अखण्ड मुक्ति | Akhand Mukti
मुक्ति का अर्थ होता है किसी बन्धन से छूट जाना ।
संसार के जीवों को निराकार से परे जाने का अधिकार नहीं है, इसलिए वे आवागमन के चक्र में फंसे रहते हैं । यदि परब्रह्म की कृपा से उन्हें योगमाया में स्थान मिल जाए, तो उसे अखण्ड मुक्ति कहते हैं । ऐसी स्थिति में उन्हें योगमाया में नूरी (दिव्य) शरीर मिल जाएंगे, जो सदा एक-जैसे रहेंगे अर्थात् वे अमर हो जाएंगे । स्वर्ग या वैकुण्ठ जाने को अखण्ड मुक्ति नहीं कहा जा सकता ।
ब्रह्मसृष्टि का ऐसा नूर (महिमा) है कि जो दुनिया अंकूर (बेहद में मूल तन) के बिना थी, उनके लिए नए अंकूर बनाकर उन्हें अपनी कृपादृष्टि से अखण्ड मुक्ति दे दी ।1
(1) प्रकास हिन्दुस्तानी 37/109
