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परमहंस युगल दास | Yugal Das

युगल दास जी का जन्म अठारहवीं शताब्दी में दतिया (मध्य प्रदेश) में हुआ था ।

युवावस्था में युगल दास जी किसी जमींदार के यहां पटवारी का कार्य करते थे । उनका विवाह भाण्डेर तहसील निवासी सबूरबाई से हुआ । एक दिन किसी परमहंस ने उनकी आत्मा को पहचाना और तारतम ज्ञान दिया । तब उन्होंने नौकरी छोड़ दी और परमधाम के दर्शन की लालसा से पन्ना आ गए ।

युगल दास जी के मन में श्री प्राणनाथ के दर्शन की ऐसी लगन थी कि उन्होंने अति कठोर प्रण कर लिया । उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली और प्रण किया कि जब तक श्री प्राणनाथ स्वयं आकर पट्टी नहीं खोलेंगे, तब तक वे इसी प्रकार रहेंगे । ऐसा प्रण करने के पश्चात् वे रात-दिन श्री राज और परमधाम के चिन्तन, स्मरण और ध्यान में लीन रहने लगे । इस प्रकार छह माह बीत गए ।

छह माह पश्चात् श्री प्राणनाथ ने साक्षात् प्रकट होकर उनकी आंखों की पट्टी खोली । श्री प्राणनाथ की कृपा से उन्हें चितवन में परमधाम के चप्पे-चप्पे का दर्शन हो गया । ऐसा कहा जाता है कि वे परमधाम के ध्यान में इतना लीन रहते थे कि उन्हें भोजन करने की भी सुधि नहीं रहती थी । कुछ सुन्दरसाथ प्रतिदिन उनके मुख में भोजन डाल दिया करते थे । श्री जी की आज्ञा से युगल दास जी भाण्डेर (जिला दतिया) आ गए और जागनी करने लगे ।

परमहंस युगल दास जी ने अनेक ग्रन्थों की रचना की, जिसमें मुख्य हैं- परमधाम विलास, परमधाम की बड़ी वृत्त, मनमोहन रसानन्द सागर, वैराट निरुपण, प्रेम पत्री, आदि ।

परमहंस युगल दास के शिष्य चतुर दास (मटियारी, लखनऊ) और चेतन दास (गंगापुर, बिहार) उनकी कृपा से परमहंस हुए तथा अपने-अपने क्षेत्र में बहुत जागनी की । झांसी की रानी लक्ष्मी बाई भी उनकी शिष्या थी । सन् 1858 में अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध में असफल होने के पश्चात् उसने परमहंस महाराज के सामने अग्नि स्नान कर लिया और महाराज जी उसकी अस्थियों को अंग्रेजों से छिपाकर भाण्डेर ले गए ।

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