सिनगार - प्रकरण ३
आसिक इन चरन की, आसिक की रूह चरन । एह जुदागी क्यों सहे, रूह बिना अपने तन ॥१॥
जो रूह अर्स की मोमिन, तिन सब की ए निसबत । दिल मोमिन अर्स इन माएनों, इन दिल में हक सूरत ॥२॥
हक सूरत रूह मोमिन, निसबत एह असल । मोमिन रूहें कही अर्स की, तो अर्स कह्या मोमिन दिल ॥३॥
ए चरन दोऊ हक के, आए धरे मेरे दिल मांहें । तो अर्स कह्या दिल मोमिन, आई न्यामत हक हैं जांहें ॥४॥
ए चरन हुए अर्स मासूक, हुआ अर्स चरन दिल एक । ए वाहेदत जुदागी क्यों होए, जो ताले लिखी ए नेक ॥५॥
अर्स अरवाहें जो वाहेदत में, सो सब तले हक नजर । इस्क सुराही हाथ हक के, रूहों पिलावें भर भर ॥६॥
इस्क हक के दिल में, सो दिल पूरन गंज अपार । असल तन इत जिनों, सो ए रस पीवनहार ॥७॥
सराब हक सुराही का, पिया अरवाहों जिन । आठों जाम चौसठ घड़ी, क्यों उतरे मस्ती तिन ॥८॥
असल अरवाहें अर्स की, जो हैं रूह मोमिन । एक निसबत जानें हक की, जिनों मासूक प्यारे चरन ॥९॥
मोमिन वासा चरन तले, अर्स अरवाहों का मूल । मोमिन आए इत अर्स से, तो फुरमान ल्याए रसूल ॥१०॥
तो कह्या मोमिन खाना दीदार, पानी पीवना दोस्ती हक । तवाफ सिजदा इतहीं, करें रूह कुरबानी मुतलक ॥११॥
रूहें अव्वल आखिर इतहीं, मोमिन ना दूजा ठौर । कहे चौदे तबक जरा नहीं, बिना वाहेदत ना कछू और ॥१२॥
जो अब भी जाहेर ना होती, बका हक सूरत । तो क्यों होती दुनी हैयाती, क्यों भिस्त द्वार खोलत ॥१३॥
जो दीदार न होता दुनी को, तो क्यों करते इमाम इमामत । क्यों जानते कयामत को, जो जाहेर न होती निसबत ॥१४॥
अर्स बका द्वार न खोलते, तो क्यों होती सिफायत महंमद । हक के कौल सबे मिले, जो काफर करत थे रद ॥१५॥
कह्या अव्वल महंमद ने, हक अमरद सूरत । मैं देखी अर्स अजीम में, पोहोंच्या बका बीच खिलवत ॥१६॥
हौज जोए बाग जानवर, जल जिमी अर्स मोहोलात । और अनेक देखी न्यामतें, गुझ जाहेर करी कई बात ॥१७॥
सो बरनन हुई हक सूरत, जासों महंमदें करी मजकूर । नब्बे हजार हरफ सुने, नूर पार पोहोंच हजूर ॥१८॥
हक हुकमें कछू जाहेर किए, और छिपे रखे हुकम । सो हुकमें अव्वल आखिर को, अब जाहेर किए खसम ॥१९॥
सब कोई कहे खुदा एक है, दूजा कहे न कोए । कलाम अल्ला कहे एक खुदा, दूजा बरहक महंमद सोए ॥२०॥
सो महंमद कहे मैं उमत से, मुझसे है उमत । मैं उमत बिना न पी सकों, हक हजूर सरबत ॥२१॥
खुदा एक महंमद साहेद, मसहूद है उमत । ए तीनों अर्स अजीम में, ए वाहेदत बीच हकीकत ॥२२॥
ए उपले माएने तीन कहे, और चौथा नूर मकान । ए बातें मारफत की, सब मिल एक सुभान ॥२३॥
रसूलें एता इत जाहेर किया, और हरफ रखे छिपाए । हक मेला बड़ा होएसी, सो करसी जाहेर खिलवत आए ॥२४॥
बसरी मलकी और हकी, कही महंमद तीन सूरत । तामें दोए देसी हक साहेदी, हकी खोले सब हकीकत ॥२५॥
हकी हक अर्स करे जाहेर, ऊग्या कायम सूर फजर । होसी सब हैयाती, देख कायम खिलवत नजर ॥२६॥
ले हकी सूरत हक इलम, करसी जाहेर हक बिसात । खिलवत भी छिपी ना रहे, करे जाहेर वाहेदत हक जात ॥२७॥
फजर कही जो फुरमाने, सो अर्स बका हक दिन । जो लों बका तरफ पाई नहीं, तो लों सबों ना रोसन ॥२८॥
अब दिन कायम जाहेर हुआ, सबों रोसनी पोहोंची बका हक । कायम किए सब हुकमें, बरस्या बका इस्क मुतलक ॥२९॥
रूह अल्ला चौथे आसमान से, आए खोली सब हकीकत । ल्याए इलम लदुन्नी, कही सब हक मारफत ॥३०॥
जो कही महंमद ने, हक जात सूरत । सोई कही रूहअल्ला ने, यामें जरा न तफावत ॥३१॥
जो अमरद कह्या महंमदें, सोई कही ईसे किसोर सूरत । और सब चीजें कही बराबर, दोऊ मकान हादी उमत ॥३२॥
हौज जोए बाग अर्स के, जो कछू अर्स बिसात । कहूं केती अर्स साहेदियाँ, इन जुबां कही न जात ॥३३॥
बरकत कुंजी रूहअल्ला, हुआ बेवरा तीन उमत । पूरी उमेदे सबन की, जाहेर होते हक सूरत ॥३४॥
ले ग्वाही दोऊ हादियों की, किया हक बरनन । सब कौल किताबों के, हक हुकमें किए पूरन ॥३५॥
वाहेदत अर्स अखंड, असल नकल नहीं दोए । घट बढ़ अर्स में है नहीं, न नया पुराना होए ॥३६॥
रंग नंग रेसम मिलाए के, हेम जवेर कुंदन । इन विध बनावे दुनियां, वस्तर और भूखन ॥३७॥
अर्स सरूप जो अखंड, ताको होए कैसे बरनन । एक उतार दूजा पेहेरना, ए होए सुपन के तन ॥३८॥
ए विध अर्स में हैं नहीं, जो करत है नकल । ज्यों अंग त्यों वस्तर भूखन, अर्स में एकै असल ॥३९॥
ज्यों अंग त्यों वस्तर भूखन, अखंड सरूप के एह । इत नहीं भांत सुपन ज्यों, दुनी पेहेन उतारत जेह ॥४०॥
सब चीजें रूह के हुकमें, करत चाह्या पूरन । रूह कछुए चित्त में चितवे, सो होत सबे मांहें खिन ॥४१॥
ज्यों अंग त्यों वस्तर भूखन, तिन सब अंगों सुख दायक । सोभा भी तैसी धरे, जैसा अंग तैसा तिन लायक ॥४२॥
हर एक में अनेक रंग, हर एक में सब सलूक । कई जुगतें हर एक में, सुख उपजत रूप अनूप ॥४३॥
सब नंग में गुन चेतन, मुख थें केहेना पड़े न किन । दिल में जैसा उपजे, सो आगूं होत रोसन ॥४४॥
अर्स सुख जो बारीक, सो जानत अरवा अर्स के । ए झूठी जिमी जो दुनियां, सो क्यों कर समझे ए ॥४५॥
जेता वस्तर भूखन, सब रंग रस कई गुन । रूह कछुए कहे एक जरे को, सो सब आगूं होत पूरन ॥४६॥
अनेक सिनगार एक खिन में, चित्त चाह्या सब होत । दिल में पीछे उपजे, ओ आगे धरे अंग जोत ॥४७॥
कई रंग रस नरमाई, कई सुख बानी जोत खुसबोए । ए अर्स वस्तर भूखन की, क्यों कहूं सोभा सलूकी सोए ॥४८॥
मीठी बानी चित्त चाहती, खुसबोए नरमाई चित्त चाहे । सोभा सलूकी चित्त चाही, ए अर्स सुख कहे न जाए ॥४९॥
अर्स बका की हकीकत, मांहें लिखी कतेब वेद । खोले जमाने का खावंद, और खोल न सके कोई भेद ॥५०॥
लिख्या वेद कतेब में, सोई खोलें जिन सिर खिताब । देसी मुक्त सबन को, करके अदल हिसाब ॥५१॥
सातों सरूप अखंड, मैं बरनन किए सिर ले । दो रास पांच अर्स अजीम, बोझ दिया न सिर सरूपों के ॥५२॥
जो लों इलम को हुकमें, कह्या नहीं समझाए । तो लों सो रूह आप को, क्यों कर सके जगाए ॥५३॥
जब रूह को जगावे हुकम, तब रूह आपै छिप जाए । तब रहे सिर हुकम के, यों हुकमें इलम समझाए ॥५४॥
जाहेर किया हक इलमें, रूह सिर आया हुकम । सोई करे हक बरनन, ले हकै हुकम इलम ॥५५॥
हुकमें बेसक इलम, और हुकमें जोस इस्क । मेहेर निसबत मिलाए के, बरनन करे अर्स हक ॥५६॥
एही आसिक करे बरनन, और आसिकै सुने इत । ए केहेवे लेवें मोमिन, या रसूल तीन सूरत ॥५७॥
मैं हक अर्स में जुदे जानती, ल्यावती सब्द में बरनन । जड़ में सिर ले ढूंढ़ती, हक आए दिल बीच चेतन ॥५८॥
कहूं इनका बेवरा, सिर हुकम लेसी मोमिन । सो हुकमें समझ जागसी, मिले हुकमें हक वतन ॥५९॥
हुकमें चले हुकम, हुकमें जाहेर निसबत । हुकमें खिलवत जाहेर, हुकमें जाहेर वाहेदत ॥६०॥
हुकमें दिल में रोसनी, सुध हुकमें अर्स नूर । मुकैयद मुतलक हुकमें, हुकमें अर्स सहूर ॥६१॥
कोई दम न उठे हुकम बिना, कोई हले ना हुकम बिना पात । तहां मुतलक हुकम क्यों नहीं, जहां बरनन होत हक जात ॥६२॥
हक बातें रूह हुकमें सुने, हुकमें होए दीदार । हुकमें इलम आखिरी, खोले हुकमें पार द्वार ॥६३॥
ए बरनन होत सब हुकमें, आया हुकमें बेसक इलम । हुकमें जोस इस्क सबे, जित हुकम तित खसम ॥६४॥
जब ए द्वार हुकमें खोलिया, हुकमें देख्या हक हाथ । तब रही ना फरेबी खुदी, वाहेदत हुकम हक साथ ॥६५॥
पेहेले हुकमें इलम जाहेर, हुआ हुकमें हक बरनन । मैं हुकम लिया सिर अपने, अब रूह छिप गई हक इजन ॥६६॥
हक बैठे दिल अर्स में, कह्या हकें अर्स दिल मोमिन । रूहें पोहोंचाई हकें अर्स में, हक बैठे अर्स दिल रूहन ॥६७॥
हक रूहें बीच अर्स के, नहीं जुदागी एक खिन । हुकमें नैन कान दीजिए, अब देखो नैनों सुनो वचन ॥६८॥
अब हकें हुकम चलाइया, खुदी फरेबी गई गल । रास खेल रस जागनी, हुआ रूहों सुख असल ॥६९॥
कहे हुकमें महामत मोमिनों, हकें पोहोंचाई इन मजल । कहे सास्त्र नहीं त्रैलोक में, सो हक बैठे रूहों बीच दिल ॥७०॥
॥ प्रकरण ॥३॥ चौपाई ॥२०१॥
