जा को इन चरनों है ठौर ॥४७॥

मानो लाल कड़ी मानिक की, मांहें कई रंग बेल अनेक । सिर पुतलियों लग रही, ए सोभा अति विसेक ॥४८॥

इन कड़ी के रूप रंग, मिहीं बेली गिनी न जाए । मानों पुतली वाही की कांगरी, ए जुगत अति सोभाए ॥४९॥

अब कहूं रंग कांबीय के, पेहेरी जंजीर ज्यों जुगत । जुदे जुदे रंग हर कड़ी, नैना देख न होंए तृपित ॥५०॥

अनेक कड़ियां जंजीर में, गिनती होए न ताए । कई रंग नंग एक कड़ीय में, बेल जंजीर गिनी न जाए ॥५१॥

ए विचार कीजे जब दिल से, रूह की खोल नजर । कड़ी कड़ी के रंग देखिए, गिनते होए जाए फजर ॥५२॥

ऊपर खजूरा कड़ियन का, और कई बेल कड़ियों मांहें । तिन बेलों रंग बेली कड़ियों, ए खूबी क्यों कर कहे जुबांएँ ॥५३॥

तेज जोत सोभा सलूकी, रूह केताक देखे ए । खुसबोए नरम स्वर माधुरी, और कई सुख गुझ इनके ॥५४॥

पांच रंग नंग हर कड़ी, कई बेल फूल पात । कई कटाव कई बूटियां, इन जुबां गिने न जात ॥५५॥

हर कड़ी कई करकरी, सो देखत ज्यों जड़ाव । नंग जोत नजरों आवहीं, कई नकस कई कटाव ॥५६॥

सखती न देवें चरन को, ना बोझ देवें पाए । गुन सुख एक भूखन, इन मुख गिने न जाए ॥५७॥

ए देखत अचरज भूखन, बैठे अंग को लाग । ए सोभा कही न जावहीं, कोई देखे जिन सिर भाग ॥५८॥

सरूप पुतलियों मोतियों, है ऊपर हर जंजीर । सोभित सनमुख चेतन, क्यों कहूं इन मुख नीर ॥५९॥

हक चाही बानी बोलत, हक चाही जोत धरत । खुसबोए नरमाई हक चाही, हक चाह्या सब करत ॥६०॥

जैसे सरूप रूहन के, चरनों लगे गिरदवाए । त्यों पुतलियां मोतिन की, कदमों रही लपटाए ॥६१॥

सब समूह भूखन जब देखिए, अदभुत सोभा लेत । जुबां खूबी क्यों केहे सके, हक दिल चाही सोभा देत ॥६२॥

हाथ दीजे भूखन पर, सो हाथों लगत नाहें । पेहेने हमेसा देखिए, ऐसे कई गुन हैं इन मांहें ॥६३॥

अर्स तन हाथ अर्स तने, एक दूजे परस होए । हाथ वस्तर या भूखन, दूजा अर्स तने लगे न कोए ॥६४॥

और हाथ कोई है नहीं, कह्या वा‍स्ते भूखन के । और वस्तर ना कछू भूखन, जो इत निमूना लगे ॥६५॥

है एक हमेसा वाहेदत, दूजा जरा न काहूं कित । ए देखत सो भी कछुए नहीं, और कछू नजरों भी न आवत ॥६६॥

वाहेदत का वाहेदत में, वस्तर भूखन पेहेनत । ए नूर है इन अंग का, ए सुन्य ज्यों ना नासत ॥६७॥

ए मिहीं बातें अर्स सुखकी, सो जानें अर्स अरवाए । इन जिमी सो जानहीं, जिन मोमिन कलेजे घाए ॥६८॥

इन जिमी आसिक क्यों रहे, वह खिन में डारत मार । तो लों रहे सहूर में, जो लों रखे रखनहार ॥६९॥

एही काम आसिकन के, फेर फेर करे बरनन । विध विध सुख सरूप के, सुख लेवें सिनगार भिन भिन ॥७०॥

एही आहार आसिकन का, एही सोभा सिनगार । झीलें सागर वाहेदत में, मेहेर सागर अपार ॥७१॥

महामत देखे विवेक सों, हक वस्तर और भूखन । सब अंग सोभा अंगों की, ज्यों दिल रूह होए रोसन ॥७२॥

॥ प्रकरण ॥१८॥ चौपाई ॥९९९॥

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