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विषय-सूची

सिनगार - प्रकरण ४

आतम फरामोसी से जागे का प्रकरण

ऐसा आवत दिल हुकमें, यों इस्कें आतम खड़ी होए । जब हक सूरत दिल में चुभे, तब रूह जागी देखो सोए ॥१॥

हक सूरत वस्तर भूखन, बीच बका अर्स के । तिन को निरने इन जुबां, क्यों कर केहेवे ए ॥२॥

जिन दृढ़ करी हक सूरत, हक हुकमें जोस ले । अर्स चीज कही सो मेहेर से, पर बल इन अंग अकल के ॥३॥

जो वचन जुबां केहेत है, हिस्सा कोटमा ना पोहोंचत । पोहोंचे ना जिमी जरे को, तो क्या करे जात सिफत ॥४॥

किया हुकमें बरनन अर्स का, पर दृष्ट मसाला इत का । एक हरफ लुगा पोहोंचे नहीं, लग अर्स चीज बका ॥५॥

जिन देखी सूरत हक की, इन वजूद के सनमंध । जोस हुकम मेहेर देखावहीं, मोमिन जानें एह सनंध ॥६॥

सबों सिफत करी जोस अकलें, इन अंग छूटे ना दृष्ट फना । कोई बल करो हक हुकमें, पर अर्सें क्यों पोहोंचे सुपना ॥७॥

नींद उड़े रहे न सुपना, और सुपने में देखना हक । मेहेर इलम जोस हुकमें, हक देखिए बेसक ॥८॥

पर जेता हिस्सा नींद का, रूह तेती फरामोस । जो मेहेर कर हुकम देखावहीं, तब देखे बिना जोस ॥९॥

हक जानें सो करें, अनहोनी सो भी होए । हिसाब किए सुपन में, मुतलक न देखे कोए ॥१०॥

ए बात तो कारज कारन, हक जानत त्यों करत । असल रूह तन मिलावा, निसबत है वाहेदत ॥११॥

ए हक बातन की बारीकियाँ, सो हक के दिए आवत । ना सीखे सिखाए ना सोहोबतें, हक मेहेरें पावत ॥१२॥

अपनी रूहों वास्ते, कई कोट काम किए । ए जानें अरवाहें अर्स की, जिन नाम निसान लिए ॥१३॥

ए जो अर्स बारीकियाँ, अर्स सहूरें रूह जानत । जिन पट खुल्या सो न जानहीं, बिना हक सिफत ॥१४॥

जिन जो देख्या जागते, सो देखे मांहें सुपन । कानों सुन्या सोभी देखत, याके साथ तो हक इजन ॥१५॥

रखे वजूद को हुकम, जेते दिन रख्या चाहे । रूहों खेल देखावने, कई विध जुगत बनाए ॥१६॥

आतम तो फरामोस में, भई आड़ी नींद हुकम । सो फेर खड़ी तब होवहीं, रूह दिल याद आवे खसम ॥१७॥

सो साख मोमिन एही देवहीं, यो बूझ में भी आवत । अनुभव भी कछू केहेत है, और हुकम भी कहावत ॥१८॥

मोमिन केहेवें हुकमें, बूझ अनुभव पर हुकम । हुकम केहेवे सो भी हुकमें, कछू ना बिना हुकम खसम ॥१९॥

रूह तेती जागी जानियो, जेता दिल में चुभे हक अंग । जो अंग हिरदे न आइया, रूह के तेती फरामोसी संग ॥२०॥

ताथें जो रूह अर्स अजीम की, सो क्यों ना करे उपाए । ले हक सरूप हिरदे मिने, और देवे सब उड़ाए ॥२१॥

इस्क बिना रूह के दिल, चुभे ना सूरत हक । मेहेर जोस निसबतें, हक हुकमें चुभे मुतलक ॥२२॥

मोहे दिल में हुकमें यों कह्या, जो दिल में आवे हक मुख । तो खड़ा होए मुख रूह का, हक सों होए सनमुख ॥२३॥

अधुर हरवटी नासिका, दंत जुबां और गाल । जो अंग आया हक का दिल में, उठे रूह अंग उसी मिसाल ॥२४॥

जो तूं ग्रहे हक नैन को, तो नजर खुले रूह नैन । तब आसिक और मासूक के, होए नैन नैन से सैन ॥२५॥

जो हक निलाट आवे दिल में, और दिल में आवे श्रवन । दोऊ अंग खड़े होएं रूह के, जो होवें रूह मोमिन ॥२६॥

भौं भृकुटी पल नासिका, सुन्दर तिलक हमेस । गौर सोभा मुख चौक की, क्यों कहूं जोत नूर केस ॥२७॥

ए अंग जेते मैं कहे, आवें रूह के हिरदे हक । तेते अंग रूह के, उठ खड़े होए बेसक ॥२८॥

पाग बनी सिर सारंगी, इन जुबां कही न जाए । ए जुगत जोत क्यों कहूं, जो हकें बांधी दिल ल्याए ॥२९॥

अतंत सोभा सुन्दर, चढ़ती चढ़ती तरफ चार । जित देखूं तित अधिक, सोभा न आवे मांहें सुमार ॥३०॥

हक हैड़ा हिरदे ग्रहिए, दिल में रहे दायम । सो हैड़ा अंग रूह का, उठ खड़ा हुआ कायम ॥३१॥

जो हक अंग दिल में नहीं, सो अंग रूह का फरामोस । जब हक अंग आया दिल में, सो रूह अंग आया मांहें होस ॥३२॥

कटि पेट पांसे हक के, पीठ खभे कांध केस । ए दिल में जब दृढ़ हुए, तब रूह आया देखो आवेस ॥३३॥

बाजू मच्छे कोनियां, कांड़े कलाइयां हाथ । हक के अंग हिरदे आए, तब रूह खड़ी हुई हक साथ ॥३४॥

पोहोंचे हथेली अंगुरी नख, लीकें रंग सलूक । हक अंग मिहीं हिरदे बैठे, अब निमख न होए रूह चूक ॥३५॥

नख अंगूठे अंगुरियां, नीके ग्रहिए हक कदम । सोई नख अंगुरियां पांउं रूह के, खड़े होत मांहें दम ॥३६॥

जब हक चरन दिल दृढ़ धरे, तब रूह खड़ी हुई जान । हक अंग सब हिरदे आए, तब रूह जागे अंग परवान ॥३७॥

मोहोरी चूड़ी इजार की, और नेफा इजार बंध । हरे रंग बूटी कई नकस, हकें सोभित भली सनंध ॥३८॥

क्यों कहूं जुगत जामें की, हरे पर उज्जल दावन । निपट सोभित मिहीं बेलियां, झांई उठत अति रोसन ॥३९॥

एक सेत रंग जामा कह्या, मांहें जवेर जुगत कई रंग । इन जुबां रोसनी क्यों कहूं, जो झलकत अर्स के नंग ॥४०॥

बीच पटुका कस्या कमरें, रंग कई बिध छेड़े किनार । बेली नकस फूल केते कहूं, अवकास भरयो झलकार ॥४१॥

एक झलकार मुख केहेत हों, मांहें कई सलूकी सुखदाए । सो गुन गरभित इन जुबां, रंग रोसन क्यों कहे जाए ॥४२॥

जामा जुड़ बैठा अंग पर, कोई अचरज खूबी लेत । सोभा सलूकी सुख क्यों कहूं, अंग गौर पर जामा सेत ॥४३॥

बगलों नकस केवड़े, कंठ बेली दोऊ गिरवान । ए जुगत जुबां तो कहे, जो कछू होए इन मान ॥४४॥

कटाव कोतकी कांध पीछे, ऊपर फुंदन हारों के । रूह जो जाग्रत अर्स की, सुख लेसी बका इत ए ॥४५॥

बांहे चूड़ी और मोहोरियां, चूड़ी अचरज जुगत । निपट मिहीं मोहोरीय से, चढ़ती चढ़ती सोभित ॥४६॥

आए वस्तर हिरदे हक के, रूह अपने पेहेने बनाए । तेती खड़ी रूह होत है, जेता दिल में हक अंग आए ॥४७॥

पांच नंग मांहें कलंगी, तामें तीन नंग ऊपर । एक मध्य एक लगता, पांच रंग जोत बराबर ॥४८॥

ए जो कलंगी सिर पर, लटक रही सुखदाए । जो भूखन रूह नजर भरे, तो जानों अरवा देवे उड़ाए ॥४९॥

सात नंग मांहें दुगदुगी, सो सातों जुदे जुदे रंग । चढ़ती जोत आकास में, करत मांहों मांहें जंग ॥५०॥

जो रस कलंगी दुगदुगी, सोई पाग को रस । अंग रंग जोत बराबर, ए नंग रस नूर अर्स ॥५१॥

ए जो हिरदे आए हक भूखन, जाहेर स्यामाजी के जान । कलंगी दुगदुगी राखड़ी, होत दोऊ परवान ॥५२॥

दोऊ मुक्ताफल कान के, करड़े कंचन बीच लाल । साड़ी किनार सेंथे पर, श्रवन पानड़ी झाल ॥५३॥

हक अंग तो मुतलक मारत, पर भूखन लगें ज्यों भाल । चितवन जुगल किसोर की, देत कदम नूरजमाल ॥५४॥

मुख बीड़ी आरोगें पान की, लाल सोभे अधुर तंबोल । ए रूह दृष्टें जब देखिए, पट हिरदे देत सब खोल ॥५५॥

कहूं केते भूखन कंठ के, तेज तेज में तेज । आसमान जिमी के बीच में, हो गई रोसन रेजा-रेज ॥५६॥

हार कई जवेरन के, कहूं केते तिनके रंग । कई लेहेरें मांहें उठत, ए तो अर्स अजीम के नंग ॥५७॥

एक एक नंगमें कई रंग, रंग रंग में तरंग अपार । तरंग तरंग किरने कई, हर किरने रंग न सुमार ॥५८॥

जामें चादर जुड़ रही, ढांपत नहीं झलकार । गिनती जोत क्यों कर होए, नंग तेज ना रंग पार ॥५९॥

ए रंग जोत किन विध कहूं, जो ले देखो अर्स सहूर । सोभा रंग सलूकी सुख, देखो रूह की आंखों जहूर ॥६०॥

भूखन हक श्रवन के, और हक कण्ठ कई हार । सोई कण्ठ श्रवन रूह के, साज खड़े सिनगार ॥६१॥

सोभा जुगल किसोर की, दोऊ होत बराबर । जो हिरदे सो बाहेर, दोऊ खड़े होत सरभर ॥६२॥

बाजूबंध और पोहोंचियां, कड़े जवेर कंचन । नंग रंग नाम केते कहूं, कही जाए न जरा रोसन ॥६३॥

मुंदरियां दसों अंगुरियों, एक छोटी की न केहेवाए जोत । अर्स जिमी आकास में, हो जात सबे उद्दोत ॥६४॥

हक के भूखन की क्यों कहूं, रंग नंग जोत सलूक । आतम उठ खड़ी तब होवहीं, पेहेले जीव होए भूक भूक ॥६५॥

रूह भूखन हाथ के, हक भेले होत तैयार । ए सोभा जुगल किसोर की, जुबां केहे न सके सुमार ॥६६॥

चारों जोड़े चरन भूखन, रंग चारों में उठें हजार । ए बरनन जुबां तो करे, जो कछुए होए निरवार ॥६७॥

वस्तर भूखन हक के, आए हिरदे ज्यों कर । त्यों सोभा सहित आतमा, उठ खड़ी हुई बराबर ॥६८॥

सुपने सूरत पूरन, रूह हिरदे आई सुभान । तब निज सूरत रूह की, उठ बैठी परवान ॥६९॥

जब पूरन सरूप हक का, आए बैठा मांहें दिल । तब सोई अंग आतम के, उठ खड़े सब मिल ॥७०॥

वस्तर भूखन सब अंगों, कण्ठ श्रवन हाथ पाए । नख सिख सिनगार साज के, बैठे अर्स दिल में आए ॥७१॥

जब बैठे हक दिल में, तब रूह खड़ी हुई जान । हक आए दिल अर्स में, रूह जागे के एही निसान ॥७२॥

हक के दिल का इस्क, रूह पैठ देखे दिल मांहें । तो हक इस्क सागर से, रूह निकस न सके क्यांहें ॥७३॥

जो हक करें मेहेरबानगी, तो इन बिध होए हुकम । एता बल रूह तब करे, जब उठाया चाहें खसम ॥७४॥

महामत हुकमें केहेत हैं, जो होवे अर्स अरवाए । रूह जागे का एह उद्दम, तो ले हुकम सिर चढ़ाए ॥७५॥

॥ प्रकरण ॥४॥ चौपाई ॥२७६॥

इसी सन्दर्भ में देखें-