सिनगार - प्रकरण २७
मता हक-ताला ने मोमिनों को दिया
एता मता तुम को दिया, सो जानत है तुम दिल । बेसक इलमें ना समझे, तो सहूर करो सब मिल ॥१॥
ए तो देख्या बड़ा अचरज, पाए सुख बका अपार । भी बेसक हुए हक इलमें, तो भी छूटे ना नींद विकार ॥२॥
ए बोलावत है हुकम, खुदी भी हुकम की । तो हमेसा पाक होए, हक इस्क प्याले पी ॥३॥
खुदी हक हुकम की, सो तो भूलें नाहीं कब । वह काम सोई करसी, जो भावे अपने रब ॥४॥
हुकम तो है हक का, और खुदी भी ना हुकम बिन । खुदी हुकम दोऊ हक के, इत क्या लगे रूहन ॥५॥
हक केहेवे नेकों को, दोस्त रखता हों मैं । या खुदी या हुकम, टेढ़ी होए नहीं इनों सें ॥६॥
हुकमें लिया भेख रूह का, सो भी हाँसी खुसाली रूहन । क्यों सिर लेना खुदी हुकम, पाक होए पकड़े चरन ॥७॥
जब भेख काछा रूह का, फैल सोई किया चाहे तिन । नाम धराए क्यों रद करे, हक एती देत बड़ाई जिन ॥८॥
ए निस दिन बातें विचार हीं, सोई हुकम हुज्जत मोमिन । पाक हुआ सो जो अर्स दिल, जाके हक कदम तले तन ॥९॥
हुकम तो तन में सही, और लिए रूह की हुज्जत । हिस्सा चाहिए तिन का, सो भी मांहें बोलत ॥१०॥
कह्या दिल अर्स मोमिन का, दिल कह्या न हुकम का । देखो इनों का बेवरा, हिस्से रूह के हैं बका ॥११॥
मोमिन तन में हुकम, तामें हिस्से रूह के देख । दिल अर्स हक इलम, रूह की हुज्जत नाम भेख ॥१२॥
जो कदी रूहें इत हैं नहीं, तो भी एता मता लिए आमर । सो अर्स बका हक बिना, ले हुज्जत रहे क्यों कर ॥१३॥
एता मता रूह का, हुकम के दरम्यान । तिन का जोरा चाहिए, जो हक आगूं होसी बयान ॥१४॥
हाँसी न होसी हुकम पर, है हाँसी रूहों पर । जा को गुनाह पोहोंच्या खिलवतें, कहे कलाम अल्ला यों कर ॥१५॥
मोमिन बैठे खेल में, अजूं बीच ख्वाब । गुनाह पेहेले पोहोंच्या अर्स में, करें मासूक रूहें हिसाब ॥१६॥
हक हुकम तो है सब में, बिना हुकम कोई नाहें । पर यामें हुकम नजर लिए, और रूह का बड़ा मता या मांहें ॥१७॥
जेता हिस्सा तन में जिनका, सो जोरा तेता किया चाहे । ए विचार करें सो मोमिन, हक हुकम देसी गुहाए ॥१८॥
ताथें हुकम के सिर दोस दे, बैठ न सकें मोमिन । अर्स दिल खुदी से क्यों डरें, लिए हक इलम रोसन ॥१९॥
गुनाह नूरतजल्ला मिनें, पोहोंच्या रूहों का जित । कह्या गुनाह कुलफ मुंह मोतिन, दिल महंमद कुंजी खोलत ॥२०॥
हिसाब जिनों हाथ हक के, अर्स-अजीम के मांहें । अर्स तन बीच खिलवत, ताको डर जरा कहूं नाहें ॥२१॥
करी हाँसी हकें रूहों पर, जिन वास्ते किया खेल । रूहों बहस किया इस्क का, बेर तीन देखाया मांहें लैल ॥२२॥
हक आगूं कहे महंमद, मोहे अर्स में बिना उमत । हकें दिया प्याला मेहेर का, कहे मोहे मीठा न लगे सरबत ॥२३॥
हकें दोस्त कहे औलिए, भए ऐसे बुजरक । इनों को देखे से सवाब, जैसे याद किए होए हक ॥२४॥
जित पर जले जबराईल, पोहोंच्या न बिलंदी नूर । बिना रूहें इसारतें खिलवत, दूजा ए कौन जाने मजकूर ॥२५॥
अलस्तो बे रब कह्या हक ने, तब जवाब दिया रूहन । कोई और होवे तो देवहीं, ए फुरमान कहे सुकन ॥२६॥
तुम रूहें जात नासूत में, जाओगे मुझे भूल । तब तुम ईमान ल्याइयो, मैं भेजोंगा रसूल ॥२७॥
तुम माहों मांहें रहियो साहेद, इत मैं भी साहेद हों । ए जिन भूलो तुम सुकन, मैं फुरमान भेजों तुमको ॥२८॥
और साहेद किए हैं फरिस्ते, सो भी देवेंगे साहेदी । सो रसूल याद देसी तुमें, जो मेरे आगूं हुई इतकी ॥२९॥
ऐसी बड़ाई औलियों, हक अपने मुख दें । कोई याको न जाने मुझ बिना, मैं छिपाए तले कबाए के ॥३०॥
मांगी हुकमें रूह की हुज्जतें, दीजे दुनी में लाड़ लज्जत । सो हक आप मंगावत, कर हाँसी जुदाई बीच वाहेदत ॥३१॥
कबूं न जुदागी बीच वाहेदत, ए इलमें किए बेसक । तेहेकीक बैठे तले कदमों, न जुदे रूहें हादी हक ॥३२॥
हुआ रब्द वास्ते इस्क, सबों बड़ा कह्या अपना । हकें हाँसी करी हादी रूहोंसों, कहे देखो खेल फना ॥३३॥
खेल का जोस आया सबों, इस्क न रह्या किन । सब चाहें साहेबी खेल की, हक इस्क न नजीक तिन ॥३४॥
था रब्द सबों इस्क का, हक देत फेर फेर याद । रूहें क्योंए न छोड़ें खेल को, दुख लाग्या ऐसा कोई स्वाद ॥३५॥
जब देखिए सामी खेल के, तो बीच पड़यो ब्रह्मांड । एती जुदाई हक अर्स के, और खेल वजूद जो पिंड ॥३६॥
हक इलमें ए पिंड देखिए, ए पिंड बीच अर्स तन । एक जरा जुदागी ना रही, अर्स वाहेदत बीच वतन ॥३७॥
जाहेर नजरों खेल देखिए, कहूं नजीक न अर्स हक । तरफ भी न पाई किनहूं, बीच इन चौदे तबक ॥३८॥
जबथें पैदा भई दुनियां, रही दूर दूर थें दूर । फना बका को न पोहोंचहीं, ताथें कोई न हुआ हजूर ॥३९॥
दोऊ गिरो उतरी दोऊ अर्स से, रूहें और फरिस्ते । हकें इलम भेज्या इनों पर, सो ले दोऊ अर्सों पोहोंचे ए ॥४०॥
आए फरिस्ते नूर मकान से, अर्स अजीम मकान रूहन । कलाम अल्ला हक इलम, ए आए ऊपर रूह मोमिन ॥४१॥
दोऊ गिरो जो उतरी, दोऊ अर्सों से आई सोए । सो आप अपने अर्स में, बिना लदुन्नी न पोहोंचे कोए ॥४२॥
आप अपने अर्स में, जाए ना सके बिना इलम । तो फुरमान इलम भेजिया, रूहें दरगाही जान खसम ॥४३॥
तो अर्स कह्या दिल मोमिन, जो पकड़या इलम हक । हक सूरत सुध अर्सों की, रूहों रही न जरा सक ॥४४॥
सोई मोमिन जा को सक नहीं, और दिल अर्स हक हुकम । पट खोले नूर पार के, आए दिल में हक कदम ॥४५॥
पेहेले पट दे खेल देखाइया, दई फरामोसी हाँसी को । दिया बेसक इलम अपना, तो भी न आवें होस मों ॥४६॥
इलमें अंदर जगाइया, तिन में जरा न सक । कहे हुई है होसी अर्सों की, रूहें बैठी कदम तले हक ॥४७॥
इन बातों सक जरा नहीं, तो दिल अर्स कह्या मोमिन । तो भी टले ना बेहोसी, वास्ते हाँसी बीच वतन ॥४८॥
विरहा सुनत रूहें अर्स की, तबहीं जात उड़ तन । सो गवाए याद कर कर हकें, जो बीतक अर्स वचन ॥४९॥
मैं जान्या प्रेम आवसी, विरहे के वचनों गाए । सो अव्वल से ले अबलों, विरहा गाया लडाए लडाए ॥५०॥
सो गाए विरहा न आइया, प्रेम पड़या बीच चतुराए । हाँसी कराई हुकमें, वचनों प्यार लगाए ॥५१॥
सो गाए गाए हुआ दिल सखत, मूल इस्क गया भुलाए । मन चित्त बुध अहंकारे, गुझ अर्स कह्या बनाए ॥५२॥
अर्स मता जेता हुता, किया जाहेर नजर में ले । हमें न आया इस्क सुपने, ए किया वास्ते जिन के ॥५३॥
चौदे तबक बेसक हुए, इन बानी के रोसन । सो इलम ले कायम हुए, सुख भिस्त पाई सबन ॥५४॥
हक खिलवत गाए सें, जान्या हम को देसी जगाए । इस्क पूरा आवसी, पर हकें हाँसी करी उलटाए ॥५५॥
जो देते हम को इस्क, तो क्यों सकें हम गाए । दिल अर्स पोहोंचे रूह इस्कें, तो इत क्यों रह्यो रूहों जाए ॥५६॥
सब अंग हमारे हक हाथ में, इस्क मांगें रोए रोए । सब अंग हमारे बांध के, हक आप करें हाँसी सोए ॥५७॥
हम हुकम के हाथ में, हक के हाथ हुकम । इत हमारा क्या चले, ज्यों जानें त्यों करे खसम ॥५८॥
महामत कहे ए मोमिनों, हकें भुलाए हाँसी कों । हम दौड़े जान्या लें इस्क, हम को डारे बका इलम मों ॥५९॥
॥ प्रकरण ॥२७॥ चौपाई ॥२०२५॥
