सिनगार - प्रकरण २५
मोमिनों की सरियत, हकीकत, मारफत, इस्क रब्द का प्रकरण
इस्क रब्द खिलवत में, हुआ हक हादी रूहों सों । सबों ज्यादा इस्क कह्या अपना, तो तिलसम देखाया रूहों कों ॥१॥
तिन फरेब में रल गैयां, जित पाइए ना इस्क हक । कहें हक मोहे तब पाओगे, जब ल्योगे मेरा इस्क ॥२॥
यों हकें छिपाइयां खेल में, दे इलम करी खबरदार । रब्द किया याही वास्ते, ल्याओ प्यार करो दीदार ॥३॥
मोमिन हक को जानत, नजीक बैठे हैं इत । हक कदम हमारे हाथ में, पर हम नजरों ना देखत ॥४॥
ए तेहेकीक किया हक इलमें, इनमें जरा न सक । यों नजीक जान पेहेचान के, हम बोलत ना साथ हक ॥५॥
ए फरामोसी फरेबी, हम जान के भूलत । हक छिपे हमसों हाँसीय को, हाए हाए ए भूल दिल में भी न आवत ॥६॥
बैठे मासूक जाहेर, पर दिल ना लगे इत । मासूक मुख देखन को, हाए हाए नैना भी ना तरसत ॥७॥
सुनने कान ना दौड़त, मासूक मुख की बात । इस्क न जानों कहां गया, जो था मासूक सों दिन रात ॥८॥
रूह अंग ना दौड़े मिलन को, ऐसा अर्स खावंद मासूक । मेहेबूब जुदागी जान के, अंग होत नहीं टूक टूक ॥९॥
जो याद आवे ए कदम की, तो तबहीं जावे उड़ देह । कोई बन्ध पड़या फरेब का, आवे जरा न याद सनेह ॥१०॥
इस्क हमारा कहां गया, जो दिल बीच था असल । तिन दिलें सहूर क्यों छोड़िया, जो विरहा न सेहेता एक पल ॥११॥
जो दिल से ए सहूर करें, तो क्यों रहें मिले बिगर । अर्स बेसकी सुन के, अजूं क्यों रहें नींद पकर ॥१२॥
बातें सबे सुपन की, करें जागे पीछे सब कोए । पर आगे की बातें सबे, सुपने में कबूं न होए ॥१३॥
सो जरे जरे जाग्रत की, सब बातें होत बेसक । नींद रेहेत अचरज सों, आए दिल में अर्स मुतलक ॥१४॥
सो कराई मासूकें हम पे, सब अर्स बातें सुपने । सब गुजरी जो हक हादी रूहों, सो सब करत हम आप में ॥१५॥
हुआ जाती सुमरन जिन को, अर्स अजीम जैसा सुख । निसबत बका नूरजमाल, अजूं क्यों पकड़ रहें देह दुख ॥१६॥
ज्यों जाहेर खड़े देखिए, त्यों देखिए इन इलम । यों लाड़ लज्जत सुख देवहीं, बैठाए अपने तले कदम ॥१७॥
सुपन त्यों का त्यों खड़ा, लिए नींद वजूद । अर्स मता सब देख्या बका, देह झूठी इन नाबूद ॥१८॥
जब सुपन से जागिए, तब नींद सबे उड़ जात । सो जागे में सक ना रही, करें मांहों-मांहें सुपन बात ॥१९॥
ऐसा किया हकें सुपन में, जानों जागे में सक नाहें । ऐसी हुई दिल रोसनी, फेर बोलत सुपनें मांहें ॥२०॥
जानों सुपनें नींद उड़ गई, मुरदे हुए वजूद । हकें हक अर्स देखाइया, सुपन हुआ नाबूद ॥२१॥
फेर सुपन तरफ जो देखिए, तो मुरदे खड़े बोलत । बातें करें अकल में, ऐसा हुकमें देख्या खेल इत ॥२२॥
कबूं कोई न बोलिया, बका बातें हक मारफत । दे मुरदों को इलम अपना, सो बातें हुकम बोलावत ॥२३॥
हुए वजूद नींद के अर्स में, सो नींद दई उड़ाए । दे जाग्रत बातें दिल में, दिल अरसै किया बनाए ॥२४॥
असल मुरदा वजूद, भी हक इलमें दिया मार । जगाए दिए बीच अर्स के, बातें मुरदा करे समार ॥२५॥
यों कई बातें हाँसीय को, मासूक करत हम पर । वास्ते रब्द इस्क के, ए हकें बनाई यों कर ॥२६॥
अब जो हिंमत हक देवहीं, तो उठ मिलिए हक सों धाए । सब रूहें हक सहूर करें, तो जामें तबहीं देवें उड़ाए ॥२७॥
सहूर बिना ए रेहेत है, तेहेकीक जानियो एह । ए भी हुकम हक बोलावत, हक सहूरें आवत सनेह ॥२८॥
सनेह आए झूठ ना रहे, जो पकड़ बैठे हैं हम । ए झूठ नजरों तब क्यों रहे, जब याद आवें सनेह खसम ॥२९॥
हकें इलम भेज्या याही वास्ते, देने हक अर्स लज्जत । सो मांगी लज्जत सब देय के, आखिर उठावसी दे हिंमत ॥३०॥
जो हक न देवे हिंमत, तो पूरा होए न हाँसी सुख । जो रूह भाग जाए आखिर लग, हांसी होए न बिना सनमुख ॥३१॥
हक हिंमत देसी तेहेकीक, हाँसी होए न हिंमत बिन । ए गुझ बातें तब जानिए, हक सहूर आवे हादी रूहन ॥३२॥
ए बारीक बातें मारफत की, तिन बारीक का बातन । ए बातें होंए हक हिंमतें, हक सहूर करें मोमिन ॥३३॥
हिंमत तो भी हुकम, रूह हुज्जत सो भी हुकम । तन हुकम सो भी हुकम, सब हुकम तले कदम ॥३४॥
इलम इस्क तो भी हुकम, सहूर समझ सो हुकम । जोस होस सो भी हुकम, आद अंत हुकम तले हम ॥३५॥
बातें हकसों अर्स में, जो करते थे प्यार । सो निसबत कछूए ना रही, ना दिल चाहे दीदार ॥३६॥
ना तो बैठे हैं ठौर इतहीं, इतहीं किया रब्द । पर ऐसा फरेब देखाइया, जो पोहोंचे ना हमारा सब्द ॥३७॥
इतथें कोई उठी नहीं, बैठा मिलावा मिल । बेर साइत एक ना हुई, यों इलमें बेसक किए दिल ॥३८॥
इस्क मिलावा और है, और मिलावा मारफत । इलमें लई कई लज्जतें, इस्क गरक वाहेदत ॥३९॥
ताथें बड़ी हकीकत मोमिनों, बड़ी मारफत लज्जत । मोमिन लीजो अर्स दिल में, ए नेक हुकम कहावत ॥४०॥
जो कदी इस्क आवे नहीं, तो मोमिन बैठ रहें क्यों कर । अर्स हकसों बेसक होए के, क्यों रहें अर्स बिगर ॥४१॥
इस्क क्यों ना उपजे, पर रूहों करना सोई उद्दम । राह सोई लीजिए, जो आगूं हादिएँ भरे कदम ॥४२॥
ए तिलसम क्योंए ना छूटहीं, जहां साफ न होवे दिल । अर्स दिल अपना करके, चलिए रसूल सामिल ॥४३॥
पाक न होइए इन पानिएं, चाहिए अर्स का जल । न्हाइए हक के जमाल में, तब होइए निरमल ॥४४॥
पाक होना इन जिमिएं, और न कोई उपाए । लीजे राह रसूल इस्कें, तब देवें रसूल पोहोंचाए ॥४५॥
अब कहूं सरीयत मोमिनों, जिन लई हकीकत हक । हक के दिल की मारफत, ए तिन में हुए बेसक ॥४६॥
मोमिन उजू जब करें, पीठ देवें दोऊ जहान को । हौज जोए जो अर्स में, रूहें गुसल करे इनमों ॥४७॥
दम दिल पाक तब होवहीं, जब हक की आवे फिराक । अर्स रूहें दिल जुदा करें, और सबसे होए बेबाक ॥४८॥
चौदे तबक को पीठ देवहीं, ए कलमा कह्या तिन । कलाम अल्ला यों कहेवहीं, ए केहेनी है मोमिन ॥४९॥
ला फना सब ला करें, और इला बका ग्रहें हक । ए कलमा हकीकत मोमिनों, और हक मारफत बेसक ॥५०॥
नूर के पार नूर तजल्ला, रसूल अल्ला पोहोंचे इत । मोमिन उतरे नूर बिलंद से, सो याही कलमें पोहोंचें वाहेदत ॥५१॥
जब हक बिना कछू ना देखे, तब बूझ हुई कलमें । जब यों कलमा जानिया, तब बका होत तिनसें ॥५२॥
ए मोमिनों की सरीयत, छोड़ें ना हकको दम । अर्स वतन अपना जानके, छोड़ें ना हक कदम ॥५३॥
महंमद ईसा इमाम, बैत बका निसान । सोई तीन सूरत महंमद की, देखावें अर्स रेहेमान ॥५४॥
दुनी किबला करें पहाड़ को, और हक तरफों में नाहें । अर्स बका तरफ न राखत, ए देखे फना के मांहें ॥५५॥
हकें देखाया किबला, बीच पाइए मोमिन के दिल । ऊपर तले न दाएँ बाएँ, सूरत हमेसा असल ॥५६॥
मजाजी और हकीकी, दिल कहे भांत दोए । ए बेवरा हकी सूरत बिना, कर न सके दूजा कोए ॥५७॥
इतहीं रोजा इत बन्दगी, इतहीं जकात ज्यारत । साथ हकी सूरत के, मोमिनों सब न्यामत ॥५८॥
मोमिन हक बिना न देखें, एही मोमिनों ताम । बन्दगी तवाफ सब इतहीं, मोमिनों इतहीं आराम ॥५९॥
खाना पीना सब इतहीं, इतहीं मिलाप मजकूर । इतहीं पूरन दोस्ती, इत बरसत हक का नूर ॥६०॥
सरूप ग्रहिए हक का, अपनी रूह के अन्दर । पूरन सरूप दिल आइया, तब दोऊ उठे बराबर ॥६१॥
ए सरीयत अपनी मोमिनों, और है हकीकत । क्यों न विचार के लेवहीं, हक हादी बैठे तखत ॥६२॥
जो कदी दिल में हक लिया, कछू किया ना प्रेम मजकूर । क्यों कहिए ताले मोमिन, जा को लिख्या बिलन्दी नूर ॥६३॥
ए हकीकत मोमिनों, और ले न सके कोए । बेसक होए बातें करें, तो मजकूर हजूर होए ॥६४॥
जो तूं ले हकीकत हक की, तो मौत का पी सरबत । मुए पीछे हो मुकाबिल, तो कर मजकूर खिलवत ॥६५॥
जो लों जाहेरी अंग ना मरें, तो लों जागें ना रूह के अंग । ए मजकूर रूह अंग होवहीं, अपने मासूक संग ॥६६॥
कौल फैल आए हाल आइया, तब मौत आई तोहे । तब रूह की नासिका को, आवेगी खुसबोए ॥६७॥
रूह नैनों दीदार कर, रूह जुबां हक सों बोल । रूह कानों हक बातें सुन, एही पट रूह का खोल ॥६८॥
ए सहूर करो तुम मोमिनों, जब फैल से आया हाल । तब रूह फरामोसी ना रहे, बोए हाल में नूरजमाल ॥६९॥
बेसक होए दीदार कर, ले जवाब होए बेसक । एही मोमिनों मारफत, खिलवत कर साथ हक ॥७०॥
रूह हकसों बात विचार कर, दिल परदा दे उड़ाए । रूह बातें वतन की, कर मासूक सों मिलाए ॥७१॥
जो गुझ अपनी रूह का, सो खोल मासूक आगूं । यों कर जनम सुफल, ऐसी कर हक सों तू ॥७२॥
सब अंग सुफल यों हुए, करी हकसों सलाह सबन । देख बोल सुन खुसबोए सों, जिनका जैसा गुन ॥७३॥
जेते अंग आसिक के, सो सारे किए सुफल । सोई असल रूह आसिक, जिन मोमिन अर्स दिल ॥७४॥
ए निसबत बिना होए नहीं, मासूक सों मजकूर । ए मजकूर इन बिध होवहीं, यों कहे हक सहूर ॥७५॥
मोमिनों हकीकत मारफत, इनमें भी बिध दोए । एक गरक होत इस्क में, और आरिफ लदुन्नी सोए ॥७६॥
एक इस्क दूजा इलम, ए दोऊ मोमिनों हक न्यामत । इस्क गरक वाहेदत में, इलमें हक अर्स लज्जत ॥७७॥
मारफत लदुन्नी मोमिनों, बंदा हक का कामिल । बड़ी बुजरकी इन की, करें बातें हक सामिल ॥७८॥
सक नाहीं लदुन्नीय में, कहे अर्स की जाहेर बातन । करें हकसों बातें इन विध, ज्यों करें अर्स के तन ॥७९॥
हक दिया चाहें लज्जत, ताए इलम देवें बेसक । रूह बातें करें हकसों, देखे हौज जोए हक ॥८०॥
मारफत लदुन्नी जिन लई, सो करे हक सहूर । सहूर किए हाल आवहीं, सो हाल बीच हक मजकूर ॥८१॥
यों हक कहावत मोमिनों, नजीक हाल है तुम । हक बातें किया चाहें, रूह सों वाहेदत खसम ॥८२॥
पीछे हक सब करसी, रूह सुख लिया चाहे अब । सुख लेने को अवसर, पीछे लेसी मोमिन सब ॥८३॥
रूह विरहा खिन एक ना सहें, सो अब चली जात मुद्दत । अर्स रूहें यों भूल के, क्यों छोड़ें हक मारफत ॥८४॥
मारफत हुई हाथ हक के, क्यों ले सकिए सोए । ए दोस्ती तब होवहीं, जब होए प्यार बराबर दोए ॥८५॥
मारफत देवे इस्क, इस्कें होए दीदार । इस्कें मिलिए हकसों, इस्कें खुले पट द्वार ॥८६॥
सोई रब्द जो हकसों किया, वास्ते इस्क के । सो इस्क तब आइया, जब हकें दिया ए ॥८७॥
हांसी करी रूहन पर, दे इलम बेसक । मासूक हंस के तब मिले, जब हकें दिया इस्क ॥८८॥
महामत कहे ए मोमिनों, सब बातों का ए मूल । ए काम किया सब हुकमें, आए इमाम मसी रसूल ॥८९॥
॥ प्रकरण ॥२५॥ चौपाई ॥१९३९॥
