सिनगार - प्रकरण २१
मुखकमल मुकट छबि
॥ मंगला चरण ॥
याद करो हक मोमिनों, खेल में अपना खसम । हकें कौल किया उतरते, अलस्तो-बे-रब-कुंम ॥१॥
तब रूहों वले कह्या, बीच हक खिलवत । मजकूर किया हकें तुम सों, वह जिन भूलो न्यामत ॥२॥
हुकमें ए कुंजी ल्याया इलम, हुकमें ले आया फुरमान । दई बड़ाई रूहों हुकमें, हुकमें दई भिस्त जहान ॥३॥
हुकमें हादी आइया, और हुकमें आए मोमिन । और फुरमान भेज्या इन पे, हकें कुंजी भेजी बैठ वतन ॥४॥
और भी हुकमें ए किया, लिया रूह अल्ला का भेस । पेहेचान दई सब अर्सों की, मांहें बैठे दे आवेस ॥५॥
इलम दिया सब अर्सों का, कहूं जरा न रही सक । हम हादी मोमिन सब मिल, करें जारी वास्ते इस्क ॥६॥
और जेती किताबें दुनी में, तिन सबों पोहोंची सरत । सो सब खोली किताबें हुकमें, केहे दई सबों कयामत ॥७॥
फिराए दिए सब फिरके, सब आए बीच हक दीन । भिस्त दई हम सबन को, ल्याए सब हक पर आकीन ॥८॥
बका तरफ कोई न जानत, ए जो चौदे तबक । सो रात मेट के दिन किया, पट खोल अर्स हक ॥९॥
ऐसा खेल इन भांत का, यामें गई ना कबूं किन सक । ताको साफ किए हम हुकमें, सब जले बीच इस्क ॥१०॥
हम मांगें इस्क वतनी, आई हम पे हक न्यामत । हमें ऐसा खेल देखाइया, इत बैठे देखें खिलवत ॥११॥
ऐसे किए हमें इलमें, कोई छिपी न रही हकीकत । जाहेर गुझ सब अर्सों की, ऐसी पाई हक मारफत ॥१२॥
हम झूठी जिमी बीच बैठ के, करें जाहेर हक सूरत । एही ख्वाब के बीच में, बताए दई वाहेदत ॥१३॥
तो ए झूठी जिमी कायम हुई, ऐसी हक बरकत । जानें आगूं कह्या रसूल ने, देसी हम सबों भिस्त ॥१४॥
इलमें ऐसे बेसक किए, इत बैठे पाइए सुध । हम इत आए बिना, देखी खेल की सब विध ॥१५॥
हम तेहेकीक रूहें अर्स की, इन इलमें किए बेसक । ए देख्या खेल झूठा जान के, क्यों छोड़ें बरनन हक ॥१६॥
कह्या रसूलें फुरमान में, अर्स दिल मोमिन । हम और क्यों केहेलाइए, बिना अर्स हक वतन ॥१७॥
ताथें फेर फेर बरनन, करें हक बका सूरत । हुकम इलम यों केहेवहीं, कोई और न या बिन कित ॥१८॥
खिन में सिनगार बदलें, करें नए नए रूप अनेक । होत उतारे पेहेने बिना, ए क्यों कह्यो जाए विवेक ॥१९॥
हक सिनगार कीजे तो बरनन, जो घड़ी पल ठेहेराए । एक पाव पलमें, कई रूप रंग देखाए ॥२०॥
और भी हक सरूप की, इन विध है बरनन । रूह देखें नए नए सिनगार, जिन जैसी चितवन ॥२१॥
ताथें बरनन क्यों करूं, किन विध कहूं सिनगार । ए सोभा हक सूरत की, काहूं वार न पार सुमार ॥२२॥
झूठी जुबां के सब्दसों, और माएने लेना बका । जो सहूर कीजे हक इलमें, तो कछू पाइए गुझ छिपा ॥२३॥
इलम होवे हक का, और हुकम देवे सहूर । होए जाग्रत रूह वाहेदत, कछू तब पाइए नूर जहूर ॥२४॥
ए सुपन देह पांच तत्व की, वस्तर भूखन उपले ऐसे हैं । अर्स रूह सूरत को, मुहकक पेहेनावा क्या कहे ॥२५॥
रूह सूरत नहीं तत्व की, जो वस्तर पेहेन उतारे । नूर को नूर जो नूर है, कौन तिनको सिनगारे ॥२६॥
पेहेले दृढ़ कर हक सूरत, ए अंग किन नूर के । हक जातके निसबती, बका मोमिन समझें ए ॥२७॥
नूर सोभा नूर जहूर, और न सोभा इत । देखो अर्स तन अकलें, ए सरूप वाहेदत ॥२८॥
नाजुकी इन सरूप की, और अति कोमलता । सो इन अंग जुबां क्या कहे, नूरजमाल सूरत बका ॥२९॥
जैसी सरूप की नाजुकी, तैसी सोभा सलूक । चकलाई चारों तरफों, दिल देख न होए टूक टूक ॥३०॥
आसिक अपने सौक को, विध विध सुख चहे । सोई विध विध रूप सरूप के, नई नई लज्जत लहे ॥३१॥
दिल रूहें बारे हजार को, रूप नए नए चाहे दम दम । दें चाह्या सरूप सबन को, इन विध कादर खसम ॥३२॥
रूहें दिल सब एकै, नए नए इस्क तरंग । पिएं प्याले फेर फेर, मांहों मांहें करें प्रेम जंग ॥३३॥
ए बारीक बातें अर्स की, बिन मोमिन न जाने कोए । मोमिन भी सो जानहीं, जा को आई फजर खुसबोए ॥३४॥
जो कछू बीच अर्स के, पसु पंखी नंग बन । सोभा बानी कोमल, खुसबोए रंग रोसन ॥३५॥
मैं नरमाई एक फूल की, जोड़ देखी रूह देह संग । क्यों जुड़े जिमी सोहोबती, सोहोबत जात हक अंग ॥३६॥
क्यों कर आवे बराबरी, खावंद और खेलौने । ए मुहकक क्या विचारहीं, जाहेर तफावत इनमें ॥३७॥
ए चीजें कही सब अर्स की, लीजे मांहें सहूर कर । ए खेलौने रूहन के, नहीं खावंद बराबर ॥३८॥
अर्स चीज भी लीजे सहूर में, जिन अर्स खावंद हक । इन अर्स की एक कंकरी, उड़ावे चौदे तबक ॥३९॥
इत बैठ झूठी जिमी में, झूठी अकल झूठी जुबान । अर्स चीज मुकरर क्यों होवहीं, जो कायम अर्स सुभान ॥४०॥
अर्स चीज न आवे इन अकलें, तो क्यों आवे रूह मूरत । जो ए भी न आवे सहूर में, तो क्यों आवे हक सूरत ॥४१॥
एक रूहें और खेलौने, देख इत भी तफावत । सूरत हक हादी रूहें, देख जो कहावें वाहेदत ॥४२॥
बका चीज जो कायम, तिन जरा न कबूं नुकसान । जेती चीज इन दुनी की, सो सब फना निदान ॥४३॥
जेती चीज अर्स में, न होए पुरानी कब । नुकसान जरा न होवहीं, ए लीजे सहूर में सब ॥४४॥
तो हक अर्स है कह्या, ए चौदे तबक जरा नाहें । जो नाहीं सो है को क्या कहे, ताथें आवत न सब्द मांहें ॥४५॥
जेती चीजें अर्स की, जोत इस्क मीठी बान । खूबी खुसबोए हक चाहेल, तहां नजीक ना नुकसान ॥४६॥
नूर और नूरतजल्ला, कहे महंमद दो मकान । दोए सूरतें जुदी कही, ताकी रूहअल्ला दई पेहेचान ॥४७॥
नाजुक नरम तेज जोत में, सलूकी सोभा मीठी जुबान । सुन्दर सरूप खुसबोए सों, पूरन प्रेम सुभान ॥४८॥
सोई सरूप है नूर का, सोई सूरत हादी जान । रूहें सूरत वाहेदत में, ए पूरन इस्क परवान ॥४९॥
हक सूरत अति सोहनी, दोऊ जुगल किसोर । गौर मुख अति सुन्दर, ललित कोमल अति जोर ॥५०॥
और रूहों की सूरतें, जो असल अर्स में तन । सो सहूर कीजे हक इलमें, देखो अपना तन मोमिन ॥५१॥
खूबी खुसाली न आवे सब्द में, ना रंग रस बुध बान । कोई न आवे सोभा सब्द में, मुख अर्स खावंद मेहेरबान ॥५२॥
जैसी है हक सूरत, और तिन वस्तर भूखन । जो सोभा देत इन सूरतें, सो क्यों कहे जांए जुबां इन ॥५३॥
दिल में जानों दे निमूना, समझाऊं रूहों को । खूबी दुनी की देख के, लगाए देखों अर्स सों ॥५४॥
हक अंग कैसे बरनवूं, इन झूठी जुबां के बल । बका अंग क्यों कर कहूं, यों फेर फेर कहे अकल ॥५५॥
रूप रंग इत क्यों कहिए, ले मसाला इत का । ए सुकन सारे फना मिने, हक अंग अर्स बका ॥५६॥
रूप रंग गौर लालक, कहूं नूर जोत रोसन । ए सब्द सारे ब्रह्मांड के, अर्स जरा उड़ावे सबन ॥५७॥
गौर हक अंग केहेत हों, ए गौर रंग लाहूत । और कहूं सोभा सलूकी, ए छबि है अदभूत ॥५८॥
चकलाई हक अंगों की, रूप जाने अरवा अर्स । रूह जागी जाने खेल में, जो हुई होए अरस परस ॥५९॥
जो रूह जगाए देखिए, तो ठौर नहीं बोलन । जो चुप कर रहिए, तो क्या लें आहार मोमिन ॥६०॥
मैं देख्या दिल विचार के, सुनियो तुम मोमिन । देऊं निमूना दुनी अर्स का, तुम देखियो दिल रोसन ॥६१॥
कही कोमलता कमलन की, और जोत जवेरन । रंग सुरंग जानवरों, कई स्वर मीठी जुबां इन ॥६२॥
कई खुसबोई मांहें पंखियों, कई खुसबोए मांहें फूलन । कई सोभा पसु पंखियों, कई नरमाई परन ॥६३॥
फूल कमल कई पसम, कैसी कोमल दुनी इन । फूल अत्तर चोवा मुस्क, और जोत हीरा जवेरन ॥६४॥
देखो प्रीत पसुअन की, और देखो प्रीत पंखियन । एक चलें दूजा ना रहे, जीव जात मांहें खिन ॥६५॥
छोटे बड़े जीव कई रंग के, जानों के देह कुंदन । कई नकस कई बूटियां, कई कांगरी चित्रामन ॥६६॥
इन भांत केती कहूं, कई खूबी बिना हिसाब । ले खुलासा इन का, छोड़ दीजे झूठा ख्वाब ॥६७॥
देख दुनी देख अर्स को, कई रंगों सोभें जानवर । सुख सनेह खूबी खुसाली, कई मुख बोलत मीठे स्वर ॥६८॥
जीव जल थल या जानवरों, कई केसों परन । रंग खूबी देख विचार के, ले अर्स मसाला इन ॥६९॥
इन विध मैं केती कहूं, रंग खूबी खुसबोए । परों फूलों चित्रामन, कही प्रीत इनों की सोए ॥७०॥
इन विध देखो निमूना, ए झूठी जिमी का विचार । तो कौन विध होसी अर्स में, जो सोभा वार न पार सुमार ॥७१॥
एक देखी विध संसार की, और विध कही अर्स । सांच आगे झूठ कछू नहीं, कर देखो दिल दुरूस्त ॥७२॥
सांच भोम की कंकरी, उड़ावे जिमी आसमान । कैसी होसी अर्स खूबियां, जो खेलौंने अर्स सुभान ॥७३॥
सो खूब खेलौंने देखिए, इनों निमूना कोई नाहें । सिफत इनों ना केहे सकों, मेरी इन जुबाएँ ॥७४॥
कई जुगतें खूबियां, कई जुगतें सनकूल । कई जुगतें सलूकियां, कई जुगतें रस फूल ॥७५॥
कई जुगतें चित्रामन, ऊपर पर केसन । कई मुख मीठी बानियां, स्वर जिकर करें रोसन ॥७६॥
जेती खूबियां अर्स की, सब देखिए जमाकर । लीजे सब पेहेचान के, अन्दर दिल में धर ॥७७॥
रंग रस नूर रोसनी, सोभा सुन्दर खूबी खुसबोए । तेज जोत कोमल, देख नरम नाजुकी सोए ॥७८॥
दिल अर्स खुलासा लेय के, और देख अर्स रूह अंग । रूहों सरभर कोई आवे नहीं, खूबी रूप सलूकी रंग ॥७९॥
खेल खावंद कैसी सरभर, जो रूहें अंग हादी नूर । हादी नूर हक जातका, मोमिन देखें अर्स सहूर ॥८०॥
सिफत ऐसी कही मोमिनों, जाके अक्स का दिल अर्स । हक सुपने में भी संग कहें, रूहें इन विध अरस-परस ॥८१॥
ए जो मोमिन अक्स कहे, जानों आए दुनियां मांहें । हक अर्स कर बैठे दिल को, जुदे इत भी छोड़े नाहें ॥८२॥
अक्स के जो असल, ताए खेलावत सूरत । सो हिंमत अपनी क्यों छोड़हीं, जामें अर्स की बरकत ॥८३॥
दुनी नाम सुनत नरक छूटत, इनों पे तो असल नाम । दिल भी हकें अर्स कह्या, याकी साहेदी अल्ला कलाम ॥८४॥
इलम भी हकें दिया, इनमें जरा न सक । सो क्यों न करें फैल वतनी, करें कायम चौदे तबक ॥८५॥
प्रतिबिंब के जो असल, तिनों हक बैठे खेलावत । तहां क्यों न होए हक नजर, जो खेल रूहों देखावत ॥८६॥
आड़ा पट भी हकें दिया, पेहेले ऐसा खेल सहूर में ले । जो खेल आया हक सहूर में, तो क्यों न होए कायम ए ॥८७॥
हुए इन खेल के खावंद, प्रतिबिंब मोमिनों नाम । सो क्यों न लें इस्क अपना, जिन अरवा हुज्जत स्यामा स्याम ॥८८॥
बड़ी बड़ाई इनकी, जिन इस्कें चौदे तबक । करम जलाए पाक किए, तिन सबों पोहोंचाए हक ॥८९॥
इनों धोखा कैसा अर्स का, जिन सूरतें खेलावें असल । खेलाए के खैंचें आपमें, तब असलै में नकल ॥९०॥
नकलें असलें जुदागी, एक जरा है आड़ा पट । कह्या सेहेरग से नजीक, तिन निपट है निकट ॥९१॥
इन सुपन देह माफक, हकें दिल में किया प्रवेस । ए हुकम जैसा कहावत, तैसा बोले हमारा भेस ॥९२॥
अर्स तन का दिल जो, सो दिल देखत है हम को । प्रतिबिंब हमारे तो कहे, जो दिल हमारे उन दिल मों ॥९३॥
ऐसा खेल किया हुकमें, हमारी उमेदां पूरन । हम सुख लिए अर्स के, दुनी में आए बिन ॥९४॥
ना तो ऐसा बरनन क्यों करें, ए जो वाहेदत नूरजमाल । ना कोई इनका निमूना, ना कोई इन मिसाल ॥९५॥
अर्स भोम की एक कंकरी, तिन आगे ए कछुए नाहें । तो क्यों दीजे बका सुभान को, सिफत इन जुबांएँ ॥९६॥
अर्स जिमी सब वाहेदत, दूजा रहे ना इनों नजर । ज्यों रात होए काली अंधेरी, त्यों मिटाए देवे फजर ॥९७॥
है हमेसा एक वाहेदत, एक बिना जरा न और । अंधेर निमूना न लगत, अंधेर राखत है ठौर ॥९८॥
ए चौदे तबक कछुए नहीं, वेदों कह्या आकास फूल । झूठा देखाई देत है, याको अंकूर ना मूल ॥९९॥
इत वाहेदत कबूं न जाहेर, झूठे हक को जानें क्यों कर । सुध वाहेदत क्यों ले सकें, जो उड़ें देखें नजर ॥१००॥
असल बात वाहेदत की, अर्स अरवाहें जानें मोमिन । इत हक सुध मोमिनों, जाके असल अर्स में तन ॥१०१॥
अब तुम सुनियो मोमिनों, अर्स बिने तुमारी बात । वाहेदत तो कहे मोमिन, जो रूहें असल हक जात ॥१०२॥
और एक मता रूहन का, देखो अर्स वाहेदत । लीजो मोमिन दिल में, ए हक अर्स न्यामत ॥१०३॥
नैन एक रूह के, जो सुख लेवें परवरदिगार । तिन सुख से सुख पोहोंचहीं, दिल रूहों बारे हजार ॥१०४॥
एक रूह बात करे हक सों, सुख लेवे रस रसनाएं । सो सुख रूहों आवत, दिल बारे हजार के मांहें ॥१०५॥
हक बोलावें रूह एक को, सो सुख पावे अतंत । सो बात सुन रूह हक की, सब रूहें सुख पावत ॥१०६॥
रूह सुख हर एक बात का, हकसों अर्स में लेवत । सो सुख सुन रूहें सबे, दिल अपने देवत ॥१०७॥
तो हकें कह्या अर्स अपना, मोमिनों का जो दिल । तो सब ल्याए वाहेदत में, जो यों सुख लेत हिलमिल ॥१०८॥
इन विध सुख केते कहूं, अर्स अरवा मोमिन । तो आए वाहेदत में, जो हक कदम तले इनों तन ॥१०९॥
हकें अर्स कह्या दिल मोमिन, और भेज दिया इलम । क्यों आवें अर्स दिल झूठ में, इत है हक का हुकम ॥११०॥
ताथें बरनन इन दिल, अर्स हक का होए । इस्क हक के से जल जाए, और जरा न रेहेवे कोए ॥१११॥
इन दिल को अर्स तो कह्या, जो खोल दिए बका द्वार । ताथें फेर फेर बरनवूं, हक वाहेदत का सिनगार ॥११२॥
किसोर सूरत हादी हक की, सुन्दर सोभा पूरन । मुख कमल कहूं मुकट की, पीछे सब अंग वस्तर भूखन ॥११३॥
नख सिख लों बरनन करूं, याद कर अपना तन । खोल नैन खिलवत में, बैठ तले चरन ॥११४॥
जैसा केहेत हों हक को, यों ही हादी जान । आसिक मासूक दोऊ एक हैं, ए कर दई मसिएँ पेहेचान ॥११५॥
जुगल किसोर तो कहे, जो आसिक मासूक एक अंग । हक खिन में कई रूप बदलें, याही विध हादी रंग ॥११६॥
हमारे फुरमान में, हकें केते लिखे कलाम । मासूक मेरा महंमद, आसिक मेरा नाम ॥११७॥
॥ मंगला चरण सम्पूर्ण ॥
केस तिलक निलाट पर, दोऊ रेखा चली लग कान । केस न कोई घट बढ़, सोभा चाहिए जैसी सुभान ॥११८॥
एक स्याम नूर केसन की, चली रोसन बांध किनार । दूजी गौर निलाट संग, करे जंग जोत अपार ॥११९॥
सोभा चली आई लवने लग, पीछे आई कान पर होए । आए मिली दोऊ तरफ की, सोभा केहेवे न समर्थ कोए ॥१२०॥
याही भांत भौंह नेत्र संग, करत जंग दोऊ जोर । स्याह उज्जल सरभर दोऊ, चली चढ़ि टेढ़ी अनी मरोर ॥१२१॥
दोऊ अनियां भौंह केसन की, निलाट तले नैन पर । रेखा बांध चली दोऊ किनारी, आए अनियां मिली बराबर ॥१२२॥
दोऊ नेत्र किनारी सोभित, घट बढ़ कोई न केस । उज्जल स्याह दोऊ लरत हैं, कोई दे ना किसी को रेस ॥१२३॥
तिलक निलाट न किन किया, असल बन्यो रोसन । कई रंग खूबी खिन में, सोभा गिनती होए न किन ॥१२४॥
देह इन्द्री फरेब की, देखत इल्लत फना । सो क्यों कहे बका सुभान मुख, इन अंग की जो रसना ॥१२५॥
नासिका हक सूरत की, ए जो स्वांस देत खुसबोए । ब्रह्मांड फोड़ इत आवत, इत रूह बास लेत सोए ॥१२६॥
बिन मोमिन कोई ना ले सके, हक नासिका गुन । कह्या अर्स हक वतन, सो किया दिल जिन ॥१२७॥
हक सूरत की बारीकियां, ए जानें अर्स अरवाए । हक सूरत तो जान हीं, जो कोई और होए इप्तदाए ॥१२८॥
तीन खूंनें तले नासिका, खूंना चढ़ता चौथा ऊपर । ए खूबी जानें रूह अर्स की, ए जो अनी आई नमती उतर ॥१२९॥
दोऊ छेद्रों के गिरदवाए, यों पांखड़ी फूल कटाव । बीच अनी आई जो नासिका, ए मोमिन जानें मुख भाव ॥१३०॥
इन अनिएँ और अनी मिली, तिन उतर अनी हुई दोए । किनार तले दो छेद्र के, सोभा लेत अति सोए ॥१३१॥
दोऊ छेद्र तले अधुर ऊपर, तिन बीच लांक खूंने तीन । सोई सोभा जाने इन अधुर की, जो होए हुकम आधीन ॥१३२॥
और तले जो अधुर, दोऊ जोड़ सोभित जो मुख । रेखा लाल दोऊ सोभित, रूह देख पावे अति सुख ॥१३३॥
तले अधुर के लांक जो, मुख बराबर अनी तिन । सेत बीच बिन्दा खुसरंग, ए मुख सोभा जानें मोमिन ॥१३४॥
इन तले गौर हरवटी, जानें मुख सदा हँसत । ए सोभा जाने अरवा अर्स की, जिन दिल में हक बसत ॥१३५॥
ए रंग कहे मैं इन मुख, पर किन विध कहूं सलूक । ए करते मुख बरनन, दिल होत नहीं टूक टूक ॥१३६॥
फेर कहूं हरवटीय से, ज्यों सुध होए मुख कमल । हक मुख मोमिन निरखहीं, जिन दिल अर्स अकल ॥१३७॥
हरवटी गौर मुख मुतलक, खुसरंग बिन्दा ऊपर । बीच लांक तले अधुर, चार पांखड़ी हुई बराबर ॥१३८॥
गौर पांखड़ी दो लांक की, लाल पांखड़ी दो तिन पर । अधुर अधुर दोऊ जुड़ मिले, हुई लांक के सरभर ॥१३९॥
जोड़ बनी दोऊ अधुर की, निपट लाल सोभित । तिन ऊपर दो पांखड़ी, हरी नेक टेढ़ी भई इत ॥१४०॥
दन्त सलूकी रंग की, इन जुबां कही न जाए । मुख मुस्कत दन्त देखत, क्या केहे देऊं बताए ॥१४१॥
क्यों कहूं रंग रसना, मुख मीठा बोल बोलत । स्वाद लेत रस अर्स के, जुबां केहे ना सके सिफत ॥१४२॥
रस जानत सब अर्स के, रस बोलत रसना बैन । रूहें एक सब्द सुनें रस का, तो पावें कायम सुख चैन ॥१४३॥
नेक अधुर दोऊ खोलहीं, दन्त लाल उज्जल झलकत । अधुर लाल दो पांखड़ी, जानों के नित्य मुसकत ॥१४४॥
दन्त उज्जल ऐनक ज्यों, मांहें जुबां देखाई देत । देख दन्त की नाजुकी, अति सुख मोमिन लेत ॥१४५॥
कबूं दन्त रंग उज्जल, कबूं रंग लालक । दोऊ खूबी दन्तन में, मांहें रोसन ज्यों ऐनक ॥१४६॥
दोऊ बीच अधुर रेखा मुख, कटाव तीन तीन तरफ दोए । पांखें रंग सुरंग दोऊ उपली, चढ़ि टेढ़ी सोभा देत सोए ॥१४७॥
खुसरंग बीच सिंघोड़ा, तले दो अनी ऊपर एक । इन दोऊ पांखें खुसरंग, ए कटाव सोभा विसेक ॥१४८॥
तिन अनी पर दूजी अनी, सोभित सिंघोड़ा सुपेत । ऊपर पांखें दोऊ फिरवली, बीच छेद्र सोभा दोऊ देत ॥१४९॥
इन फूल ऊपर आई नासिका, सो आए बीच अनी सोभाए । तिन पर रेखा दोऊ तिलक की, रंग खिन में कई देखाए ॥१५०॥
दोऊ नेत्र टेढ़े कमल ज्यों, अनी सोभा दोऊ अतन्त । जब पांपण दोऊ खोलत, जानों कमल दो विकसत ॥१५१॥
नासिका के मूल सें, जानों कमल बने अदभूत । स्याम सेत झांईं लालक, सोभा क्यों कहूं अंग लाहूत ॥१५२॥
और कई रंग दोऊ कमल में, टेढ़े चढ़ते निपट कटाव । मेहेर भरे नूर बरसत, हक सींचत सदा सुभाव ॥१५३॥
गौर गलस्थल गिरदवाए, और बीच नासिका गौर । स्याह पांखड़ी कमल पर, सोभित टेढ़ियां नूर जहूर ॥१५४॥
अनी चार दोऊ कमल की, दो बंकी चढ़ती ऊपर । अति स्याह टेढ़ी पांखड़ी, कछू अधिक दोऊ बराबर ॥१५५॥
उज्जल निलाट तिन पर, आए मिली केस किनार । सोहे रेखा बीच तिलक, जुबां कहा कहे सोभा अपार ॥१५६॥
दोऊ तरफों रेखा हरवटी, आए मिली कानन । गौर कान सोभा क्यों कहूं, नहीं नेत्र जुबां मेरे इन ॥१५७॥
गौर गाल दोऊ निपट, मांहें झलकत मोती लाल । ए सोभा कान की क्यों कहूं, इन जुबां बिना मिसाल ॥१५८॥
केस रेखा कानों पीछे, बीच में अंग उज्जल । हक मुख सोभा क्यों कहिए, इन जुबां इन अकल ॥१५९॥
मुकट बन्यो सिर पाचको, रंग नंग तामें अनेक । जुदे जुदे दसों दिस देखत, रंग एक पे और विसेक ॥१६०॥
असल नंग पाच एक है, असल रंग तामें दस । दस दस रंग हर दिसें, सोभा क्यों कहूं जवेर अर्स ॥१६१॥
और मुकट सिर हक के, केहेनी सोभा तिन । सो न आवे सोभा सब्द में, मुकट क्यों कहूं जुबां इन ॥१६२॥
दस रंग कहे एक तरफ के, दूजी तरफ दस रंग । सो रंग रंग कई किरने उठें, किरन किरन कई तरंग ॥१६३॥
किन विध कहूं सलूकियां, हर दिस सलूकी अनेक । देख देख जो देखिए, जानों उनथें एह नेक ॥१६४॥
एक दोरी रंग नंग दस की, ऐसी मूल मुकट दोरी चार । गिरदवाए निलवट पर, सुख क्यों कहूं सोभा अपार ॥१६५॥
यामें एक दोरी अव्वल तले, कांगरी दस रंग ता पर । तिन दोरी पर बनी बेलड़ी, और कहूं सुनो दिल धर ॥१६६॥
इन पर भी दोरी बनी, ता पर बेल और जिनस । तिन पर दोरी और कांगरी, जानों उनथें एह सरस ॥१६७॥
चारों दोरी के रंग कहे, और दस रंग कांगरी दोए । और जिनस दो बेल की, रंग बोहोत ना गिनती होए ॥१६८॥
दस रंग कांगरी के कहूं, चार मनके ऊपर तीन । दो तीन पर एक दो पर, ए जानें दस रंग रूह प्रवीन ॥१६९॥
ए दस रंग के मनके दस, ऊपर एक रंग तले दोए । दोए रंग तले तीन हैं, तीन रंग तले चार सोए ॥१७०॥
इन विध चार दोरी भई, और दोए भई कांगरी । दोए बेली कई रंगों की, ए गिनती जाए न करी ॥१७१॥
ऊपर फिरते फूल कटाव कई, कई बूटियां नकस । तिन पर कही जो कांगरी, फिरती अति सरस ॥१७२॥
तिन ऊपर टोपी बनी, ऊपर चढ़ती अनी एक । तले कटाव कई रंग नंग, ए अनी फूल बन्यो विसेक ॥१७३॥
तीन खूंने तिन ऊपर, दो दोऊ तरफों बीच एक । दस दस नंग तिनों में, सो मोमिन कहें विवेक ॥१७४॥
मानीक मोती पांने नीलवी, गोमादिक पाच पुखराज । और हीरा नंग लसनियां, बीच मनि दसमी रही बिराज ॥१७५॥
ए दस रंग नंग तिनों में, फिरते बने तीन फूल । तले डांड़ियां रंग अनेक हैं, ए सोभा देख हूजे सनकूल ॥१७६॥
दसों दिसा जित देखिए, मन चाह्या रूप देखाए । बिना निमूने इन जुबां, किन बिध देऊं बताए ॥१७७॥
जिन रूह का दिल जिन विध का, सोई विध तिन भासत । एक पलक में कई रंग, रूह जुदे जुदे देखत ॥१७८॥
एह मुकट इन भांत का, पल में करे कई रूप । जो रूह जैसा देख्या चाहे, सो तैसा ही देखे सरूप ॥१७९॥
मैं मुकट कहूं बुध माफक, ए तो अर्स जवेर के नंग । नए नए कई भांत के, कई खिन में बदले रंग ॥१८०॥
और विध मुकट में, रूहें आवें सब मिल । सब रूप रंग देखे इनमें, जो चाहे जैसा दिल ॥१८१॥
याही भांत सब भूखन, याही भांत वस्तर । वस्तर भूखन सब एक रस, ज्यों कुन्दन में जड़तर ॥१८२॥
ए जड़े घड़े किन ने नहीं, ना पेहेर उतारत । दिल चाहे रंग खिन में, मन पर सोभा फिरत ॥१८३॥
जिन खिन रूह जैसा चाहत, सो तैसी सोभा देखत । बारे हजार देखें दिल चाहे, ए किन विध कहूं सिफत ॥१८४॥
मोती करन फूल कुंडल, कहूं केते नाम भूखन । पलमें अनेक बदलें, सुन्दर सरूप कानन ॥१८५॥
जवेर कहे मैं अर्स के, और जवेर तो जिमी से होत । सो हक बका के अंग को, कैसी देखावे जोत ॥१८६॥
और नई पैदास अर्स में नहीं, ना पुरानी कबूं होए । या रसांग या जवेर, जिन जानों अर्स में दोए ॥१८७॥
अर्स साहेबी बुजरक, तिनको नाहीं पार । ए नूर के एक पलथें, कई उपजे कोट संसार ॥१८८॥
सो नूर नूरजमाल के, नित आवें दीदार । तिन हक के वस्तर भूखन, ए मोमिन जानें विचार ॥१८९॥
जिन मोमिन की सिफायत, करी होए मेंहेंदी महंमद । सो जानें अर्स बारीकियां, और क्या जाने दुनी जो रद ॥१९०॥
पेहेनावा नूरजमाल का, वस्तर या भूखन । ज्यों नूर का जहूर, ए जानत अर्स मोमिन ॥१९१॥
ए कबूं न जाहेर दुनी में, अर्स बका हक जात । सो इन जुबां इत क्या कहूं, जो इन सरूप को सोभात ॥१९२॥
वस्तर भूखन हक के, ए केहेनी में ना आवत । सिनगार करें दिल चाह्या, जो सबों को भावत ॥१९३॥
तो ए क्यों आवे बानी में, कर देखो सहूर हक । ए अर्स तनों विचारिए, तुम लीजो बुध माफक ॥१९४॥
अर्स में भी रूहें लेत हैं, जैसी खाहिस जिन । रूह जैसा देख्या चाहे, तिन तैसा होत दरसन ॥१९५॥
वस्तर भूखन किन ना किए, हैं नूर हक अंग के । ए क्यों आवें इन केहेनी में, अंग सांई के सोभावें जे ॥१९६॥
अपार सूरत साहेब की, अपार साहेब के अंग । अपार वस्तर भूखन, जो रेहेत सदा अंगों संग ॥१९७॥
जो सोभा हक सूरत की, सो क्यों पुरानी होए । नई पुरानी तित कहावत, जित कहियत हैं दोए ॥१९८॥
इत कबूं न होए पुराना, ना पैदा कबूं नया । दीदार करें रूहें खिन में, खिन खिन दिल चाह्या ॥१९९॥
जामा पटुका और इजार, ए सबे हैं एक रस । कण्ठ हार सोभा जामें पर, जानों एक दूजे पे सरस ॥२००॥
कण्ठ तले हार दुगदुगी, कई विध विध के विवेक । कई रंग जंग जोतें करे, देखत अलेखे रस एक ॥२०१॥
जुड़ बैठी जामें पर चादर, सोभा याही के मान । ए नाम लेत जुदे जुदे, हक सोभा देख सुभान ॥२०२॥
बगलों कोतकी कटाव, और बंध बेल गिरवान । रंग जुदे जुदे झलकत, रस एकै सब परवान ॥२०३॥
बांहें बाजू बंध सोभित, रंग केते कहूं गिन । तेज जोत लरें आकास में, क्यों असल निरने होए तिन ॥२०४॥
क्यों कहूं सोभा फुंदन, लटकत हैं एक जुगत । आहार देत हैं आसिकों, देख देख न होए तृपित ॥२०५॥
या विध काड़ों पोहोंचियां, या विध कड़ों बल । कई ऊपर रंग जंग करें, तामें गिने न जाए असल ॥२०६॥
हस्त कमल अति कोमल, उज्जल हथेली लाल । केहेते लीकें सलूकियां, हाए हाए लगत न हैड़े भाल ॥२०७॥
पतली पांचों अंगुरियां, पांचों जुदी जुगत । जुदे जुदे रंग नंग मुंदरी, सोभा न पोहोंचे सिफत ॥२०८॥
निरमल अंगुरियों नख, ताकी जोत भरी आकास । सब्द न इन आगूं चले, क्यों कहूं अर्स प्रकास ॥२०९॥
अब चरन कमल चित्त देय के, बैठ बीच खिलवत । देख रूह नैन खोल के, ज्यों आवे अर्स लज्जत ॥२१०॥
इत बैठ निरख चरन को, देख चकलाई चित्त दे । नरम तली अति उज्जल, रूह तेरा सुख दायक ए ॥२११॥
जोत देख चरन नख की, जाए लगी आसमान । चीर चली सब जोत को, कोई ना इन के मान ॥२१२॥
तेज कोई ना सेहे सके, बिना अर्स रूह मोमिन । तेजें उड़े परदा अन्धेरी, ए सहे बका अर्स तन ॥२१३॥
अर्स तन की एह बैठक, ए जोतै के सींचेल । ए अरवा तन सब अर्स के, इनों नजरों रहे ना खेल ॥२१४॥
पांउं देख देख भूखन, कई विध सोभा करत । सो नए नए रूप अनेक रंगों, खिन खिन में कई फिरत ॥२१५॥
चारों जोड़े चरन तो कहूं, जो घड़ी साइत ठेहेराय । खिन में करें कोट रोसनी, सो क्यों आवे मांहें जुबांएँ ॥२१६॥
हरी इजार मांहें कई रंग, ऊपर जामा दावन सुपेत । कई रंग झांई देख के, अर्स रूहें सुख लेत ॥२१७॥
फुन्दन बन्ध अति सोभित, मांहें रंग अनेक झलकत । ए सेत हरे के बीच में, मांहें नरम झाबे खलकत ॥२१८॥
जामें दावन सेत झलकत, जोत उठत आकास । और जोत चढ़त करती जंग, पीत पटुके की प्रकास ॥२१९॥
हार सोभित हिरदे पर, बाजू बन्ध पोहोंची कड़े । सुन्दर सरूप सिर मुकट, दिल आसिकों देखत खड़े ॥२२०॥
चोली चादर हार झलकत, आकास रह्यो भराए । तो सोभा मुख मुकट की, किन बिध कही जाए ॥२२१॥
मीठी सूरत किसोर की, गौर लाल मुख अधुर । ए आसिक नीके निरखत, मुख बानी बोलत मधुर ॥२२२॥
चारों चरन बराबर, सुभान और बड़ी रूह जी । गौर सब गुन पूरन, सुन्दर सोभा और सलूकी ॥२२३॥
तेज जोत नूर भरे, लाल तली कोमल । लाल लांके लीकें क्यों कहूं, रूह निरखे नेत्र निरमल ॥२२४॥
चारों तरफों चकलाई, फना अदभुत रूह खैंचत । एड़ियां अति अचरज, इत आसिक तले बसत ॥२२५॥
चारों चरन अति नाजुक, जो देखूं सोई सरस । ए अंग नाहीं तत्व के, याकी जात रूह अर्स ॥२२६॥
ए मेहेर करें चरन जिन पर, देत हिरदे पूरन सरूप । जुगल किसोर चित्त चुभत, सुख सुन्दर रूप अनूप ॥२२७॥
जुगल किसोर अति सुन्दर, बैठे दोऊ तखत । चरन तले रूहों मिलावा, बीच बका खिलवत ॥२२८॥
महामत कहे मेहेबूब की, जेती अर्स सूरत । सो सब बैठीं कदमों तले, अपनी ए निसबत ॥२२९॥
॥ प्रकरण ॥२१॥ चौपाई ॥१४४६॥
